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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बोबड़े ने मुकदमे से पहले मध्यस्थता पर दिया जोर

Sun, 18 Aug 2019 02:17 PM IST
शिल्पा ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: शिल्पा ठाकुर Updated Sun, 18 Aug 2019 02:17 PM IST
सार

  • सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश शरद बोबड़े ने मुकदमे से पहले मध्यस्थता की जरूरत पर जोर दिया है।
  • सही तरीके को कानूनी सहायता प्रणाली की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि लोगों को जल्द से जल्द न्याय मिलना सुनिश्चित किया जा सके।
  • बोबड़े ने कहा कि समाज के वंचित वर्गों को प्रदान की गई कानूनी सहायता से उन्हें अपनी आवाज सुनने में मदद मिली है।

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Supreme court judge Sharad Bobde emphasised the need of pre litigation mediation
जस्टिस शरद बोबड़े - फोटो : social media

विस्तार

उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के न्यायाधीश शरद बोबड़े ने मुकदमे से पहले मध्यस्थता की जरूरत पर जोर दिया है। इस तरीके को कानूनी सहायता प्रणाली की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि लोगों को जल्द से जल्द न्याय मिलना सुनिश्चित किया जा सके। बोबड़े ने ये बात शनिवार को 17वीं अखिल भारतीय मीट ऑफ स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज के उद्घाटन समारोह में कही।

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जस्टिस बोबड़े ने कहा कि अप्रैल 2017 से मार्च 2018 के बीच मध्यस्थता के माध्यम से 1,07,587 मामलों का निपटारा किया गया है। उन्होंने कहा कि अकेले गुजरात में ही महज एक दिन में 24 हजार मामालों का निपटारा हुआ है। बोबड़े ने कहा, "मध्यस्थता पर जोर दिया जा रहा है। इसलिए  हम 'पूर्व मुकदमेबाजी मध्यस्थता' को अनिवार्य करने के बारे में सोच रहे हैं, जिसे केवल वाणिज्यिक विवादों तक सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। देश में कानून की पढ़ाई कराने वाले विश्वविद्यालयों में मध्यस्थता में डिग्री, डिप्लोमा पाठ्यक्रम होना चाहिए।"
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बोबड़े ने कहा कि समाज के वंचित वर्गों को प्रदान की गई कानूनी सहायता से उन्हें अपनी आवाज सुनने में मदद मिली है। समाज के वंचित वर्गों में से कई को तो यह भी पता नहीं है कि उनके पास कानून और कल्याणकारी योजनाओं के तहत कानूनी अधिकार हैं। देश में 80 फीसदी लोग कानूनी सहायता के हकदार हैं, लेकिन यह 0.05 फीसदी से अधिक जनसंख्या को प्रदान नहीं किया जाता है।
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उन्होंने कहा, "कानूनी सेवाओं के माध्यम से लाभान्वित होने वाले लोगों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हुई है। 2016-17 में यह आंकड़ा 5.5 लाख के आसपास था, जो 2018-19 में बढ़कर 14.75 लाख हो गया है। दो साल के अंतराल में इसमें तीन गुना अधिक वृद्धि हुई है।

हमने शर्तों को तैयार नहीं किया है, लेकिन जाहिर है आपको कानूनी सहायता मिलनी चाहिए, बशर्ते आप 'पहले मुकदमेबाजी मध्यस्थता' का सहारा लें। यह कुछ ऐसा है जिस पर हम ध्यान देना शुरू कर सकते हैं।


समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग अक्सर ये पाते हैं कि कोई उनकी रक्षा करने वाला नहीं है, तो ऐसे में "पब्लिक डिफेंडर्स" (सार्वजनिक रक्षक) की अवधारणा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह प्रणाली बार के जूनियर सदस्यों को भी सार्थक मुकदमेबाजी में व्यस्त होने का मौका देगी। 

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