एक्सप्लेनर: क्या है सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट, जिसे मिली पहली महिला आईजी? संजुक्ता के लेडी सिंघम बनने की कहानी
आईपीएस अधिकारी संजुक्ता पाराशर की पहचान असम में उग्रवाद विरोधी अभियानों में बेखौफ नेतृत्व और जमीनी अनुभव के लिए बनी। अब सीआरपीएफ की विशेष कमांडो यूनिट कोबरा की पहली महिला आईजी के रूप में उनकी नई जिम्मेदारी ने उन्हें एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। आइए विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
असम की 'आयरन लेडी' के नाम से मशहूर आईपीएस अधिकारी संजुक्ता पाराशर को बड़ी जिम्मेदारी मिली है। उन्हें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ की विशेष कमांडो यूनिट कोबरा का महानिरीक्षक यानी आईजी नियुक्त किया गया है। वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला अधिकारी हैं। उग्रवाद प्रभावित इलाकों में फील्ड ऑपरेशन का उनका लंबा अनुभव उनकी नई जिम्मेदारी को खास बनाता है।
ऐसे में आइए जानते हैं कि सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट क्या है? इसमें क्या खास है? इनकी क्या जिम्मेदारियां होती है? संजुक्ता पाराशर कौन है? उन्होंने क्या-क्या जिम्मेदारियां निभाई हैं? उन्हें आयरन लेडी क्यों कहा जाता है?
पहले समझें सीआरपीएफ क्या है?
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ देश का सबसे बड़ा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल है। यह केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। इसकी शुरुआत 27 जुलाई 1939 को ‘क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस’ के तौर पर हुई थी। आजादी के बाद 28 दिसंबर 1949 को सीआरपीएफ अधिनियम लागू होने के साथ इसका नाम केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल हुआ।
सीआरपीएफ की जिम्मेदारी सिर्फ कानून-व्यवस्था संभालने तक सीमित नहीं है। यह देश के अलग-अलग हिस्सों में आंतरिक सुरक्षा, उग्रवाद विरोधी अभियान, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अभियान, दंगा नियंत्रण, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और वीआईपी सुरक्षा जैसी जिम्मेदारियां संभालता है।
सीआरपीएफ में कितनी तरह की यूनिट हैं?
सीआरपीएफ का संगठन काफी बड़ा है। इसमें सामान्य ऑपरेशनल बटालियनों के अलावा महिला बटालियन, रैपिड एक्शन फोर्स यानी आरएएफ, कोबरा, सिग्नल यूनिट और वीआईपी सुरक्षा से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं।
मौजूदा संगठनात्मक ढांचे में सीआरपीएफ के पास 201 सामान्य कार्यकारी बटालियन, 6 महिला बटालियन, 16 रैपिड एक्शन फोर्स बटालियन, 10 कोबरा बटालियन, 7 सिग्नल बटालियन और 1 विशेष ड्यूटी समूह है। इसके अलावा वीआईपी सुरक्षा के लिए अलग बटालियन और एक वीआईपी सुरक्षा समूह भी है।
बल के प्रशासन और संचालन के लिए अलग-अलग सेक्टर और रेंज बनाए गए हैं। इसके साथ प्रशिक्षण संस्थान, समूह केंद्र, केंद्रीय हथियार भंडार, गोला-बारूद कार्यशालाएं और अस्पतालों का नेटवर्क भी है।
कोबरा क्या है?
