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SC: सुप्रीम कोर्ट से आगरा नगर निगम को लगा झटका; वाहनों में स्टिकर लगाने का मामला, NCR राज्यों से अपडेट तलब
Mon, 04 Nov 2024 08:20 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Mon, 04 Nov 2024 08:20 PM IST
सार
जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने बलवंत सिंह राजोआना की याचिका पर सुनवाई दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।
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Supreme Court
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि अगर वे बेअंत सिंह हत्याकांड के दोषी बलवंत सिंह राजोआना की दया याचिका पर विचार नहीं करते हैं तो हम करेंगे। बेअंत सिंह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री थे, साल 1995 में उनकी हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में बलवत सिंह राजोआना को दोषी ठहराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की
जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने बलवंत सिंह राजोआना की याचिका पर सुनवाई दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। याचिका में कहा गया है कि उसकी दया याचिका पर फैसला लेने में हुई बहुत देरी के कारण उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल देना चाहिए। 25 सितंबर को शीर्ष अदालत ने राजोआना की याचिका पर केंद्र, पंजाब सरकार और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के प्रशासन से जवाब मांगा था।
राष्ट्रपति के पास लंबित है याचिका
केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि राजोआना की दया याचिका राष्ट्रपति भवन में लंबित है, जिसके बाद पीठ ने उनसे कहा, 'किसी भी तरह से फैसला करें या हम इस पर (राजोआना की याचिका) विचार करेंगे।' दया याचिका पर फैसला होने तक राजोआना की रिहाई की मांग करते हुए राजोआना के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि रजोआना 29 साल से लगातार हिरासत में है। रोहतगी ने कहा कि 'उनकी दया याचिका पिछले 12 साल से राष्ट्रपति भवन में लंबित है। कृपया उन्हें छह या तीन महीने के लिए रिहा कर दें। कम से कम उन्हें यह देखने दें कि बाहरी दुनिया कैसी दिखती है।' वहीं पंजाब सरकार ने पीठ को बताया कि उन्हें मामले में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए कुछ समय चाहिए।
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1995 में हुई थी पंजाब के तत्कालीन सीएम की हत्या
31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में सिविल सचिवालय के प्रवेश द्वार पर हुए विस्फोट में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और 16 अन्य लोग मारे गए थे। इस मामले में जुलाई 2007 में एक विशेष अदालत ने बलवंत सिंह राजोआना को दोषी ठहराते हुए उसे मौत की सजा सुनाई थी। मार्च 2012 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने उसकी ओर से संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दया याचिका दायर की थी। पिछले साल 3 मई को सर्वोच्च न्यायालय ने राजोआना की मौत की सजा को कम करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि सक्षम प्राधिकारी ही दया याचिका पर विचार कर सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की
जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने बलवंत सिंह राजोआना की याचिका पर सुनवाई दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। याचिका में कहा गया है कि उसकी दया याचिका पर फैसला लेने में हुई बहुत देरी के कारण उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल देना चाहिए। 25 सितंबर को शीर्ष अदालत ने राजोआना की याचिका पर केंद्र, पंजाब सरकार और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के प्रशासन से जवाब मांगा था।
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राष्ट्रपति के पास लंबित है याचिका
केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि राजोआना की दया याचिका राष्ट्रपति भवन में लंबित है, जिसके बाद पीठ ने उनसे कहा, 'किसी भी तरह से फैसला करें या हम इस पर (राजोआना की याचिका) विचार करेंगे।' दया याचिका पर फैसला होने तक राजोआना की रिहाई की मांग करते हुए राजोआना के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि रजोआना 29 साल से लगातार हिरासत में है। रोहतगी ने कहा कि 'उनकी दया याचिका पिछले 12 साल से राष्ट्रपति भवन में लंबित है। कृपया उन्हें छह या तीन महीने के लिए रिहा कर दें। कम से कम उन्हें यह देखने दें कि बाहरी दुनिया कैसी दिखती है।' वहीं पंजाब सरकार ने पीठ को बताया कि उन्हें मामले में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए कुछ समय चाहिए।
