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SC: 'सुप्रीम कोर्ट की संस्था व्यक्तिगत जजों से बड़ी', सात न्यायधीशों के फैसले से असहमत जस्टिस नागरत्ना का तर्क
Wed, 06 Nov 2024 05:35 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Wed, 06 Nov 2024 05:35 AM IST
सार
निजी संपत्तियों को समुदाय से संबंधित होने वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के दो जजों ने असहमति जताई। दो जजों में शामिल जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले में लिखा कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की संस्था व्यक्तिगत जजों से बड़ी है जो इस महान देश के इतिहास के विभिन्न चरणों में इसका एक हिस्सा मात्र हैं। इसलिए मैं प्रस्तावित निर्णय में मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से सहमत नहीं हूं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
निजी संपत्तियों को समुदाय से संबंधित होने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के दो जजों ने सात जजों के बहुमत वाले फैसले से आंशिक असहमति जताई जबकि जस्टिस धूलिया इस फैसले से पूरी तरह असहमत रहे। हालांकि दोनों जजों ने बहुमत का फैसला लिखने वाले देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई। जिसमें चीफ जस्टिस ने लिखा कि जस्टिस अय्यर के फैसले ने भारतीय संविधान के व्यापक और लचीले रुख की भावना को नुकसान पहुंचाया है।
जिसको लेकर जस्टिस नागरत्ना ने अपने 130 पन्नों के फैसले में लिखा कि मेरा मानना है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की संस्था व्यक्तिगत जजों से बड़ी है, जो इस महान देश के इतिहास के विभिन्न चरणों में इसका एक हिस्सा मात्र हैं। इसलिए, मैं प्रस्तावित निर्णय में मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से सहमत नहीं हूं।
राज्य को व्यक्ति पर दी प्राथमिकता
जस्टिस नागरत्ना ने कहा जस्टिस कृष्ण अय्यर ने एक सांविधानिक, आर्थिक और सामाजिक संस्कृति की पृष्ठभूमि में समुदाय के भौतिक संसाधनों के निर्माण पर निर्णय दिया, जिसने व्यापक रूप से राज्य को व्यक्ति पर प्राथमिकता दी। संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द डाला था। संविधान सभा में चर्चा और समय की धारा जैसे सभी योगदान देने वाले कारकों की एक संक्षिप्त समझ के आधार पर, क्या हम पूर्व न्यायाधीशों को केवल एक विशेष व्याख्यात्मक परिणाम पर पहुंचने के लिए ‘अपमानजनक’ होने का आरोप लगा सकते हैं।
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जस्टिस धूलिया का अनोखा तर्क
वहीं, बहुमत की राय से अलग फैसला सुनाते हुए जस्टिस सुधांशु धूलिया ने भी सात जजों के फैसले में कृष्ण अय्यर सिद्धांत की कठोर आलोचना को अस्वीकार किया। जस्टिस धूलिया ने कहा, मुझे कृष्ण अय्यर सिद्धांत पर की गई टिप्पणियों पर अपनी कड़ी अस्वीकृति दर्ज करनी चाहिए। यह आलोचना कठोर है, और इससे बचा जा सकता था। जस्टिस धूलिया ने कहा कि यह सिद्धांत, जिसका जस्टिस ओ चिन्नप्पा रेड्डी ने भी समर्थन किया, मजबूत मानवतावादी सिद्धांतों पर आधारित है और बुरे समय में लोगों के प्रति सहानुभूति को दर्शाता है। कृष्ण अय्यर सिद्धांत ने अंधकार भरे समय में हमारा मार्ग रोशन किया है।
संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) की व्याख्या
मामला महाराष्ट्र के उस कानून से उत्पन्न हुआ है, जो कुछ निजी संपत्तियों का अधिग्रहण करने की अनुमति देता है। निजी संपत्तियों का अधिग्रहण उक्त संपत्ति/भवन के बेहतर संरक्षण या पुनर्निर्माण/मरम्मत आदि के लिए हो सकता है। इसे चुनौती देते हुए संपत्ति मालिक संघ के नेतृत्व में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि किसी समुदाय के भौतिक संसाधनों में निजी संसाधन शामिल नहीं हैं और अनुच्छेद 39(बी) केवल सार्वजनिक संसाधनों या राष्ट्रीय संसाधनों की बात करता है क्योंकि केवल इन संसाधनों को राज्य द्वारा सबसे बड़े सामान्य हित को पूरा करने के लिए पुनर्वितरित किया जा सकता है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और म्हाडा ने अनुच्छेद 39(बी) की ऐसी प्रतिबंधात्मक व्याख्या के खिलाफ तर्क दिया। दोनों का कहना था कि यदि निजी तौर पर स्वामित्व वाली संपत्तियों को अनुच्छेद 39 (बी) के दायरे से बाहर रखा जाता है तो ‘सार्वजनिक भलाई’ पराजित होगी।
जस्टिस अय्यर ने दिया मार्क्स का हवाला
भीमसिंहजी में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने अपने निर्णय में कार्ल मार्क्स का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 39 को सांविधानिक वास्तविकता बनाने के लिए भूमि के बड़े समूहों का अधिग्रहण करना आवश्यक है। दिलचस्प बात यह है कि इसी फैसले में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने अर्थव्यवस्था की प्रकृति के बारे में अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया और कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था संक्रमण के चरण में है..परिवर्तन से गुजर रही है।