कोबरा यानी 'कमांडो बटालियन फॉर रिजॉल्यूट एक्शन' सीआरपीएफ की विशेष कमांडो यूनिट है। इसे खास तौर पर जंगल और गुरिल्ला युद्ध की परिस्थितियों में अभियान चलाने के लिए तैयार किया गया है।
कोबरा कमांडो को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लंबे समय तक ऑपरेशन करने, जंगल में छिपे उग्रवादियों का पता लगाने, घात लगाकर कार्रवाई करने, विस्फोटकों और आईईडी से निपटने तथा खुफिया जानकारी के आधार पर अभियान चलाने की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इन्हें आम तौर पर 'जंगल वॉरियर्स' के तौर पर भी जाना जाता है।
कोबरा की 10 बटालियन वर्ष 2008 से 2011 के बीच गठित की गई थीं। इनकी तैनाती नक्सल और उग्रवाद प्रभावित इलाकों में जरूरत के हिसाब से की जाती है। छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, असम और मेघालय जैसे राज्यों में कोबरा की तैनाती रही है।
कोबरा का आईजी कौन होता है?
आईजी यानी महानिरीक्षक सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों में शामिल एक महत्वपूर्ण कमांड पद है। सीआरपीएफ में वरिष्ठता के सामान्य क्रम को समझें तो महानिदेशक यानी डीजी के नीचे अतिरिक्त महानिदेशक यानी एडीजी और उसके बाद महानिरीक्षक यानी आईजी का स्तर आता है। इसके बाद उपमहानिरीक्षक यानी डीआईजी और फिर कमांडेंट जैसे पद आते हैं।
कोबरा में आईजी किसी एक कमांडो टीम या सिर्फ एक बटालियन के प्रभारी नहीं होते। वह पूरे कोबरा सेक्टर के प्रमुख होते हैं।
कोबरा के आईजी की क्या-क्या जिम्मेदारियां होती हैं?
कोबरा के आईजी की जिम्मेदारी कई स्तरों पर होती है।
- ऑपरेशनल निगरानी: अशांत इलाकों में तैनात कोबरा यूनिटों की ऑपरेशनल तैयारियों और अभियानों की निगरानी करना।
- 10 बटालियनों का प्रशासन: कोबरा की सभी बटालियनों के प्रशासनिक कामकाज और उनके बीच समन्वय की निगरानी करना।
- कमांडो की ट्रेनिंग: कमांडो के चयन, प्रशिक्षण और ऑपरेशनल क्षमता को बनाए रखने से जुड़े मामलों पर वरिष्ठ स्तर पर निगरानी रखना।
- हथियार और संसाधन: यूनिटों को जरूरी हथियार, उपकरण, वाहन, संचार साधन और दूसरी लॉजिस्टिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था देखना।
- ऑपरेशन की तैयारी: जिन इलाकों में कोबरा की तैनाती है, वहां सुरक्षा स्थिति के अनुसार यूनिटों की तैयारियों और रणनीति की समीक्षा करना।
- वरिष्ठ अधिकारियों से समन्वय: सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों, राज्य पुलिस और जरूरत के अनुसार दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय करना।
आईजी खुद हर ऑपरेशन में मैदान में मौजूद रहें, यह जरूरी नहीं है। जमीन पर अभियान की कमान संबंधित बटालियन और फील्ड अधिकारियों के पास होती है, जबकि आईजी सेक्टर स्तर पर पूरी व्यवस्था और ऑपरेशनल दिशा की निगरानी करते हैं।
कोबरा सेक्टर की शुरुआत कब और कहां हुई?
कोबरा सेक्टर की शुरुआत दिल्ली के सीजीओ कॉम्प्लेक्स स्थित सीआरपीएफ मुख्यालय से हुई थी। शुरुआती दौर में इसकी कमान के. दुर्गा प्रसाद के पास थी, जो आईपीएस अधिकारी और आईजी थे। मार्च 2009 में कोबरा सेक्टर को दिल्ली के पुष्प विहार में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद 11 नवंबर 2009 से इसका कार्यालय पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली में रहा। कोबरा की संरचना तैयार होने के बाद इसे नक्सल प्रभावित इलाकों में विशेष अभियान के लिए लगातार मजबूत किया गया।
कोबरा का ऑपरेशनल रिकॉर्ड?