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1995 में हुई थी पंजाब के तत्कालीन सीएम की हत्या
31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में सिविल सचिवालय के प्रवेश द्वार पर हुए विस्फोट में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और 16 अन्य लोग मारे गए थे। इस मामले में जुलाई 2007 में एक विशेष अदालत ने बलवंत सिंह राजोआना को दोषी ठहराते हुए उसे मौत की सजा सुनाई थी। मार्च 2012 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने उसकी ओर से संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दया याचिका दायर की थी। पिछले साल 3 मई को सर्वोच्च न्यायालय ने राजोआना की मौत की सजा को कम करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि सक्षम प्राधिकारी ही दया याचिका पर विचार कर सकते हैं।
बिहार में पुल ढहने की घटनाओं से संबंधित जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर सकता है सुप्रीम कोर्ट
बिहार में हाल के समय में कई पुल ढहने की घटनाएं हुई हैं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें बिहार के पुलों की सुरक्षा के बारे में चिंता जाहिर की गई है। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इन याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर विचार कर रहा है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने इस साल 29 जुलाई को जनहित याचिका (पीआईएल) पर बिहार सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) सहित अन्य से जवाब मांगा था।
सोमवार को याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने सुनवाई के लिए याचिका का उल्लेख किया। इस पर सीजेआई ने कहा कि 'मैं इस पर विचार करूंगा'। जनहित याचिका में पुलों के संरचनात्मक ऑडिट के लिए एक विशेषज्ञ पैनल गठित करने की मांग की गई थी। इस विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों के आधार पर पुलों को मजबूत करने या उन्हें ध्वस्त करने की मांग भी की गई है। राज्य और एनएचएआई के अलावा शीर्ष अदालत ने सड़क निर्माण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के अध्यक्ष और ग्रामीण कार्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को भी नोटिस जारी किया था। इस साल मई, जून और जुलाई के दौरान बिहार के सीवान, सारण, मधुबनी, अररिया, पूर्वी चंपारण और किशनगंज जिलों में पुल ढहने की दस घटनाएं सामने आई हैं। कई लोगों ने दावा किया कि भारी बारिश के कारण ये घटनाएं हुई हैं।
सोमवार को याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने सुनवाई के लिए याचिका का उल्लेख किया। इस पर सीजेआई ने कहा कि 'मैं इस पर विचार करूंगा'। जनहित याचिका में पुलों के संरचनात्मक ऑडिट के लिए एक विशेषज्ञ पैनल गठित करने की मांग की गई थी। इस विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों के आधार पर पुलों को मजबूत करने या उन्हें ध्वस्त करने की मांग भी की गई है। राज्य और एनएचएआई के अलावा शीर्ष अदालत ने सड़क निर्माण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के अध्यक्ष और ग्रामीण कार्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को भी नोटिस जारी किया था। इस साल मई, जून और जुलाई के दौरान बिहार के सीवान, सारण, मधुबनी, अररिया, पूर्वी चंपारण और किशनगंज जिलों में पुल ढहने की दस घटनाएं सामने आई हैं। कई लोगों ने दावा किया कि भारी बारिश के कारण ये घटनाएं हुई हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए मामले में आरोपी केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को दी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन की उस याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें कप्पन ने अपने खिलाफ दर्ज यूएपीए मामले में हर हफ्ते पुलिस को रिपोर्ट करने की जमानत की शर्त में ढील देने की मांग की थी। जस्टिस पीएस नरसिम्हन और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सितंबर 2022 में जमानत देते हुए कप्पन पर शीर्ष अदालत द्वारा लगाई गई जमानत की शर्त में ढील देने का आदेश दिया। पीठ ने कहा, '9 सितंबर, 2022 के आदेश को संशोधित किया जाता है और याचिकाकर्ता के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना आवश्यक नहीं होगा। वर्तमान आवेदन में की गई अन्य प्रार्थनाओं पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जा सकता है।'
