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Supreme Court: तिरंगे का राजनीतिक और धार्मिक इस्तेमाल रोके सरकार, सुप्रीम कोर्ट में याचिका; इस दिन होगी सुनवाई
Sat, 12 Jul 2025 02:15 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Sat, 12 Jul 2025 02:15 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट 14 जुलाई को एक याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें राजनीतिक या धार्मिक मकसद से राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में केंद्र और चुनाव आयोग को निर्देश देने की अपील की गई है कि वे राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम और ध्वज संहिता 2002 को सख्ती से लागू करें और तिरंगे की गरिमा को सुरक्षित रखें।
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कोर्ट। सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को राजनीतिक और धार्मिक मकसदों से इस्तेमाल करने पर रोक लगाने की मांग को लेकर एक अहम याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। इस याचिका में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी या धार्मिक समूह को राष्ट्रीय ध्वज के पक्षपातपूर्ण या धार्मिक उद्देश्य के लिए उपयोग करने से रोका जाए।
यह याचिका 14 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने सुनवाई के लिए पेश की जाएगी। इस बेंच में मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और एन वी अंजारिया शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से अपील की है कि वह केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दे कि वे ऐसे किसी भी प्रयास को रोकें जिसमें राष्ट्रीय ध्वज पर पार्टी का लोगो, धार्मिक चिन्ह या किसी भी तरह का पाठ जोड़ा गया हो।
तिरंगे का सम्मान बनाए रखने की अपील
याचिका में कहा गया है कि तिरंगे का राजनीतिक या धार्मिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल न सिर्फ संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि यह राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 और भारतीय ध्वज संहिता, 2002 का भी उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इन कानूनों का सख्ती से पालन कराया जाए, ताकि तिरंगे का हमेशा सम्मान बना रहे।
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तिरंगे पर नहीं होने चाहिए पार्टी के निशान
याचिका में विशेष तौर पर इस बात पर जोर दिया गया है कि कोई भी राजनीतिक दल तिरंगे पर अपना पार्टी चिन्ह या धार्मिक प्रतीक नहीं लगा सकता। यह अपील तब सामने आई है जब कई बार चुनावी रैलियों, धार्मिक आयोजनों या विरोध प्रदर्शन में तिरंगे को पार्टी के प्रतीक के साथ जोड़ा गया है, जिससे उसकी गरिमा को ठेस पहुंच सकती है।
चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च अदालत से अपील की है कि वह केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को निर्देश दे कि ऐसे मामलों में सख्ती से कार्रवाई की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि संबंधित संस्थाएं सुनिश्चित करें कि राष्ट्रीय ध्वज का किसी भी राजनीतिक फायदे या धार्मिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल न किया जाए।
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कानूनों के पालन पर उठे सवाल
भारतीय ध्वज संहिता और राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 यह स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय ध्वज को किसी भी तरह की अपमानजनक स्थिति में नहीं रखा जा सकता। बावजूद इसके, हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें तिरंगे का इस्तेमाल केवल पार्टी प्रचार या धार्मिक आयोजनों के दौरान किया गया, जिससे उसके सम्मान पर सवाल खड़े हुए।
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की जिम्मेदारी
यह याचिका उन मूल्यों की रक्षा की ओर एक कदम है जो भारत के संविधान और उसके प्रतीकों की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या रुख अपनाता है और क्या इस दिशा में केंद्र व चुनाव आयोग कोई ठोस कदम उठाते हैं।
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यह याचिका 14 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने सुनवाई के लिए पेश की जाएगी। इस बेंच में मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और एन वी अंजारिया शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से अपील की है कि वह केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दे कि वे ऐसे किसी भी प्रयास को रोकें जिसमें राष्ट्रीय ध्वज पर पार्टी का लोगो, धार्मिक चिन्ह या किसी भी तरह का पाठ जोड़ा गया हो।
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तिरंगे का सम्मान बनाए रखने की अपील
याचिका में कहा गया है कि तिरंगे का राजनीतिक या धार्मिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल न सिर्फ संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि यह राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 और भारतीय ध्वज संहिता, 2002 का भी उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इन कानूनों का सख्ती से पालन कराया जाए, ताकि तिरंगे का हमेशा सम्मान बना रहे।
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तिरंगे पर नहीं होने चाहिए पार्टी के निशान
याचिका में विशेष तौर पर इस बात पर जोर दिया गया है कि कोई भी राजनीतिक दल तिरंगे पर अपना पार्टी चिन्ह या धार्मिक प्रतीक नहीं लगा सकता। यह अपील तब सामने आई है जब कई बार चुनावी रैलियों, धार्मिक आयोजनों या विरोध प्रदर्शन में तिरंगे को पार्टी के प्रतीक के साथ जोड़ा गया है, जिससे उसकी गरिमा को ठेस पहुंच सकती है।
चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च अदालत से अपील की है कि वह केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को निर्देश दे कि ऐसे मामलों में सख्ती से कार्रवाई की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि संबंधित संस्थाएं सुनिश्चित करें कि राष्ट्रीय ध्वज का किसी भी राजनीतिक फायदे या धार्मिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल न किया जाए।
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कानूनों के पालन पर उठे सवाल
भारतीय ध्वज संहिता और राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 यह स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय ध्वज को किसी भी तरह की अपमानजनक स्थिति में नहीं रखा जा सकता। बावजूद इसके, हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें तिरंगे का इस्तेमाल केवल पार्टी प्रचार या धार्मिक आयोजनों के दौरान किया गया, जिससे उसके सम्मान पर सवाल खड़े हुए।
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की जिम्मेदारी
यह याचिका उन मूल्यों की रक्षा की ओर एक कदम है जो भारत के संविधान और उसके प्रतीकों की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या रुख अपनाता है और क्या इस दिशा में केंद्र व चुनाव आयोग कोई ठोस कदम उठाते हैं।