सीआरपीएफ के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कोबरा ने वर्ष 2009 से अब तक हजारों ऑपरेशनों में हिस्सा लिया है। इसके अभियानों में नक्सल और उग्रवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई, हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी तथा संदिग्धों की गिरफ्तारी शामिल रही है।
सीआरपीएफ के आंकड़ों के अनुसार कोबरा के अभियानों में अब तक 641 नक्सली या उग्रवादी मारे गए, 4,002 गिरफ्तार हुए और 3,444 ने आत्मसमर्पण किया। अभियानों के दौरान बड़ी संख्या में हथियार, गोला-बारूद और बम-आईईडी भी बरामद किए गए हैं।
कोबरा के जवानों ने अपनी सेवा के दौरान कई वीरता पुरस्कार भी हासिल किए हैं। इनमें 5 कीर्ति चक्र और 25 शौर्य चक्र समेत कई अन्य पदक शामिल हैं। अभियानों में कोबरा के जवानों को भी जान की कीमत चुकानी पड़ी है। सीआरपीएफ के अनुसार 78 जवान और 3 प्रशिक्षित के-9 (स्निफर डॉग्स) शहीद हुए हैं।
संजुक्ता पाराशर का परिचय
संजुक्ता पाराशर 2006 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं और असम-मेघालय कैडर से आती हैं। उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 85 हासिल की थी।
उन्होंने दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की और इसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उच्च शिक्षा हासिल की। उन्होंने बाद में अमेरिका की विदेश नीति पर एमफिल और पीएचडी भी की।
संजुक्ता को क्यों कहा जाता है आयरन लेडी?
आईपीएस बनने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग 2008 में असम के माकुम में सहायक कमांडेंट के तौर पर हुई। साल 2008 में संजुक्ता पाराशर की पहली पोस्टिंग माकुम में असिस्टेंट कमांडेंट के तौर पर हुई। बाद में उन्हें उदालगुरी में बोडो और बांग्लादेशियों के बीच हुई हिंसा को काबू करने के लिए भेज दिया गया था। इसके बाद आईपीएस संजुक्ता ने बोडो उग्रवादियों के खिलाफ ऑपरेशन में प्रमुख भूमिका निभाई थी।
साल 2015 में असम के जोरहाट जिले में बतौर एसपी आईपीएस संजुक्ता ने लगातार अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने असम के जंगलों में एके-47 लिए सीआरपीएफ के जवानों और कमांडो को लीड किया। खास बात ये है कि, आईपीएस संजुक्ता पाराशर ने असम में ऐसी जगहों पर एनकाउंटर किया है, जहां नॉर्मल ऑपरेशन चलाना भी मुश्किल था, वहां तक संजुक्ता अपनी टीम के साथ पहुंच गईं और उग्रवादियों पर हमला कर दिया। उनके नेतृत्व में 16 उग्रवादियों को मार गिराया गया और 64 नक्सलियों को गिरफ्तार कर किया गया।
आईपीएस संजुक्ता पाराशर ने सीआरपीएफ जवानों की टीम को भी लीड किया। संजुक्ता पाराशर को उग्रवादी ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से कई बार जान से मारने की धमकी भी दी गई, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की और वह निडर होकर AK-47 घूमती थीं। अपनी बहादुरी की वजह से वह आयरन लेडी और लेडी सिंघम के नाम से जानी जाती हैं।
एनआईए में भी किया काम
संजुक्ता पाराशर ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए में भी काम किया है। एनआईए में काम करने के दौरान उन्हें आतंकवाद और गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच और सुरक्षा तंत्र से जुड़े कामों का अनुभव मिला।
इससे उनके करियर में एक तरफ फील्ड ऑपरेशन का अनुभव जुड़ा, तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और जांच से जुड़े मामलों को समझने का अनुभव भी मिला।
परिवार और निजी जीवन
आईपीएस संजुक्ता पाराशर के पति का नाम संदीप कक्कड़ है। उनका एक बेटा भी है। बात अगर संजुक्ता की मां की करें तो वह पेशे से डॉक्टर हैं। उनके पिता एक इंजीनियर हैं।