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Supreme Court: साईबाबा को बरी करने के फैसले में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इन्कार, सुनवाई आज

Sat, 15 Oct 2022 05:47 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, नई दिल्ली।
एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Sat, 15 Oct 2022 05:47 AM IST
सार

पीठ ने कहा कि बरी करने का फैसला मेरिट के आधार पर नहीं है बल्कि इस आधार पर है कि मामले में अभियोजन द्वारा अपेक्षित मंजूरी नहीं मांगी गई थी। 

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Supreme Court refuses to interfere in the decision to acquit Sai baba
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई

विस्तार

साईबाबा और अन्य को बरी करने के फैसले को चुनौती देने वाली महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ शनिवार को सुनवाई करेगी। इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ के फैसले के बारे में बताया था।

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उन्होंने कहा कि बरी किए गए व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध ‘गंभीर प्रकृति’ और ‘देश के खिलाफ’ है। उन्होंने कहा कि बरी करने का फैसला मेरिट के आधार पर नहीं है बल्कि इस आधार पर है कि मामले में अभियोजन द्वारा अपेक्षित मंजूरी नहीं मांगी गई थी। 
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उन्होंने पीठ से बरी करने के आदेश पर रोक लगाने की गुहार लगाई और मामले को सोमवार को सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया लेकिन बरी करने के आदेश पर रोक लगाने से इन्कार करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने संकेत दिया कि वह सोमवार को मामले को सूचीबद्ध करने के लिए रजिस्ट्री को निर्देश दे सकते हैं। 
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वैध मंजूरी न होने से निचली अदालत की कार्यवाही अमान्य : बॉम्बे हाईकोर्ट
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और अन्य को बरी करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कहा कि जब 2014 में निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष के आरोप पत्र का संज्ञान लिया तो उस समय साईबाबा के खिलाफ यूएपीए के तहत अभियोजन चलाने की मंजूरी नहीं दी गई थी। 

यूएपीए के तहत वैध मंजूरी न होने के कारण निचली अदालत की कार्यवाही ‘अमान्य’ है और इसलिए निचली अदालत का आदेश रद्द किए जाने के लायक है। मामले में पहले गिरफ्तार पांच आरोपियों के खिलाफ 2014 में यूएपीए के तहत अभियोग चलाने को मंजूरी दी गई थी और साईबाबा के खिलाफ इसकी अनुमति 2015 में दी गई। 


यह भी किए गए बरी 
पीठ ने साईंबाबा के अलावा महेश किरीमन टिर्की, पांडु पोरा नारोते (दोनों किसान), हेम केशवदत्त मिश्रा (छात्र) और प्रशांत सांगलीकर (पत्रकार) को भी बरी कर दिया है। उन्हें भी आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। इसके अलावा 10 साल की सजा पाए विजय टिर्की (श्रमिक) को भी बरी कर दिया गया। नारोते की सुनवाई लंबित होने के दौरान मौत हो गई।

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