Supreme Court: ललितपुर में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म पर केंद्र, यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने केंद्र, यूपी सरकार व अन्य को 18 अगस्त तक जवाब दाखिल करने को कहा है।
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सुप्रीम कोर्ट ने ललितपुर में एक नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म मामले में केंद्र, यूपी सरकार व अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पीड़िता के साथ थाने में भी यौन उत्पीड़न किया गया।
जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने केंद्र, यूपी सरकार व अन्य को 18 अगस्त तक जवाब दाखिल करने को कहा है। एनजीओ के वकील एचएच फूलका ने पीठ को बताया कि नाबालिग लड़की की जान को खतरा है और एनजीओ ने उसे घटनास्थल से दूर एक स्कूल हॉस्टल में भर्ती करा दिया है। उन्होंने बताया कि स्थानीय प्रशासन ने उसे कोई मदद नहीं की है। यही नहीं, दलित नाबालिग लड़की से सामूहिक दुष्कर्म के पांच महीने बाद तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई, बल्कि पुलिस विभाग ने पीड़िता व उसके परिवार को धमका कर प्रताड़ित भी किया। थाने में उसके साथ यौन उत्पीड़न भी किया गया।
अविवाहित महिला को सुरक्षित गर्भपात पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाते हुए कहा कि एक अविवाहित महिला को सुरक्षित गर्भपात के अधिकार से वंचित करना उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट अब मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम और संबंधित नियमों की व्याख्या करेगा कि क्या अविवाहित महिलाओं को चिकित्सकीय सलाह पर 24 सप्ताह के गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने शुक्रवार को केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को इस प्रक्रिया में अदालत की सहायता करने को कहा।
अदालत ने कहा, जब कानून के तहत अपवाद प्रदान किए गए हैं, और यदि चिकित्सा सलाह अनुमति देती है तो अविवाहित महिलाओं को 24 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए शामिल क्यों नहीं किया जा सकता है। संसदीय मंशा स्पष्ट प्रतीत होती है क्योंकि इसने पति को साथी के साथ बदल दिया है। यह दर्शाता है कि उन्होंने अविवाहित महिलाओं को भी 24 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने वालों की श्रेणी में माना है।
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आरे में पेड़ नहीं काटे, सिर्फ कुछ खरपतवार हटाई गई: मुंबई मेट्रो
मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमएमआरसीएल) ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा कि मुंबई के आरे जंगल में कोई पेड़ नहीं काटा गया है। वहां सिर्फ कुछ खरपतवार, झाड़ियाें और शाखाओं को हटाया गया है।
जस्टिस यूयू ललित की पीठ के समक्ष स्थानीय निवासियों के एक समूह के वकील चंदर उदय सिंह ने दलील दी कि मेट्रो कार शेड परियोजना के लिए आरे वन क्षेत्र में यथास्थिति के आदेशों के बावजूद पेड़ों की कटाई फिर से शुरू कर दी गई है। इस पर पीठ ने कहा, मामले को विस्तार से सुनने की जरूरत है। एमएमआरसीएल की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, क्षेत्र में कोई पेड़ नहीं काटा जा रहा था। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के यथास्थिति आदेश के बाद कोई पेड़ नहीं काटा गया। हालांकि, क्षेत्र में खरपतवार और झाड़ियां थीं, जिन्हें संबंधित अथॉरिटी द्वारा हटाया जा रहा था। पीठ अब 13 अगस्त को इस मामले में सुनवाई करेगी।
खिलाफ याचिका पर 9 सितंबर को सुनवाई
सीजेआई एनवी रमण की पीठ को वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने बताया कि इस याचिका को छह बार हटाया गया है। अब इसे 9 सितंबर को सूचीबद्ध किया जाना है। कृपया आप निर्देश दें कि इसे इस बार हटाया न जाए। भाजपा नेता व वकील अश्विनी उपाध्याय की इस मामले में दाखिल एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 12 मार्च को केंद्र से जवाब मांगा था। हाल ही में 29 जुलाई को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने छह अलग-अलग याचिकाओं पर विचार करने से इन्कार कर दिया था और याचिकाकर्ता को उपाध्याय की लंबित जनहित याचिका में हस्तक्षेप याचिकाएं दाखिल करने को कहा था।