14 सितंबर, 2020 को उत्तर प्रदेश के हाथरस के एक गांव में चार लोगों द्वारा कथित दुष्कर्म के एक पखवाड़े बाद पीड़ित महिला की दिल्ली के एक अस्पताल में मौत हो गई थी। उसका अंतिम संस्कार उसके गांव में आधी रात को किया गया था। पीड़िता के परिवार ने दावा किया था कि उनकी सहमति के बिना अंतिम संस्कार किया गया था और उन्हें शव को आखिरी बार घर लाने की अनुमति नहीं दी गई थी। कप्पन को अक्तूबर 2020 में इस मामले की रिपोर्टिंग के लिए हाथरस जाते समय गिरफ्तार किया गया था। कप्पन सहित चार लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
आरोप है कि कप्पन का कथित तौर पर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से संबंध था। पीएफआई पर पहले भी देश भर में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को वित्तपोषित करने का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी हाथरस में कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे।
9 सितंबर, 2022 को शीर्ष अदालत ने लगभग दो साल से जेल में बंद कप्पन को जमानत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के लिए कई शर्तें रखी थीं, जिसमें यह भी शामिल था कि उसे जेल से रिहा होने के बाद अगले छह सप्ताह तक दिल्ली में रहना होगा और हर हफ्ते सोमवार को दिल्ली के निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना होगा। अदालत ने कहा था कि छह महीने के बाद वह केरल में अपने पैतृक स्थान मलप्पुरम जा सकता है और वहां भी उसे उसी तरह स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना होगा।
14 सितंबर, 2020 को उत्तर प्रदेश के हाथरस के एक गांव में चार लोगों द्वारा कथित दुष्कर्म के एक पखवाड़े बाद पीड़ित महिला की दिल्ली के एक अस्पताल में मौत हो गई थी। उसका अंतिम संस्कार उसके गांव में आधी रात को किया गया था। पीड़िता के परिवार ने दावा किया था कि उनकी सहमति के बिना अंतिम संस्कार किया गया था और उन्हें शव को आखिरी बार घर लाने की अनुमति नहीं दी गई थी। कप्पन को अक्तूबर 2020 में इस मामले की रिपोर्टिंग के लिए हाथरस जाते समय गिरफ्तार किया गया था। कप्पन सहित चार लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
आरोप है कि कप्पन का कथित तौर पर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से संबंध था। पीएफआई पर पहले भी देश भर में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को वित्तपोषित करने का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी हाथरस में कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे।
9 सितंबर, 2022 को शीर्ष अदालत ने लगभग दो साल से जेल में बंद कप्पन को जमानत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के लिए कई शर्तें रखी थीं, जिसमें यह भी शामिल था कि उसे जेल से रिहा होने के बाद अगले छह सप्ताह तक दिल्ली में रहना होगा और हर हफ्ते सोमवार को दिल्ली के निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना होगा। अदालत ने कहा था कि छह महीने के बाद वह केरल में अपने पैतृक स्थान मलप्पुरम जा सकता है और वहां भी उसे उसी तरह स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट से आगरा नगर निगम को लगा झटका
उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषण को नियंत्रित करने में विफल रहने पर 58.38 करोड़ रुपये की पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाने के राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश को आगरा नगर निगम की तरफ से दी गयी चुनौती को सोमवार को खारिज कर दिया।
सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने यह कहते हुए निगम की अपील खारिज कर दी कि उसने प्रदूषण को कम करने के लिए कुछ नहीं किया और उल्टे उसने पर्यावरण एवं स्थानीय लोगों के लिए नरक जैसी स्थिति पैदा कर दी। पीठ ने कहा कि शहर के अपशिष्ट शोधन संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं, जिससे यमुना में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।
