{"_id":"5a87a4fe4f1c1b805a8ba386","slug":"supreme-court-said-gold-is-god-to-build-illegal-property","type":"story","status":"publish","title_hn":"अवैध संपत्ति बनाने में भगवान साबित होता है सोना: सुप्रीम कोर्ट","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
अवैध संपत्ति बनाने में भगवान साबित होता है सोना: सुप्रीम कोर्ट
राजीव सिन्हा/नई दिल्ली
Updated Sat, 17 Feb 2018 09:19 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जनप्रतिनिधि या उनके सहयोगी अधिकतर ऐसा तरीका अपनाते हैं जिससे वे संपत्ति भी बना लेते हैं और वे भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत आने वाले अपराध के दायरे में आने से बच जाते हैं। इसीलिए सोना उनके लिए भगवान है।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जनप्रतिनिधियों या उनके सहयोगियों की संपत्तियों में बेतहाशा वृद्धि हमेशा गैरकानूनी गतिविधियों की श्रेणी में नहीं आता। भले ही उनकी गतिविधियां या क्रियाकलाप उचित नहीं हो लेकिन वे भ्रष्टाचार कानून या किसी अन्य कानून के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आते।
विज्ञापन
लेकिन यह जनप्रतिनिधि के संवैधानिक दायित्व के विपरीत है। जनप्रतिनिधि लोगों की शिकायतें दूर करने के लिए होते हैं लेकिन ऐसी गतिविधियों में लिप्त होकर जनप्रतिनिधि खुद ‘शिकायत’ बन जाते हैं।
विज्ञापन
साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी कहा है कि ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जब जनप्रतिनिधि या उनके सहयोगी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों से लोन लेते हैं। चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से।
मतलब, ये जनप्रतिनिधि या उनके सहयोगी खुद लोन लेते हैं या ऐसी संस्था व कंपनियों के नाम पर लेते हैं जिन पर उनका नियंत्रण होता है। सरफेसी कानून के तहत इस तरह केलोन एनपीए होते हैं। यह भी आजकल बहुत दिखने को मिल रहा है कि जनप्रतिनिधियों या सहयोगियों के खाते एनपीए में तब्दील होने के बावजूद उन्हें उसी वित्तीय संस्थान या किसी अन्य संस्थानों से फिर से लोन मिल जाता है।
शीर्ष अदालत ने कहा है कि सरकार या सरकार के नियंत्रण वाली निकायों से महंगे कांट्रेक्ट के जरिए जनप्रतिनिधि बेतहाशा संपत्ति अर्जित करते हैं। पीठ ने कहा कि शुरुआत में जनप्रतिनिधि कानून, 1951 में यह प्रावधान था कि अगर किसी व्यक्ति का सामानों की सप्लाई या किसी काम या सेवा में उसका कोई शेयर हो या उसे उसका फायदा मिलता हो तो वह अयोग्य ठहराया जाएगा।
लेकिन 1958 में इस प्रावधान को हटा दिया गया और एक नई धारा जोड़ी गई जिससे जनप्रतिनिधियों के सहयोगियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी कांट्रेक्ट पाने का रास्ता निकल गया।