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पॉक्सो केस में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: मासूम की आपबीती ही सबूत, यौन शोषण छिपाने वालों पर भी होगी कार्रवाई

Thu, 09 Jul 2026 09:14 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Thu, 09 Jul 2026 09:14 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई नाबालिग पीड़ित किसी बालिग को अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी देता है, तो वही अपराध की पर्याप्त जानकारी मानी जाएगी। इसके बाद पुलिस को सूचना देना कानूनी जिम्मेदारी है। मेडिकल रिपोर्ट में चोट के निशान न होना रिपोर्ट न करने का आधार नहीं बन सकता। शीर्ष अदालत ने और क्या-क्या कहा? जानिए...
 

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supreme court pocso ruling minor victim information mandatory reporting Justice Manoj Misra
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

यौन अपराधों के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई नाबालिग पीड़ित अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी किसी बालिग व्यक्ति को देता है, तो उसे अपराध की पुख्ता जानकारी माना जाएगा। ऐसे में उस व्यक्ति के लिए पुलिस या संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं करने पर उसके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।
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मासूम की बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता: शीर्ष अदालत
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 19(1) में अपराध की जानकारी का मतलब केवल घटना को अपनी आंखों से देखना नहीं है। यदि पीड़ित किसी शिक्षक, रिश्तेदार या अन्य बालिग को अपने साथ हुई घटना बताता है, तो वही पर्याप्त जानकारी मानी जाएगी और उस व्यक्ति पर रिपोर्ट करना कानूनी जिम्मेदारी होगी।
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अरुणाचल के स्कूल से जुड़ा है मामला
यह मामला अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल का है। यहां आठ साल की बच्ची ने आरोप लगाया था कि एक सीनियर छात्र ने उसका यौन उत्पीड़न किया। बच्ची ने इसकी जानकारी अपनी शिक्षिका, बड़ी बहन और सहपाठियों को दी थी। ट्रायल कोर्ट और गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्कूल की हेडमिस्ट्रेस और शिक्षकों को यह कहते हुए राहत दे दी थी कि बच्ची के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं थी, इसलिए उन्हें घटना पर विश्वास करने का पर्याप्त आधार नहीं था।
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सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों का फैसला पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यौन अपराध के हर मामले में शरीर पर चोट के निशान होना जरूरी नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट में बाहरी चोट न मिलने का मतलब यह नहीं कि शिकायत को नजरअंदाज कर दिया जाए या रिपोर्ट न की जाए।

यह भी पढ़ें: Supreme Court: घुड़सवारों के चयन पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट जज विश्वनाथन ने मामले की सुनवाई से खुद को किया अलग

बच्चों से पूछताछ की भी तय की सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि कई बार छोटे बच्चे अपने साथ हुई घटना की गंभीरता को पूरी तरह समझ नहीं पाते। इसलिए उनसे सीमित और संवेदनशील पूछताछ की जा सकती है, लेकिन इसका उद्देश्य शिकायत को झूठा साबित करना या दबाना नहीं होना चाहिए, बल्कि सच्चाई समझना होना चाहिए।


'नाबालिगों को नहीं बनाया जाएगा आरोपी'
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि घटना की जानकारी किसी नाबालिग दोस्त, भाई या बहन को थी और उसने रिपोर्ट नहीं की, तो उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। हालांकि, जिस शिक्षिका ने बच्ची से सीधे शिकायत सुनी थी और फिर भी पुलिस को सूचना नहीं दी, उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट और आईपीसी की धारा 176 के तहत कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

फैसले का क्या मतलब?
इस फैसले के बाद यह कानूनी रूप से स्पष्ट हो गया है कि यदि कोई बच्चा और बच्ची किसी बालिग को अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी देता है, तो उस जानकारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट न करने वाले जिम्मेदार लोगों पर भी कानून का शिकंजा कस सकता है। यह फैसला बच्चों की सुरक्षा और पॉक्सो कानून के प्रभावी पालन की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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