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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: राज्यों को केवल आर्थिक आधार पर 'क्रीमी लेयर' बनाने का अधिकार नहीं

Tue, 24 Aug 2021 08:34 PM IST
गौरव पाण्डेय राजीव सिन्हा, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Tue, 24 Aug 2021 08:34 PM IST
सार

शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार की ओर से साल 2016 में जारी उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया है जिसमें  छह लाख से अधिक सलाना आय वाले लोगों को 'क्रीमी लेयर' करार दिया गया था। इसके साथ ही उन्हें नौकरी और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण से दूर कर दिया गया था।

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Supreme court revoked Haryana Government 2016 notification saying states have no right to make creamy layer of OBC on economic basis only
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्यों को सिर्फ आर्थिक आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में 'क्रीमी लेयर' बनाने का अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि आर्थिक, सामाजिक और अन्य आधारों पर 'क्रीमी लेयर' बनाई जा सकती है। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार की साल 2016 में जारी एक अधिसूचना को खारिज करते हुए 'क्रीमी लेयर' को फिर से परिभाषित करने के लिए कहा है। 

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जस्टिस एल नागेश्वर राव और अनिरुद्ध बोस ने यह कहते हुए हरियाणा सरकार की 17 अगस्त, 2016 की अधिसूचना को खारिज कर दिया। इसमें सिर्फ आर्थिक आधार पर 'क्रीमी लेयर' निर्धारित की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यह अधिसूचना, इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ है। इंद्रा साहनी मामले में कोर्ट ने आर्थिक, सामाजिक और अन्य आधारों पर 'क्रीमी लेयर' बनाने के लिए कहा था।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इंद्रा साहनी मामले में तय किए गए मापदंडों के बावजूद हरियाणा सरकार ने 2016 की अपनी अधिसूचना में सिर्फ आर्थिक आधार पर 'क्रीमी लेयर' को परिभाषित किया। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ऐसा कर हरियाणा राज्य ने भारी गलती की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सिर्फ इस आधार पर ही हरियाणा सरकार की साल 2016 की अधिसूचना को खारिज किया जा सकता है। 
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शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर इंद्रा साहनी मामले में तय किए गए सिद्धांतों और 2016 के अधिनियम की धारा-5(2) के मानदंडों के आधार पर 'क्रीमी लेयर' को परिभाषित करने के लिए कहा है। अदालत ने यह फैसला पिछड़ा वर्ग कल्याण महासभा (हरियाणा) और अन्य की ओर से दाखिल याचिकाओं पर दिया है। इन याचिकाओं में हरियाणा राज्य की 2016 और 2018 की अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई थी।
 
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि चूंकि हमने 2016 की अधिसूचना को निरस्त कर दिया है इसलिए 2018 की अधिसूचना की वैधता के निपटारे की जरूरत नहीं है क्योंकि 2018 की अधिसूचना पूरी तरीके से 2016 की अधिसूचना पर निर्भर है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2016 और 2018 की अधिसूचनाओं के आधार पर राज्य में जो नौकरियां या शैक्षणिक संस्थानों में जो दाखिले हुए हैं, उनमें छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

दरअसल, हरियाणा सरकार की 2016 की अधिसूचना में ओबीसी में सालाना छह लाख से अधिक आय वाले लोगों को 'क्रीमी लेयर' करार दिया गया था और उन्हें आरक्षण के लाभ से दूर कर दिया गया था। इसके अलावा नॉन 'क्रीमी लेयर' में भी उप वर्गीकरण किया गया था। इस नीति के तहत तीन लाख से कम आय वालों का एक समूह बनाया गया था और दूसरा समूह तीन से छह लाख के बीच वाले लोगों का तैयार किया गया था।। 

इसके तहत तीन लाख तक की आय वाले वर्ग के व्यक्तियों को वरीयता दी गई थी। इसके तहत नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में होने वाले दाखिलों में सबसे पहले तीन लाख से कम आय वाले लोगों को आरक्षण का लाभ मिलने का प्रावधान था। बाकी बचा कोटा तीन से छह लाख की आय वालों के लिए था। इसके बचाव में हरियाणा सरकार ने दलील दी थी कि अधिसूचना जारी करने में इंद्रा साहनी के फैसले का पालन किया गया था। 


हरियाणा सरकार की यह भी दलील थी कि अधिसूचना जारी करने से पहले कमिश्नरों की ओर से जिलेवार ओबीसी वर्ग के लोगों में सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का सर्वेक्षण करके आंकड़े जुटाए गए थे।

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