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SC Updates: अदालत का न्यायाधिकरणों को ई-कोर्ट परियोजना के तहत लाने से इनकार, पढ़ें सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें
Wed, 24 Jul 2024 02:50 PM IST
काव्या मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: काव्या मिश्रा
Updated Wed, 24 Jul 2024 02:50 PM IST
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Supreme Court
- फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने आज ई-कोर्ट परियोजना में न्यायाधिकरणों को शामिल करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। दरअसल, देश भर में अदालतों के डिजिटल बुनियादी ढांचे को उन्नत करने के उद्देश्य से यह मांग की गई थी। जनहित याचिका में कहा गया है कि सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) जैसे अर्ध-न्यायिक पैनलों को राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
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एनजेडीजी ई-कोर्ट परियोजना के अंतर्गत आता है जो देश की न्यायपालिका के कम्प्यूटरीकरण पर एक राष्ट्रीय नीति तैयार करने से संबंधित है। इसकी निगरानी और वित्त पोषण कानून मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा किया जाता है। एनजेडीजी पोर्टल देश भर में अदालतों द्वारा स्थापित, लंबित और निपटाए गए मामलों से संबंधित डाटा का एक राष्ट्रीय भंडार है।
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एनजेडीजी ई-कोर्ट परियोजना का हिस्सा
सीजेआई ने कहा, 'आप इस बारे में न्याय विभाग से संपर्क कर सकते हैं। एनजेडीजी ई-कोर्ट परियोजना का हिस्सा है। यह जिला अदालतों, उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय को देखता है और यह न्यायाधिकरणों को बिल्कुल नहीं देखता है।' पीठ ने स्पष्ट किया कि वह परियोजना की रूपरेखा को प्रभावित नहीं कर सकती। उन्होंने आगे कहा, 'सात हजार करोड़ रुपये अदालतों के लिए आवंटित किए गए थे, न्यायाधिकरणों के लिए नहीं। जिस पल हम कहते हैं कि न्यायाधिकरणों को इसके अधीन लाया जाएगा, तब धन न्यायाधिकरणों पर भी खर्च किया जाएगा। आज ई-कोर्ट परियोजना के तहत न्यायाधिकरणों को कोई प्रशासनिक मंजूरी नहीं है। इसलिए, ये फिलहाल इसके अधीन नहीं आ सकते।'
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सरकार से संपर्क करने की अनुमति
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, 'न्यायाधिकरणों को एनजेडीजी के तहत लाने की याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती क्योंकि यह ई-कोर्ट परियोजना के तहत एक परियोजना है। याचिकाकर्ता कानून के तहत अन्य उपायों का लाभ उठा सकता है और सरकार से भी संपर्क कर सकता है।' हालांकि, पीठ ने याचिकाकर्ता को न्यायाधिकरणों के कम्प्यूटरीकरण की मांग करते हुए केंद्र सरकार से संपर्क करने की अनुमति दी।
लक्ष्मी विलास बैंक से जुड़े मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई को राहत देते हुए मद्रास हाईकोर्ट के लक्ष्मी विलास बैंक (एलवीबी) से जुड़े फैसले पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने आरबीआई को नकदी संकट से जूझ रहे लक्ष्मी विलास बैंक (एलवीबी) और सिंगापुर के डीबीएस बैंक की भारतीय सहायक कंपनी के शेयरों, परिसंपत्तियों और निवेशक बांडों का मूल्य निर्धारित करने को कहा था। एलवीबी और सिंगापुर बैंक की भारतीय शाखा डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड (डीबीआईएल) के विलय प्रस्ताव को 2020 में मंजूरी दी गई थी।
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने निवेशकों की इस दलील को प्रथम दृष्टया स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि यदि हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी गई तो लगभग 92,000 लोग अपना पैसा खो देंगे। पीठ ने कहा, इस विलय में एक विदेशी बैंक शामिल है। इसे रोकने से व्यापक परिणाम होंगे और विदेशी निवेशकों का हमारे नियामक तंत्र में विश्वास खत्म हो जाएगा। पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ आरबीआई और डीबीएस बैंक की अलग-अलग अपीलों पर निवेशकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एयूम कैपिटल व अन्य को नोटिस जारी किए। पीठ ने दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और उसके बाद निर्णायक सुनवाई तय कर दी।
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने निवेशकों की इस दलील को प्रथम दृष्टया स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि यदि हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी गई तो लगभग 92,000 लोग अपना पैसा खो देंगे। पीठ ने कहा, इस विलय में एक विदेशी बैंक शामिल है। इसे रोकने से व्यापक परिणाम होंगे और विदेशी निवेशकों का हमारे नियामक तंत्र में विश्वास खत्म हो जाएगा। पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ आरबीआई और डीबीएस बैंक की अलग-अलग अपीलों पर निवेशकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एयूम कैपिटल व अन्य को नोटिस जारी किए। पीठ ने दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और उसके बाद निर्णायक सुनवाई तय कर दी।
