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SC Updates: महंगी मुकदमेबाजी पर आयकर विभाग को फटकार; आरजी कर मामले में अब एक अक्तूबर को होगी सुनवाई

Mon, 23 Sep 2024 03:17 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Mon, 23 Sep 2024 03:17 PM IST
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supreme court news and updates today: SC to hear suo motu plea on October 1 in Kolkata doctor rape-murder case
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई

सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता हत्याकांड को लेकर सोमवार को कहा कि वह इस मामले में एक अक्तूबर को सुनवाई करेगा। बता दें, शीर्ष अदालत ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में परास्नातक प्रशिक्षु चिकित्सक से दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले से जुड़ी याचिका पर स्वत: संज्ञान लिया था। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ मामले पर सुनवाई कर रही है। 

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इस मामले को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। डॉक्टरों में लगातार गुस्सा बना हुआ है। सभी लोग पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए लगातार सरकार पर दवाब डाल रहे हैं। राज्य सरकार पर लगातार सवाल खड़े होने पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान लिया था।
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एक पक्ष ने किया यह अनुरोध
सोमवार को कार्यवाही शुरू होते ही मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ से एक पक्ष की ओर से पेश वकील ने अनुरोध किया कि कुछ कारणों की वजह से इस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते की जाए। इस पर सीजेआई ने कहा, 'हम अगले मंगलवार यानी एक अक्तूबर को इस मामले में सुनवाई करेंगे।'
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इससे पहले अदालत ने 17 सितंबर को कहा था कि सीबीआई जो जांच कर रही है, उसका आज खुलासा करने से प्रक्रिया प्रभावित होगी, सीबीआई ने जो रास्ता अपनाया है, वह सच्चाई को उजागर करना है। एसएचओ को खुद गिरफ्तार किया गया है। हमने स्थिति रिपोर्ट देखी है और सीबीआई ने हमारे द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों पर जवाब दिया है, जिसमें शामिल है कि क्या चालान दिया गया था, पीएमआर की प्रक्रिया क्या थी, क्या सबूत नष्ट किए गए थे, क्या किसी अन्य व्यक्ति की मिलीभगत थी आदि।

यह है मामला
गौरतलब है, अस्पताल के सेमिनार कक्ष में नौ अगस्त को प्रशिक्षु डॉक्टर का शव मिलने के बाद से घटना के विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन हो रहे हैं। पुलिस ने इस सिलसिले में कोलकाता पुलिस के नागरिक स्वयंसेवक संजय रॉय को गिरफ्तार किया था। टीएमसी सरकार और पश्चिम बंगाल पुलिस कठघरे में है। सुप्रीम कोर्ट से लगातार फटकार लग रही है। तनाव बढ़ता देख कलकत्ता हाईकोर्ट ने 13 अगस्त को जांच सीबीआई को सौंप दी थी। इससे पहले कोलकाता पुलिस मामले की जांच कर रही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने महंगी मुकदमेबाजी पर आयकर विभाग को लगाई फटकार

supreme court news and updates today: SC to hear suo motu plea on October 1 in Kolkata doctor rape-murder case
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट ने आयकर विभाग को छोटी रकम के मामले में लंबी और महंगी मुकदमेबाजी के लिए फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ एक अपील को खारिज करते हुए की। हाईकोर्ट ने आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखा था। संबंधित मामला 1.5 लाख रुपये का था। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि एक वादी को सुप्रीम कोर्ट में पूरी जिम्मेदारी के साथ आना चाहिए। पीठ ने कहा, हम यह समझने में विफल हैं कि छोटी रकम के लिए यह मामला क्यों है। यहां इतनी मुकदमेबाजी आयकर विभाग की वजह से है! आप इस पर कितना खर्च कर रहे हैं? इससे तो अधिक खर्च सुप्रीम कोर्ट में एक दिन के लिए उपस्थिति की फीस है। पीठ ने कहा कि यदि कोई कानूनी प्रश्न है तो उसे उचित मामले में जांचा जा सकता है।

अनुचित मुकदमेबाजी पर पहले भी नाराज हुआ सुप्रीम कोर्ट
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने अनावश्यक मुकदमेबाजी पर नाराजगी जताई है। पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर दुख जताया था कि सरकारी मुकदमों का एक बड़ा हिस्सा निरर्थक है। कोर्ट ने कहा था कि निरर्थक याचिकाएं दायर करने से अदालत का कार्यभार अनावश्यक रूप से बढ़ रहा है। पिछले साल मई में जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने टिप्पणी की थी कि केंद्र और राज्य सरकारों के कम से कम 40 फीसदी मुकदमे निरर्थक हैं। अप्रैल 2023 में, सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि केंद्र सरकार को कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए मुकदमेबाजी का सहारा लेने के बजाय बड़े पैमाने पर मध्यस्थता को अपनाना चाहिए

लड्डू विवाद की जांच के लिए समिति के गठन की मांग
तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के पूर्व चेयरमैन और वाईएसआर पार्टी सांसद वाईवी सुब्बा रेड्डी ने तिरुमाला के वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में प्रसाद के रूप में परोसे गए लड्डू बनाने के लिए घी में पशु वसा के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति के गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुब्रमण्यम स्वामी ने तिरुपति लड्डू विवाद में सुप्रीम कोर्ट का किया रुख 
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय का रुख करते हुए तिरुपति लड्डू बनाने में पशु वसा के कथित उपयोग की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की। भाजपा नेता ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह आंध्र प्रदेश सरकार को लड्डू बनाने में इस्तेमाल किए गए घी के स्रोत और नमूने पर एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दे। उन्होंने कोर्ट से संबंधित अधिकारियों से एक विस्तृत फोरेंसिक रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए अंतरिम निर्देश जारी करने का भी आग्रह किया।