एनजीटी ने फरवरी और दिसंबर 2023 के बीच यमुना नदी में अशोधित अपशिष्ट को प्रवाहित करने की कथित अनुमति देने को लेकर आगरा नगर निगम पर जुर्माना लगाया था। एनजीटी ने अप्रैल में आगरा नगर निगम को तीन महीने के भीतर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास 58.38 करोड़ रुपये का जुर्माना जमा करने का आदेश दिया था। अपने उस आदेश में अधिकरण ने पर्यावरण क्षति के मामलों में जवाबदेही की आवश्यकता पर बल दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषण को नियंत्रित करने में विफल रहने पर 58.38 करोड़ रुपये की पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाने के राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश को आगरा नगर निगम की तरफ से दी गयी चुनौती को सोमवार को खारिज कर दिया।
सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने यह कहते हुए निगम की अपील खारिज कर दी कि उसने प्रदूषण को कम करने के लिए कुछ नहीं किया और उल्टे उसने पर्यावरण एवं स्थानीय लोगों के लिए नरक जैसी स्थिति पैदा कर दी। पीठ ने कहा कि शहर के अपशिष्ट शोधन संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं, जिससे यमुना में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।
एनजीटी ने फरवरी और दिसंबर 2023 के बीच यमुना नदी में अशोधित अपशिष्ट को प्रवाहित करने की कथित अनुमति देने को लेकर आगरा नगर निगम पर जुर्माना लगाया था। एनजीटी ने अप्रैल में आगरा नगर निगम को तीन महीने के भीतर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास 58.38 करोड़ रुपये का जुर्माना जमा करने का आदेश दिया था। अपने उस आदेश में अधिकरण ने पर्यावरण क्षति के मामलों में जवाबदेही की आवश्यकता पर बल दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने NCR राज्यों से वाहनों में स्टिकर लगाने के मामले में मांगा अपडेट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र, दिल्ली और अन्य एनसीआर राज्यों से वाहनों में होलोग्राम-आधारित रंग कोडित स्टिकर के उपयोग पर अपने निर्देश पर अनुपालन अद्यतन जानकारी मांगी। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण पर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वाहनों के लिए होलोग्राम-आधारित रंग कोडित स्टिकर की योजना को सख्ती से लागू करने के लिए 13 दिसंबर, 2023 को दिए गए निर्देश का अनुपालन नहीं किया गया है।
पीठ ने निर्देश दिया, हम सभी एनसीआर राज्यों को आज से एक महीने के भीतर हलफनामा भरकर अनुपालन की रिपोर्ट देने का निर्देश देते हैं। 2018 में, शीर्ष अदालत ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, जिसमें परिकल्पना की गई थी कि पेट्रोल और सीएनजी का उपयोग करने वाले वाहनों में होलोग्राम-आधारित हल्के नीले रंग के स्टिकर का उपयोग किया जाएगा, जबकि डीजल से चलने वाले वाहनों में नारंगी रंग के स्टिकर होंगे। इन स्टिकर में वाहन के पंजीकरण की तारीख भी शामिल होनी चाहिए थी।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद, केंद्र ने होलोग्राम-आधारित स्टिकर की योजना को कानूनी मान्यता देने के लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 50 और उच्च सुरक्षा पंजीकरण प्लेट आदेश 2001 में संशोधन किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह, जिन्हें एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया है, ने प्रस्तुत किया कि दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर चलने वाले 50 प्रतिशत से अधिक वाहनों में रंग-कोडित स्टिकर नहीं हैं। रंग-कोडित स्टिकर योजना को शुरू में एमिकस क्यूरी द्वारा वाहनों की पहचान करने और "खराब श्रेणी" प्रदूषण वाले दिनों में खराब गुणवत्ता वाले ईंधन का उपयोग करने वाले वाहनों को प्रतिबंधित करने के लिए सुझाया गया था।
वहीं केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने कहा कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सभी राज्यों को शीर्ष अदालत के 13 दिसंबर, 2023 के आदेश का अनुपालन करने के लिए पत्र लिखा है। इसके बाद पीठ ने सभी राज्यों को वाहनों के लिए रंग-कोडित स्टिकर पर शीर्ष अदालत के आदेशों के अनुपालन पर रिपोर्ट करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र, दिल्ली और अन्य एनसीआर राज्यों से वाहनों में होलोग्राम-आधारित रंग कोडित स्टिकर के उपयोग पर अपने निर्देश पर अनुपालन अद्यतन जानकारी मांगी। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण पर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वाहनों के लिए होलोग्राम-आधारित रंग कोडित स्टिकर की योजना को सख्ती से लागू करने के लिए 13 दिसंबर, 2023 को दिए गए निर्देश का अनुपालन नहीं किया गया है।