जहां पीठ ने नोट किया कि जस्टिस कृष्ण अय्यर (रंगनाथ रेड्डी और भीमसिंहजी निर्णयों में) और जस्टिस चिनप्पा रेड्डी (संजीव कोक निर्णय में) दोनों ने प्रावधान के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इस आर्थिक विचारधारा को आगे बढ़ाने के आधार के रूप में संविधान निर्माताओं की दृष्टि का लगातार उल्लेख किया।
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जिसको लेकर जस्टिस नागरत्ना ने अपने 130 पन्नों के फैसले में लिखा कि मेरा मानना है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की संस्था व्यक्तिगत जजों से बड़ी है, जो इस महान देश के इतिहास के विभिन्न चरणों में इसका एक हिस्सा मात्र हैं। इसलिए, मैं प्रस्तावित निर्णय में मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से सहमत नहीं हूं।
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राज्य को व्यक्ति पर दी प्राथमिकता
जस्टिस नागरत्ना ने कहा जस्टिस कृष्ण अय्यर ने एक सांविधानिक, आर्थिक और सामाजिक संस्कृति की पृष्ठभूमि में समुदाय के भौतिक संसाधनों के निर्माण पर निर्णय दिया, जिसने व्यापक रूप से राज्य को व्यक्ति पर प्राथमिकता दी। संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द डाला था। संविधान सभा में चर्चा और समय की धारा जैसे सभी योगदान देने वाले कारकों की एक संक्षिप्त समझ के आधार पर, क्या हम पूर्व न्यायाधीशों को केवल एक विशेष व्याख्यात्मक परिणाम पर पहुंचने के लिए ‘अपमानजनक’ होने का आरोप लगा सकते हैं।
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जस्टिस धूलिया का अनोखा तर्क
वहीं, बहुमत की राय से अलग फैसला सुनाते हुए जस्टिस सुधांशु धूलिया ने भी सात जजों के फैसले में कृष्ण अय्यर सिद्धांत की कठोर आलोचना को अस्वीकार किया। जस्टिस धूलिया ने कहा, मुझे कृष्ण अय्यर सिद्धांत पर की गई टिप्पणियों पर अपनी कड़ी अस्वीकृति दर्ज करनी चाहिए। यह आलोचना कठोर है, और इससे बचा जा सकता था। जस्टिस धूलिया ने कहा कि यह सिद्धांत, जिसका जस्टिस ओ चिन्नप्पा रेड्डी ने भी समर्थन किया, मजबूत मानवतावादी सिद्धांतों पर आधारित है और बुरे समय में लोगों के प्रति सहानुभूति को दर्शाता है। कृष्ण अय्यर सिद्धांत ने अंधकार भरे समय में हमारा मार्ग रोशन किया है।
संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) की व्याख्या
मामला महाराष्ट्र के उस कानून से उत्पन्न हुआ है, जो कुछ निजी संपत्तियों का अधिग्रहण करने की अनुमति देता है। निजी संपत्तियों का अधिग्रहण उक्त संपत्ति/भवन के बेहतर संरक्षण या पुनर्निर्माण/मरम्मत आदि के लिए हो सकता है। इसे चुनौती देते हुए संपत्ति मालिक संघ के नेतृत्व में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि किसी समुदाय के भौतिक संसाधनों में निजी संसाधन शामिल नहीं हैं और अनुच्छेद 39(बी) केवल सार्वजनिक संसाधनों या राष्ट्रीय संसाधनों की बात करता है क्योंकि केवल इन संसाधनों को राज्य द्वारा सबसे बड़े सामान्य हित को पूरा करने के लिए पुनर्वितरित किया जा सकता है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और म्हाडा ने अनुच्छेद 39(बी) की ऐसी प्रतिबंधात्मक व्याख्या के खिलाफ तर्क दिया। दोनों का कहना था कि यदि निजी तौर पर स्वामित्व वाली संपत्तियों को अनुच्छेद 39 (बी) के दायरे से बाहर रखा जाता है तो ‘सार्वजनिक भलाई’ पराजित होगी।
जस्टिस अय्यर ने दिया मार्क्स का हवाला
भीमसिंहजी में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने अपने निर्णय में कार्ल मार्क्स का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 39 को सांविधानिक वास्तविकता बनाने के लिए भूमि के बड़े समूहों का अधिग्रहण करना आवश्यक है। दिलचस्प बात यह है कि इसी फैसले में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने अर्थव्यवस्था की प्रकृति के बारे में अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया और कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था संक्रमण के चरण में है..परिवर्तन से गुजर रही है।
जहां पीठ ने नोट किया कि जस्टिस कृष्ण अय्यर (रंगनाथ रेड्डी और भीमसिंहजी निर्णयों में) और जस्टिस चिनप्पा रेड्डी (संजीव कोक निर्णय में) दोनों ने प्रावधान के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इस आर्थिक विचारधारा को आगे बढ़ाने के आधार के रूप में संविधान निर्माताओं की दृष्टि का लगातार उल्लेख किया।