जेएनयू गर्ल्स हॉस्टल मानहानि मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने जेएनयू गर्ल्स हॉस्टल मानहानि मामले में न्यूज पोर्टल द वायर के संपादक सिद्धार्थ भाटिया और उप संपादक अजय आशीर्वाद के खिलाफ जारी समन को निरस्त करने के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार कर दिया। यह समन जेएनयू की पूर्व प्रोफेसर अमृता सिंह के उनके खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि मामले में किया गया था।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट को मेरिट के आधार पर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी और कहा कि मामले पर फैसला ट्रायल कोर्ट को करना है। अदालत ने मामले को कानून के अनुसार तय करने के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट को वापस भेज दिया। सिंह ने भाटिया और आशीर्वाद के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया था। उन्होंने एक समाचार प्रकाशित किया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनके नेतृत्व में प्रोफेसरों की एक टीम ने जेएनयू प्रशासन को एक डोजियर सौंपा है। जिसमें झूठा आरोप लगाया गया है कि हॉस्टल में जेएनयू की लड़कियां सेक्स रैकेट में लिप्त हैं। शुरुआत में दिल्ली की मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्हें समन जारी किया था लेकिन फिर दोनों आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने 2017 में समन आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद प्रोफेसर सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया था।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट को मेरिट के आधार पर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी और कहा कि मामले पर फैसला ट्रायल कोर्ट को करना है। अदालत ने मामले को कानून के अनुसार तय करने के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट को वापस भेज दिया। सिंह ने भाटिया और आशीर्वाद के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया था। उन्होंने एक समाचार प्रकाशित किया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनके नेतृत्व में प्रोफेसरों की एक टीम ने जेएनयू प्रशासन को एक डोजियर सौंपा है। जिसमें झूठा आरोप लगाया गया है कि हॉस्टल में जेएनयू की लड़कियां सेक्स रैकेट में लिप्त हैं। शुरुआत में दिल्ली की मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्हें समन जारी किया था लेकिन फिर दोनों आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने 2017 में समन आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद प्रोफेसर सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया था।
भूल जाने के अधिकार पर कानून तय करेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या कोई आरोपी किसी आपराधिक मामले में दोषमुक्त होने के बाद भूल जाने के अपने अधिकार के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म समेत सार्वजनिक डोमेन से अदालत के निर्णयों को हटाने की मांग कर सकता है। हालांकि, इस मुद्दे से जुड़े एक मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों के आदेश से पूरे निर्णय को सार्वजनिक डोमेन से हटाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्र की पीठ बंगलूरू की इंडियन कानून (एक कानूनी डाटाबेस वेबसाइट) की ओर से हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कंपनी ने पीठ को बताया कि हाईकोर्ट ने उससे उस फैसले को अपनी वेबसाइट से हटाने को कहा, जिससे दुष्कर्म और धोखाधड़ी के मामले में बरी किए गए एक व्यक्ति की पहचान उजागर हो रही थी। पीठ ने कहा कि एक अदालत यह आदेश कैसे दे सकती है? ऐसे निर्णय को सार्वजनिक प्लेटफॉर्म से हटाने के आदेश के गंभीर परिणाम होंगे।
शीर्ष अदालत ने याचिका में नोटिस जारी करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। पीठ ने कहा, नोटिस जारी करें, इस बीच मद्रास हाईकोर्ट के निर्देश स्थगित रहेंगे। हमें कानून को सुलझाना होगा। वेबसाइट की ओर से पीठ के समक्ष पेश वकील अबिहा जैदी ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्णय से याचिकाकर्ता और आम जनता को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत मिली बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैदी ने आगे कहा, केरल और गुजरात हाईकोर्ट ने माना है कि भूल जाने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि वर्तमान मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने इसके विपरीत दृष्टिकोण अपनाया है। इसलिए विभिन्न हाईकोर्ट के विरोधाभासी निर्णयों से कानून का एक वास्तविक प्रश्न उभर रहा है।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्र की पीठ बंगलूरू की इंडियन कानून (एक कानूनी डाटाबेस वेबसाइट) की ओर से हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कंपनी ने पीठ को बताया कि हाईकोर्ट ने उससे उस फैसले को अपनी वेबसाइट से हटाने को कहा, जिससे दुष्कर्म और धोखाधड़ी के मामले में बरी किए गए एक व्यक्ति की पहचान उजागर हो रही थी। पीठ ने कहा कि एक अदालत यह आदेश कैसे दे सकती है? ऐसे निर्णय को सार्वजनिक प्लेटफॉर्म से हटाने के आदेश के गंभीर परिणाम होंगे।