पीठ ने निर्देश दिया, हम सभी एनसीआर राज्यों को आज से एक महीने के भीतर हलफनामा भरकर अनुपालन की रिपोर्ट देने का निर्देश देते हैं। 2018 में, शीर्ष अदालत ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, जिसमें परिकल्पना की गई थी कि पेट्रोल और सीएनजी का उपयोग करने वाले वाहनों में होलोग्राम-आधारित हल्के नीले रंग के स्टिकर का उपयोग किया जाएगा, जबकि डीजल से चलने वाले वाहनों में नारंगी रंग के स्टिकर होंगे। इन स्टिकर में वाहन के पंजीकरण की तारीख भी शामिल होनी चाहिए थी।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद, केंद्र ने होलोग्राम-आधारित स्टिकर की योजना को कानूनी मान्यता देने के लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 50 और उच्च सुरक्षा पंजीकरण प्लेट आदेश 2001 में संशोधन किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह, जिन्हें एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया है, ने प्रस्तुत किया कि दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर चलने वाले 50 प्रतिशत से अधिक वाहनों में रंग-कोडित स्टिकर नहीं हैं। रंग-कोडित स्टिकर योजना को शुरू में एमिकस क्यूरी द्वारा वाहनों की पहचान करने और "खराब श्रेणी" प्रदूषण वाले दिनों में खराब गुणवत्ता वाले ईंधन का उपयोग करने वाले वाहनों को प्रतिबंधित करने के लिए सुझाया गया था।
वहीं केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने कहा कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सभी राज्यों को शीर्ष अदालत के 13 दिसंबर, 2023 के आदेश का अनुपालन करने के लिए पत्र लिखा है। इसके बाद पीठ ने सभी राज्यों को वाहनों के लिए रंग-कोडित स्टिकर पर शीर्ष अदालत के आदेशों के अनुपालन पर रिपोर्ट करने का निर्देश दिया।
यूपी मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर फैसला कल
सुप्रीम कोर्ट कल उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच उन याचिकाओं पर निर्णय देगी, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रही हैं। हाई कोर्ट ने इस अधिनियम को धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन मानते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया था।
प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ दायर अंजुम कादरी की मुख्य याचिका सहित आठ याचिकाओं पर अपना फैसला 22 अक्टूबर को सुरक्षित रख लिया था।
सुप्रीम कोर्ट कल उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच उन याचिकाओं पर निर्णय देगी, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रही हैं। हाई कोर्ट ने इस अधिनियम को धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन मानते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया था।
प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ दायर अंजुम कादरी की मुख्य याचिका सहित आठ याचिकाओं पर अपना फैसला 22 अक्टूबर को सुरक्षित रख लिया था।
एक महीने के भीतर डिटेंशन कैंपों में समुचित सुविधाएं सुनिश्चित करे असम: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को असम सरकार को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर राज्य के डिटेंशन कैंपों में समुचित सुविधाएं सुनिश्चित करे। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राज्य की अथॉरिटी को ऐसे कैंपों का दौरा करने और सभी संबंधित अथॉरिटी के साथ बैठक करने का निर्देश दिया। जस्टिस ओका ने कहा, राज्य के विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का भी अभाव है। यहां महिला डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं हैं। कृपया सुनिश्चित करें कि सुविधाएं उपलब्ध हों। कोर्ट ने असम विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को भी बैठक में शामिल होने और 9 दिसंबर तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत असम के डिटेंशन सेंटरों की स्थिति के बारे में एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इन डिटेंशन सेंटरों में संदिग्ध नागरिकता वाले या न्यायाधिकरणों की ओर से विदेशी माने जाने वाले लोगों को हिरासत में रखा जाता है। इस साल की शुरुआत में, पीठ ने गोलपारा जिले के मटिया केंद्र की स्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई थी। 