Stubble: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा पराली जलाना बंद करें? जानें पंजाब में धान की खेती को लेकर क्या चिंता जताई
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विस्तार
देश की राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में प्रदूषण की स्थिति लगातार चिंताजनक बनी हुई है। दिल्ली भर में वायु गुणवत्ता 'गंभीर' श्रेणी में बनी हुई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, बुधवार सुबह को आनंद विहार में एक्यूआई 452, आरके पुरम में 433, ओखला में 426, पंजाबी बाग में 460, श्री अरबिंदो मार्ग में 382 शादीपुर में 413 और आईटीओ में 413 दर्ज किया गया।
इससे पहले मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने देश के कई क्षेत्रों में बढ़ते वायु प्रदूषण पर चिंता जताई। शीर्ष अदालत ने दिल्ली के साथ-साथ पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान की सरकारों को जमकर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि हर समय राजनीतिक लड़ाई नहीं हो सकती है। पराली जलाना कोई राजनीतिक मसला नहीं है। इसे तुरंत जलाना बंद करना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने वायु प्रदूषण को कम करने के लिए कई कदम उठाने के निर्देश भी दिए।
ऐसे में हमें जानना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में प्रदूषण को लेकर क्या हुआ है? पराली को लेकर अदालत ने क्या कहा? कोर्ट ने स्थिति से निपटने के लिए क्या सुझाव दिए हैं? आइये जानते हैं...
सुप्रीम कोर्ट में प्रदूषण को लेकर क्या हुआ है?
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली एनसीआर में जारी प्रदूषण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि आरोप-प्रत्यारोप का खेल बंद होना चाहिए और राष्ट्रीय राजधानी को साल-दर-साल परेशानी का सामना नहीं करना पड़ सकता।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने आया कि दिल्ली में एक स्मॉग टॉवर काम नहीं कर रहा है। अदालत ने सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि इसकी मरम्मत की जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रदूषण के मुद्दे से निपटने के लिए वाहनों के लिए ऑड-ईवन जैसी योजनाएं महज दिखावा हैं।
पराली को लेकर अदालत ने क्या कहा?
कल सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पराली के मुद्दे पर दिल्ली और उसके पड़ोसी राज्यों की सरकारों को जमकर फटकार लगाई। इसके साथ ही कोर्ट ने दिल्ली से सटे सभी राज्यों पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पराली जलाना तुरंत बंद कर दिया जाए और स्थानीय SHO को इसके लिए जिम्मेदार बनाया जाए। फिलहाल समग्र निगरानी डीजीपी और मुख्य सचिव करेंगे।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के एक सुझाव का उल्लेख किया दिया है। सुझाव में केजरीवाल ने कहा है कि दिल्ली सरकार पूसा में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के सहयोग से (पूसा डी-कंपोजर) पराली जलाने की समस्या का समाधान करने में सफल साबित हुआ है और समस्या से निपटने के लिए पंजाब सरकार से विशेष समयसीमा की मांग की है। कोर्ट ने कहा कि इस पहलू पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए और उसी पर प्रतिक्रिया दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने स्थिति से निपटने के लिए क्या सुझाव दिए हैं?
दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण के संबंध में कल वकीलों ने विभिन्न मुद्दे भी उठाए। इस दौरान पंजाब के महाधिवक्ता गुरमिंदर सिंह ने स्थिति से निपटने के लिए कुछ रचनात्मक सुझाव दिए। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव पर टिप्पणियां कीं:
1) कोर्ट ने कहा कि किसान आर्थिक कारणों से पराली जला रहे हैं। उन्हें दिए गए विकल्पों का पालन नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि उसके विचार में कुछ मामलों में हठधर्मिता के कारण और जैसा कि गुरमिंदर सिंह कुछ मामलों में आर्थिक वजह बताते हैं। सुझाव के मुताबिक, प्रयास यह किया जाना चाहिए कि वैकल्पिक समाधान निःशुल्क उपलब्ध कराया जाए। अधिवक्ता गुरमिंदर ने बताया कि महंगी मशीनें खरीदी गई हैं, यहां तक कि जहां 50% या 25% लागत का भुगतान किसानों को करना पड़ता है, किसान इसके लिए तैयार नहीं हैं।
ऐसे में पंजाब के अधिवक्ता ने कहा कि पंजाब उन सुविधाओं को मुफ्त बनाने की लागत का 25% वहन करने को तैयार है और उनका सुझाव है कि 25% दिल्ली द्वारा वहन किया जा सकता है। इसके साथ ही गुरमिंदर ने कहा कि केंद्र सरकार 50% लागत वहन कर सकती है और हमारा मानना है कि जब केंद्र इतनी सारी अन्य सब्सिडी प्रदान करता है, तो कोई कारण नहीं है कि यह लागत वहन न की जाए। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये कुछ समय के लिए आवश्यक तत्काल उपाय हैं।
2) पंजाब में देखा गया है धान के उत्पादन में बढ़ोतरी के कारण जल स्तर में भारी गिरावट आ रही है। कहा जाता है कि बहुत से कुओं का पुनर्भरण (रिचार्ज) नहीं हो पाया है। ऐसे में धान की खेती, जिसकी पंजाब में निश्चित रूप से खपत नहीं होती, एक समस्या है। कोर्ट ने कहा कि यह अधिवक्ता का सुझाव है और हमारा यह मानना सही है कि धान की खेती को चरणबद्ध तरीके से खत्म कर उसकी जगह दूसरी फसलें उगानी चाहिए और केंद्र सरकार को धान की बजाय वैकल्पिक फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के पहलू पर विचार करना चाहिए।
3) अधिवक्ता ने कहा कि धान के लिए एमएसपी का दुरुपयोग हो रहा है, क्योंकि निकटवर्ती राज्यों में उगाए गए धान को एमएसपी लेने के लिए पंजाब में लाया जाता है और एमएसपी नीति के तहत बेचा जाता है।
4) कहा गया कि विशेष प्रकार की धान की किस्म जो ज्यादातर पंजाब में उगाई जाती है, उसमें पराली एक उप-उत्पाद होती है जो समस्या की वजह बनती है। वहीं, अन्य राज्यों में उगाई जाने वाली धान की बासमती किस्म के साथ ऐसी समस्या नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इसे गंभीरता से देखने की जरूरत है।