उनकी याचिका में कहा गया है, प्रसाद बनाने में इस्तेमाल होने वाली कई सामग्रियों की आपूर्ति करने वाले आपूर्तिकर्ताओं की गुणवत्ता या उसकी कमी की निगरानी और सत्यापन के लिए आंतरिक रूप से जांच और संतुलन होना चाहिए था। सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका के बारे में एक्स पर पोस्ट भी किया।

लड्डू विवाद- पूर्व टीटीडी अध्यक्ष ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
आंध्र प्रदेश में तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के पूर्व अध्यक्ष वाईवी सुब्बा रेड्डी ने तिरुमाला के श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में लड्डू प्रसादम बनाने के लिए घी में घटिया सामग्री और पशु वसा के आरोपों की जांच के लिए एक सेवानिवृत्त शीर्ष अदालत के न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति के गठन के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

क्या पत्नी से जबरन संबंध बनाने पर दुष्कर्म केस से मिली छूट होगी खत्म? सुप्रीम कोर्ट कल करेगा सुनवाई

अगर कोई व्यक्ति अपनी बालिग पत्नी को यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता है तो क्या ऐसे में पति को दुष्कर्म के अपराध के लिए मुकदमे से छूट मिलनी चाहिए? इन्हीं सब सवालों की याचिका पर अब सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को सुनवाई करेगा। देश के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कियाचिकाएं पहले ही कल सूचीबद्ध हो चुकी हैं और कुछ मामलों की आंशिक सुनवाई के बाद इन पर सुनवाई होगी। बता दें, पीठ में न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। मामले में वादी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने की याचिकाओं का उल्लेख किया।

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 16 जुलाई को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति व्यक्त की थी। उस समय सीजेआई ने संकेत दिया था कि मामलों की सुनवाई 18 जुलाई को हो सकती है।

क्या है दुष्कर्म की धारा में अपवाद?
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375, जिसे अब निरस्त कर दिया गया है और भारतीय न्याय संहित द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, दुष्कर्म (रेप) को परिभाषित करती है। इस धारा में वर्णित शर्तों में एक अपवाद भी दर्ज है जिसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। दरअसल, इस अपवाद में पति को अपनी बालिग पत्नी के साथ गैर-सहमति से यौन संबंध बनाने के लिए दुष्कर्म के तहत मुकदमा चलाने से छूट देता है। इसमें कहा गया है, 'पति अगर अपनी पत्नी के साथ, जिसकी उम्र 15 वर्ष से कम नहीं है, तो वह दुष्कर्म नहीं है।'

वहीं, नए कानून के तहत भी धारा 63 (रेप) का अपवाद 2 कहता है कि किसी शख्स द्वारा अपनी पत्नी के साथ गैर-सहमति से यौन संबंध बनाया जाता है, जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम नहीं है, तो वह दुष्कर्म नहीं है।'

सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर केंद्र सरकार ने दिया था जवाब
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी 2023 को वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध के दायरे में लाने का अनुरोध करने वाली और आईपीसी के उस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जो पति को बालिग पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध को दुष्कर्म नहीं ठहराता है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि इस मुद्दे के कानूनी तथा सामाजिक निहितार्थ हैं और सरकार इन याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करेगी।

बाद में, 17 मई को पीठ ने इसी तरह की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया, जिसमें इस मुद्दे पर बीएनएस प्रावधान को चुनौती दी गई थी। बता दें, आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम की जगह एक जुलाई से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय सक्षम अधिनियम लागू किए गए हैं।

हमें वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी मामलों को निपटाना होगा: पीठ
पीठ ने कहा था, 'हमें वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी मामलों को निपटाना होगा।' इन याचिकाओं में से एक याचिका वैवाहिक दुष्कर्म के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई, 2022 के खंडित फैसले के संबंध में दायर की गई है। यह अपील दिल्ली हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ताओं में से एक महिला ने दायर की थी।

दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों के बीच मतभेद
दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ में शामिल दो जजों, जस्टिस राजीव शकधर और जस्टिस सी हरिशंकर ने मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति दी थी, क्योंकि इसमें कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, जिनपर अदालत द्वारा गौर किए जाने की आवश्यकता है। खंडपीठ का नेतृत्व करने वाले जस्टिस शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद को 'असंवैधानिक' बताते हुए रद्द करने का समर्थन किया और कहा था कि यह दुखद होगा अगर आईपीसी के लागू होने के 162 साल बाद भी एक विवाहित महिला की न्याय के लिए गुहार नहीं सुनी गई। हालांकि, न्यायमूर्ति शंकर ने कहा था कि दुष्कर्म कानून के तहत पति को दी गई छूटअसंवैधानिक नहीं है और यह बोधगम्य अंतर (Comprehensible Difference) पर आधारित है। बोधगम्य अंतर की अवधारणा उन लोगों या चीजों के समूह से अलग करती है जो बाकियों से अलग हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था- पति को छूट सही नहीं
एक व्यक्ति ने ऐसे ही मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। इस फैसले के चलते उस पर अपनी पत्नी से कथित तौर पर दुष्कर्म करने का मुकदमा चलाने का रास्ता साफ हो गया था। दरअसल, कर्नाटक हाईकोर्ट ने पिछले साल 23 मार्च को पारित आदेश में कहा था कि अपनी पत्नी के साथ दुष्कर्म तथा अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोप से पति को छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कुछ अन्य याचिकाएं भी दायर की गई हैं। कुछ याचिकाकर्ताओं ने आईपीसी के सेक्शन 375 (रेप) के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को मिली छूट की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी है कि यह उन विवाहित महिलाओं के खिलाफ भेदभाव है, जिनका उनके पति ही यौन शोषण करते हैं।

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