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SC on AMU: 'क्या बिना मान्यता आप सिर्फ आवरण ही रहेंगे', एएमयू के तर्क पर सीजेआई की टिप्पणी

Thu, 11 Jan 2024 06:10 AM IST
गुलाम अहमद अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: गुलाम अहमद Updated Thu, 11 Jan 2024 06:10 AM IST
सार

एएमयू ओल्ड बॉयज एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि भारत में मुसलमानों की स्थिति शिक्षा के मामले में अनुसूचित जाति से भी बदतर है। एएमयू की अल्पसंख्यक स्थिति का बचाव करते हुए सिब्बल ने कहा कि भारत में मुसलमान सशक्त नहीं हैं।

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Supreme Court on AMU minority status CJI comments on kapil sibal argument Aligarh Muslim University
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एएमयू ने तर्क दिया है कि इसकी स्थापना मुस्लिम वर्ग की ओर से समुदाय को शिक्षित करने और सशक्त बनाने के लिए की गई थी। तब सीजेआई ने कहा, क्या मान्यता के बिना आप केवल एक आवरण ही रहेंगे। स्थापना आपको अतीत के क्षण में ले जाती है, जबकि प्रशासन निरंतर कारक है।
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सीजेआई ने कहा, हमें देखना होगा कि क्या एएमयू का शासी निकाय ज्यादातर अल्पसंख्यक सदस्यों का है। तब धवन ने जवाब दिया कि इसमें ज्यादातर मुस्लिम शामिल हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अजीज बाशा का फैसला अब एक अच्छा कानून नहीं है और 1981 के संशोधन अधिनियम का हवाला दिया, जिसने एएमयू के अल्पसंख्यक चरित्र को बहाल किया। इस मामले में सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।
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सिब्बल बोले- शिक्षा मामले में एससी से भी बदतर है स्थिति
इस मामले में एएमयू ओल्ड बॉयज एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि भारत में मुसलमानों की स्थिति शिक्षा के मामले में अनुसूचित जाति से भी बदतर है। एएमयू की अल्पसंख्यक स्थिति का बचाव करते हुए सिब्बल ने कहा कि भारत में मुसलमान सशक्त नहीं हैं। सिब्बल ने दलील दी कि अनुच्छेद-30 में सिर्फ कुछ आरक्षण है और अब क्या उन्हें इससे भी वंचित किया जाना चाहिए! हमें इस पर स्पष्ट होना चाहिए कि मुस्लिम शिक्षा के मामले में अनुसूचित जाति से भी नीचे हैं। एएमयू ने अपनी दलील में कहा, हम पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं हैं और खुद को सशक्त बनाने का एकमात्र तरीका शिक्षा है। अधिकतर लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में बहुत अधिक अल्पसंख्यक नहीं हैं और सिर्फ बहुमत वाले हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सशक्त नहीं हैं।’
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अल्पसंख्यकों को पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना का अधिकार...
बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि चाहे धार्मिक हो या भाषाई, प्रत्येक अल्पसंख्यक को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अधिकार होगा। पीठ ने सुनवाई के दूसरे दिन एएमयू के वकील राजीव धवन से कहा, उन्होंने अनुच्छेद-30 की व्याख्या पर यह बिंदु उठाया है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन कौन कर सकता है? सीजेआई ने कहा, मिसाल के लिए, कोई भी संस्था भूमि अनुदान के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती। यदि भूमि नहीं मिलती है, तो निर्माण नहीं कर सकते। इसलिए अस्तित्व उस पट्टे पर निर्भर है, जो आपको सरकार से मिलता है। दूसरा, मौजूदा वक्त में यदि आपको सहायता नहीं मिलती है, तो आप काम करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे का विरोध करने वाले जोर दे रहे हैं कि यह सरकार से सहायता पाने वाला केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए यह अल्पसंख्यक संस्थान होने का दावा नहीं कर सकता। सीजेआई ने कहा, यह पहलू किसी संस्थान के अस्तित्व, व्यावहारिक अस्तित्व के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं, पर इनका संस्थान की स्थापना पर कोई असर नहीं पड़ता है।  
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