64 करोड़ रुपये की लागत से बना मटिया ट्रांजिट कैंप देश का सबसे बड़ा केंद्र है। जुलाई में मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी, कितनी दयनीय स्थिति है। पानी या साफ-सफाई की सुविधा भी नहीं है। भोजन और चिकित्सा सहायता के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को मटिया हिरासत केंद्र में खराब स्वच्छता स्थितियों के लिए असम राज्य की फिर से खिंचाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को असम सरकार को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर राज्य के डिटेंशन कैंपों में समुचित सुविधाएं सुनिश्चित करे। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राज्य की अथॉरिटी को ऐसे कैंपों का दौरा करने और सभी संबंधित अथॉरिटी के साथ बैठक करने का निर्देश दिया। जस्टिस ओका ने कहा, राज्य के विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का भी अभाव है। यहां महिला डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं हैं। कृपया सुनिश्चित करें कि सुविधाएं उपलब्ध हों। कोर्ट ने असम विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को भी बैठक में शामिल होने और 9 दिसंबर तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत असम के डिटेंशन सेंटरों की स्थिति के बारे में एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इन डिटेंशन सेंटरों में संदिग्ध नागरिकता वाले या न्यायाधिकरणों की ओर से विदेशी माने जाने वाले लोगों को हिरासत में रखा जाता है। इस साल की शुरुआत में, पीठ ने गोलपारा जिले के मटिया केंद्र की स्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई थी। 64 करोड़ रुपये की लागत से बना मटिया ट्रांजिट कैंप देश का सबसे बड़ा केंद्र है। जुलाई में मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी, कितनी दयनीय स्थिति है। पानी या साफ-सफाई की सुविधा भी नहीं है। भोजन और चिकित्सा सहायता के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को मटिया हिरासत केंद्र में खराब स्वच्छता स्थितियों के लिए असम राज्य की फिर से खिंचाई की।
सुप्रीम कोर्ट का दोषियों के लिए छूट नीति में सुधार के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने देश में दोषियों को स्थायी छूट देने वाली नीतियों के मानकीकरण और पारदर्शिता में सुधार के उद्देश्य से कई निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस अभय एस ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के निर्देशों में नीतिगत जानकारी तक अधिक पहुंच, निर्णयों का समय पर संचार और मनमानी शर्तों को रोकने के लिए मामलों पर व्यक्तिगत विचार-विमर्श अनिवार्य किया गया है।
पीठ 2021 के एक स्वप्रेरणा मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसका शीर्षक था 'जमानत देने के लिए नीति रणनीति' और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे एक सप्ताह के भीतर स्थायी छूट के लिए आवेदनों की अस्वीकृति के बारे में दोषियों को सूचित करें। उन्हें इन अस्वीकृतियों की प्रतियां संबंधित जिला कानूनी सेवा प्राधिकरणों को भी भेजनी होंगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दोषियों को कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए उचित कदम उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने देश में दोषियों को स्थायी छूट देने वाली नीतियों के मानकीकरण और पारदर्शिता में सुधार के उद्देश्य से कई निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस अभय एस ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के निर्देशों में नीतिगत जानकारी तक अधिक पहुंच, निर्णयों का समय पर संचार और मनमानी शर्तों को रोकने के लिए मामलों पर व्यक्तिगत विचार-विमर्श अनिवार्य किया गया है।
पीठ 2021 के एक स्वप्रेरणा मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसका शीर्षक था 'जमानत देने के लिए नीति रणनीति' और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे एक सप्ताह के भीतर स्थायी छूट के लिए आवेदनों की अस्वीकृति के बारे में दोषियों को सूचित करें। उन्हें इन अस्वीकृतियों की प्रतियां संबंधित जिला कानूनी सेवा प्राधिकरणों को भी भेजनी होंगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दोषियों को कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए उचित कदम उठाए गए हैं।