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सुप्रीम कोर्ट: आखिर सांविधानिक अदालतें कोविड प्रबंधन मामले में कितनी दूर तक जा सकती हैं
Wed, 14 Jul 2021 09:02 PM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Wed, 14 Jul 2021 09:02 PM IST
सार
इस मसले पर शीर्ष अदालत करेगी परीक्षण, हाईकोर्ट की ‘राम भरोसे’ वाली टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कहां तक उचित है यह टिप्पणी?
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सर्वोच्च न्यायालय
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह इसका परीक्षण करेगा कि सांविधानिक अदालतें कोविड-19 प्रबंधन के संबंध में कार्यपालिका के क्षेत्र में आने वाले मुद्दों पर कितनी दूर तक जा सकती हैं। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि इस बात का भी परीक्षण किया जाना चाहिए कि आखिर अदालत की ओर से मेडिकल सिस्टम को ‘राम भरोसे’ बताने वाली टिप्पणी कहां तक उचित थी।
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जस्टिस विनीत शरण और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की पीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर सुनवाई कर रही थी जिसमें राज्य को कोरोना संकट से निपटने के लिए चिकित्सा सुविधाओं को बढ़ाने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने प्रदेश के मेडिकल सिस्टम को ‘राम भरोसे’ करार दिया था। जस्टिस शरण ने कहा कि हम यह निर्धारित करना चाहते हैं कि सांविधानिक अदालतें इस तरह के मुद्दे में कितनी दूर तक जा सकती हैं। कितनी एंबुलेंस हैं, कितने ऑक्सीजन बेड हैं, हम उस पर टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि आप सुझाव नहीं दे सकते हैं लेकिन आप स्थानीय कंपनियों को वैक्सीन फॉर्मूला लेने और उसका निर्माण करने के लिए कैसे कह सकते हैं? ऐसे निर्देश कैसे दिए जा सकते हैं?
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इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हाईकोर्ट के निर्देशों में जो बातें कही गई थी, उन्हें केवल सुझाव माना जाए।
हाईकोर्ट इस मुद्दे पर करता रहेगा सुनवाई
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश फिलहाल इस समय मामले की सुनवाई कर रहे हैं। इस पर शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट को इस मुद्दे पर आगे बढ़ने की अनुमति प्रदान कर दी। हालांकि शीर्ष अदालत ने 17 मई के आदेश को रद्द करने का कोई औपचारिक आदेश नहीं दिया क्योंकि उसने पहले ही निर्देश दिया था कि हाईकोर्ट के निर्देशों को केवल सुझावों के रूप में माना जाए। हाईकोर्ट ने अपने 17 मई के आदेश में यूपी में चिकित्सा सुविधाओं और चिकित्सा प्रणाली को ‘राम भरोसे’ बताया था। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि उसका पालन करना व्यावहारिक नहीं है।
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एक पीठ खुद कर रही कोविड से संबंधित मामले की सुनवाई
दिलचस्प बात यह है कि दो सदस्यीय पीठ की ये टिप्पणी तब आई है जब सुप्रीम कोर्ट की एक तीन सदस्यीय पीठ खुद ही कोविड से संबंधित एक मामले पर सुनवाई कर रही है। तीन सदस्यीय यह पीठ केंद्र सरकार की वैक्सीन नीति के साथ-साथ ऑक्सीजन प्रबंधन के संबंध में कई निर्देश पारित कर चुकी है।
हमें सीमाओं का करना होगा सम्मान
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र व वरिष्ठ वकील निधेश गुप्ता ने पीठ से कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यूपी सरकार तीसरी लहर आने से पहले अपने हलफनामे में कही गई सभी बातों को पूरा करे क्योंकि यह ‘तूफान से पहले की खामोशी’ है। हालांकि पीठ ने साफ किया कि वह यह निर्धारित करना चाहता है कि क्या सभी सांविधानिक अदालतें कोविड-19 की तैयारियों के ‘क्षेत्र’ में दखल कर सकती हैं। पीठ ने कहा कि हमें इसकी जांच करनी होगी। हमें सीमाओं का सम्मान करना होगा। ‘राम भरोसे’ की टिप्पणी कहां तक उचित थी। जस्टिस माहेश्वरी ने कहा कि एक अदालत के पास 110 सुझाव हो सकते हैं लेकिन क्या ये सभी अदालती आदेश का हिस्सा हो सकते हैं?
हमारे पास 2200 बुनियादी जीवन रक्षक एंबुलेंस : यूपी
उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसके पास कुल 2200 बुनियादी जीवन रक्षक एंबुलेंस हैं और 250 उन्नत जीवन रक्षक एंबुलेंस हैं। अपने नवीनतम हलफनामे में प्रदेश सरकार ने कहा कि उसके यहां 289 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं जिनमें प्रत्येक के लिए दो बाईपास मशीनें हैं। इसमें कहा गया कि 273 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को 177 ऑक्सीजन कन्संट्रेटर दिए गए हैं और 20,000 से अधिक ऑक्सीजन कन्संट्रेटर खरीदे जा रहे हैं। प्रदेश 7189 बेड के लिए 44,082 लीटर प्रति मिनट की क्षमता वाले ऑक्सीजन कन्संट्रेटर स्थापित करने जा रहा है। 528 ऑक्सीजन संयंत्र स्वीकृत किए गए हैं और 133 कार्य कर रहे हैं। राज्य ने प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए 20 ऑक्सीजन कन्संट्रेटर की खरीद का आदेश दिया है। हलफनामे में कहा गया है कि सरकार ने प्रत्येक जिला अस्पताल में 10 से 15 बिस्तरों के साथ बाल चिकित्सा आईसीयू और 25 से 30 मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की योजना बनाई है।