शीर्ष अदालत ने याचिका में नोटिस जारी करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। पीठ ने कहा, नोटिस जारी करें, इस बीच मद्रास हाईकोर्ट के निर्देश स्थगित रहेंगे। हमें कानून को सुलझाना होगा। वेबसाइट की ओर से पीठ के समक्ष पेश वकील अबिहा जैदी ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्णय से याचिकाकर्ता और आम जनता को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत मिली बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैदी ने आगे कहा, केरल और गुजरात हाईकोर्ट ने माना है कि भूल जाने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि वर्तमान मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने इसके विपरीत दृष्टिकोण अपनाया है। इसलिए विभिन्न हाईकोर्ट के विरोधाभासी निर्णयों से कानून का एक वास्तविक प्रश्न उभर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने मामले की सुनवाई दूसरी पीठ में भी होने पर नाराजगी जताई
दिल्ली रिज वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के मामले में नया मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट की कौन सी पीठ इस मामले पर सुनवाई करेगी, इस पर विवाद उठ खड़ा हुआ है। जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने बुधवार को इस बात पर नाराजगी जताई कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के दिल्ली रिज वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई से जुड़े मामले की सुनवाई न्यायालय की दूसरी पीठ कर रही है।
जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने मामले को सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के पास भेजा ताकि उचित रूप से एक पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सके। पीठ ने कहा, हम न्यायिक औचित्य का पालन कर रहे हैं, हालांकि दूसरी पीठ ने ऐसा नहीं किया। अवमानना मामले में कार्रवाई के समान कारण के लिए आदर्श रूप से मामले को सीजेआई के पास भेज दिया जाना चाहिए था। दरअसल, जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ डीडीए के उपाध्यक्ष सुभाषिश पांडा के खिलाफ स्वत: संज्ञान अवमानना मामले की सुनवाई कर रही है। दिल्ली रिज वन क्षेत्र में पेड़ों को ऑथोरिटी की ओर से न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करते हुए काटे जाने के बाद डीडीए कठघरे में है।
इस पीठ ने पेड़ों को काटने में दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) की भूमिका को छिपाने के प्रयास पर कड़ी आपत्ति जताई थी। पीठ ने डीडीए से इस बारे में स्पष्टीकरण भी मांगा था कि क्या उसने एलजी के निर्देशों के आधार पर पेड़ों को काटा था या यह निर्णय स्वतंत्र रूप से लिया गया था। इस मामले में पीठ ने दिल्ली सरकार की भूमिका पर भी आपत्ति जताई थी। पीठ ने पेड़ काटने वाले ठेकेदार को भी नोटिस जारी कर पूछा था कि किसके आदेशों पर पेड़ काटे गए?
जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने मामले को सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के पास भेजा ताकि उचित रूप से एक पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सके। पीठ ने कहा, हम न्यायिक औचित्य का पालन कर रहे हैं, हालांकि दूसरी पीठ ने ऐसा नहीं किया। अवमानना मामले में कार्रवाई के समान कारण के लिए आदर्श रूप से मामले को सीजेआई के पास भेज दिया जाना चाहिए था। दरअसल, जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ डीडीए के उपाध्यक्ष सुभाषिश पांडा के खिलाफ स्वत: संज्ञान अवमानना मामले की सुनवाई कर रही है। दिल्ली रिज वन क्षेत्र में पेड़ों को ऑथोरिटी की ओर से न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करते हुए काटे जाने के बाद डीडीए कठघरे में है।
इस पीठ ने पेड़ों को काटने में दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) की भूमिका को छिपाने के प्रयास पर कड़ी आपत्ति जताई थी। पीठ ने डीडीए से इस बारे में स्पष्टीकरण भी मांगा था कि क्या उसने एलजी के निर्देशों के आधार पर पेड़ों को काटा था या यह निर्णय स्वतंत्र रूप से लिया गया था। इस मामले में पीठ ने दिल्ली सरकार की भूमिका पर भी आपत्ति जताई थी। पीठ ने पेड़ काटने वाले ठेकेदार को भी नोटिस जारी कर पूछा था कि किसके आदेशों पर पेड़ काटे गए?
महाराष्ट्र के माथेरान में ई-रिक्शा विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को दी जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के रायगड के प्रधान जिला न्यायाधीश को आदेश दिया। इस आदेश के बाद अब जिला न्यायाधीश एक न्यायिक अधिकारी को माथेरान में ई-रिक्शा आवंटन विवाद की जांच का निर्देश देंगे। हिल स्टेशन माथेरान में हाथ रिक्शा चालकों को ई-रिक्शा आवंटित करने को लेकर विवाद हुआ है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 10 जनवरी को पारित आदेश में स्पष्ट किया था कि ई-रिक्शा केवल हाथ-रिक्शा चलाने वालों को ही उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि उनके रोजगार के नुकसान की भरपाई की जा सके। बता दें कि माथेरान हिल स्टेशन के अंदर ऑटोमोबाइल की अनुमति नहीं है। अप्रैल, 2024 में पारित आदेश में शीर्ष अदालत ने मुंबई से लगभग 85 किलोमीटर दूर इस हिल स्टेशन माथेरान में ई-रिक्शा चालकों की संख्या 20 तक सीमित कर दिया था।