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Supreme Court: 'स्कूलों में गरीब बच्चों को प्रवेश देना हो राष्ट्रीय मिशन', अदालत की टिप्पणी; दिए ये निर्देश
Wed, 14 Jan 2026 04:06 AM IST
देवेश त्रिपाठी
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Wed, 14 Jan 2026 04:06 AM IST
सार
अदालत ने माना कि ऐसे छात्रों का प्रवेश सुनिश्चित करना एक राष्ट्रीय मिशन और संबंधित सरकारों और स्थानीय अधिकारियों की समान रूप से जिम्मेदारी होनी चाहिए। सांवैधानिक या सिविल कोर्ट को माता-पिता को आसान पहुंच और कुशल राहत प्रदान करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर)
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में गरीब बच्चों को प्रवेश देना राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने अधिकारियों को शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत आरक्षित सीटों के प्रावधान को लागू करने के लिए नियम बनाने का निर्देश दिया।
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शीर्ष अदालत आरटीई अधिनियम के तहत प्रवेश में ईडब्ल्यूएस श्रेणी के छात्रों को होने वाली कठिनाइयों से जुड़ी विशेष अनुमति याचिका पर विचार कर रही थी, जिसमें निजी गैर-सहायता प्राप्त गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में ऐसे बच्चों के लिए 25 फीसदी आरक्षण अनिवार्य किया गया है।
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ईडब्ल्यूएस श्रेणी के बच्चों को प्रवेश देना सरकारों का दायित्व :सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस पीएम नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी के बच्चों को प्रवेश देना सरकारों का दायित्व है। सभी अदालतों को भी उन अभिभावकों को प्रभावी राहत देने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए जो इस अधिकार से वंचित होने की शिकायत करते हैं। याची के बच्चों को 2016 में मुफ्त शिक्षा के लिए स्कूल में सीटें होने के बावजूद प्रवेश नहीं मिला था, तब वह हाईकोर्ट पहुंचे थे।
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...इसलिए दी नजीर
पीठ ने कहा, दुर्भाग्यवश बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के विरुद्ध याचिका लंबे समय से लंबित थी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि याचिकाकर्ता जैसे अभिभावकों को बार-बार ऐसी स्थिति न झेलनी पड़े, हमने इस मामले को मिसाल कायम करने के लिए उचित समझा और आरटीई कानून की धारा 12 (मुफ्त शिक्षा के लिए स्कूल की जिम्मेदारी) के अनुपालन की प्रक्रियाओं की दक्षता की जांच करने का निर्णय लिया।
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अनिवार्य रूप से दें 25 फीसदी छात्रों को प्रवेश
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आस-पड़ोस के स्कूलों की भी यह समान जिम्मेदारी है कि वे आरटीई एक्ट और संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) के तहत अनिवार्य रूप से 25% छात्रों को प्रवेश दें। इसके बाद कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए और मामले को अनुपालन के लिए लंबित रखा है। कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को भी एक पक्ष बनाया है और उसे हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
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