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Child Abuse: केस में नरमी के लिए नहीं कर सकते जाति का इस्तेमाल, बाल यौन उत्पीड़न मामले में कोर्ट की टिप्पणी

Thu, 12 Oct 2023 05:24 AM IST
गुलाम अहमद अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: गुलाम अहमद Updated Thu, 12 Oct 2023 05:24 AM IST
सार

अदालत ने सुझाव दिया कि जब भी किसी बच्ची पर यौन हमला किया जाता है तो राज्य या कानूनी सेवा प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्ची को प्रशिक्षित बाल परामर्शदाता या बाल मनोवैज्ञानिक की ओर से परामर्श की सुविधा दी जाए। 

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supreme court says caste of accused cannot be considered for showing leniency in child abuse case
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पांच से छह साल की छोटी बच्ची के यौन उत्पीड़न से संबंधित मामले में नरमी दिखाने के लिए आरोपी की जाति पर विचार नहीं किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि किसी मामले के वाद शीर्षक में आरोपी की जाति का उल्लेख कभी नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस पंकज मित्थल की पीठ ने कहा है, हम यह समझने में असफल हैं कि हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के निर्णयों के वाद शीर्षक में अभियुक्त की जाति का उल्लेख क्यों किया गया है। निर्णय के वाद शीर्षक में किसी वादी की जाति या धर्म का उल्लेख कभी नहीं किया जाना चाहिए।

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शीर्ष अदालत हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राजस्थान सरकार की ओर से दायर उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी गौतम की सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 12 साल की कैद कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अदालत की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला मामला है। पीठ ने सजा को बढ़ाकर 14 साल कर दिया। पीठ ने कहा, अपराध इतना वीभत्स और जघन्य है कि इसका असर पीड़िता पर पूरी जिंदगी रहेगा। शीर्ष अदालत ने कहा, हाईकोर्ट ने आरोपी के अनुसूचित जाति का होने के कारण उसके प्रति नरमी दिखाई। हाईकोर्ट ने फैसले में यह भी दर्ज किया कि वह आदतन अपराधी नहीं था।
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बच्ची को परामर्श की सुविधा भी दी जाए
अदालत ने सुझाव दिया कि जब भी किसी बच्ची पर यौन हमला किया जाता है तो राज्य या कानूनी सेवा प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्ची को प्रशिक्षित बाल परामर्शदाता या बाल मनोवैज्ञानिक की ओर से परामर्श की सुविधा दी जाए। पीठ ने कहा, एक कल्याणकारी राज्य के रूप में ऐसा करना सरकार का कर्तव्य है। केवल मुआवजे का भुगतान पुनर्वास नहीं है। शायद पीड़िता का पुनर्वास केंद्र सरकार के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का हिस्सा होना चाहिए।
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मामले का समाज पर असर
शीर्ष अदालत ने कहा, आरोपी की जाति, ऐसे अपराधों में नरमी दिखाने के लिए विचार योग्य नहीं है। यह ऐसा मामला है जो समाज पर प्रभाव डालता है। यदि मामले के तथ्यों में प्रतिवादी के प्रति अनुचित उदारता दिखाई जाती है तो यह न्याय प्रणाली में आम आदमी के विश्वास को कम कर देगा। सजा अपराध की गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए। जब सजा देने की बात आती है तो अदालत न केवल आरोपी पर विचार करती है, बल्कि उसे अपराध की भी चिंता होती है।


पीड़िता को मुआवजा देने का निर्देश...
शीर्ष अदालत ने 25 हजार रुपये के जुर्माने में से 20 हजार रुपये पीड़िता को देने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि पीड़ित को राज्य की पीड़ित मुआवजा योजना के तहत मुआवजा दिया जाए।

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