सुप्रीम कोर्ट ने जंगल में आग लगने को बताया गंभीर मुद्दा, कहा- बारिश के लिए करें प्रार्थना
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तराखंड में जंगल में लगने वाली आग (दावानल) से वनों, वन्यजीवों और पक्षियों को बचाने के लिए तत्काल कदम उठाने के लिए दाखिल की गई एक याचिका पर सुनवाई करना मंजूर कर लिया है। इस याचिका पर 24 जून को सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा है और इस बीच बारिश के लिए प्रार्थना करिए।
याचिकाकर्ता वकील रितुपर्ण उनियाल द्वारा इस मामले को मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग की, जिसके बाद न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और सूर्यकांत की अवकाश पीठ ने मामले को 24 जून के लिए सूचीबद्ध किया। पीठ ने कहा, 'हम याचिका को सोमवार (24 जून) के लिए सूचीबद्ध कर रहे हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है और इस बीच आप बारिश के लिए प्रार्थना करिए।'
जंगल में लगने वाली आग से वनों, वन्य जीवों और पक्षियों को बचाने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग लेकर उनियाल पिछले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। उनियाल ने कहा कि बीते सालों में जंगल में आग की घटनाएं बढ़ी हैं और इससे पर्यावरण को बड़ा नुकसान हुआ है।
लगातार होती हैं घटनाएं फिर भी नहीं ले रहा कोई संज्ञान
याचिका में केंद्र सरकार, उत्तराखंड सरकार और राज्य में वनों के मुख्य संरक्षक से आग से बचने के प्रबंध करने और जंगल की आग को रोकने के लिए नीति बनाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है, 'उत्तराखंड में दावानल एक एतिहासिक और लगातार होने वाली घटना रही है। राज्य में हर साल इससे वन पारिस्थितिकी तंत्र, वनस्पतियों और जीवों की विविधताओं और आर्थिक धन का बड़ा नुकसान होता है। दावानल उत्तराखंड के जंगलों में होने वाली प्रमुख आपदा है।'
याचिका में लिखा है, 'दावानल की लगातार घटनाएं होने के बावजूद इसके प्रति उत्तरदाताओं (केंद्र, राज्य सरकार और मुख्य वन संरक्षक) की अज्ञानता, निष्क्रियता, लापरवाही और अपठनीयता ने उत्तराखंड में जंगलों, वन्यजीवों और पक्षियों को बहुत नुकसान पहुंचाया है और इससे पारिस्थितिक असंतुलन आया है।' याचिका में दावा किया गया है कि देश के सबसे प्रमुख वन अनुसंधान केंद्रों में से एक उत्तराखंड में था, लेकिन अधिकारियों ने जंगल में आग लगने की घटनाओं से निपटने के लिए संस्था से परामर्श नहीं किया है।
याचिका में कहा गया है कि जंगल पर्यावरणीय रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों के जीवन से जुड़े हुए हैं और आर्थिक लाभ और क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि संबंधित अधिकारियों के पास इस बात का कोई सूराग नहीं है कि ये आग कैसे लगीं और इन्हें किस तरह रोका जाए। इसके साथ ही अधिकारियों को मिले प्रशिक्षण पर भी सवाल उठाया गया है।
जानवरों को मिले कानूनी अधिकार
याचिका के अनुसार दो राष्ट्रीय पार्क, कॉर्बेट नेशनल पार्क औक राजाजी नेशनल पार्क, जंगल में लगने वाली आग की वजह से खतरे में थे। इसके अनुसार, 'जंगल में लगने वाली आग की घटनाओं का एक बड़ा नतीजा 'ब्लैक कार्बन' का उत्पन्न होना है। ब्लैक कार्बन किसी जैव-पदार्थ और जीवाश्म ईंधन के अधूरे दहन से निर्मित होता है। इसकी वजह से क्षेत्र में हिमालय के ग्लेशियर ज्यादा गर्मी अवशोषित करते हैं जिससे वह तेजी से पिघलते हैं और मैदानी इलाकों में बाढ़ का कारण बनते हैं।'
याचिका में कहा गया है कि घास के मैदानों को नष्ट करना और क्षेत्र में पशुधन के लिए चारे की कमी एक और चिंता थी जो स्थानीय लोगों और ग्रामीणों को परेशान करने लगी थी। इसके अनुसार, 'जंगल में आग की वजह से पर्यटन कम हुआ और इससे लोगों की आय पर फर्क पड़ा, जो कि एक और बड़ी समस्या है।'
जानवरों के लिए कानूनी अधिकारों की मांग करते हुए, याचिका में कहा गया था कि संविधान के तहत 'जीवन' का अर्थ केवल मनुष्य के लिए अस्तित्व या अस्तित्व या वाद्य मूल्य से अधिक है, लेकिन कुछ आंतरिक मूल्य, सम्मान या सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए।
जानवरों के लिए कानूनी अधिकारों की मांग करने वाली इस याचिका के अनुसार संविधान के अंतर्गत जीवन का अर्थ केवल मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि ऐसे जीवन से है जिसके कुछ मूल्य हों, सम्मान हो। याचिका कहती है, 'सभी जानवरों का सम्मान और गरिमा है। इसलिए, पक्षियों और समुद्री जीवों समेत सभी जानवरों को बचाने और उनके लाभ के लिए उन्हें कानूनी इकाई या कानूनी व्यक्ति की तरह मानना जरूरी है।'