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Supreme Court: 'अंसल भाइयों के ₹60 करोड़ से बने ट्रॉमा सेंटर्स की जांच करें', उपहार अग्निकांड पर कोर्ट सख्त
Tue, 23 Sep 2025 06:22 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Tue, 23 Sep 2025 06:22 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने उफ्फार अग्निकांड पीड़ित संघ (एवीयूटी) से कहा कि वे अंसल बंधुओं के 60 करोड़ रुपये से बने ट्रॉमा सेंटर्स का दौरा करें और सुविधाओं का आकलन करें। एवीयूटी का आरोप है कि 2015 के आदेश का पालन नहीं हुआ और पैसे बेकार गए। दिल्ली सरकार ने दावा किया कि राशि का उपयोग तीन अस्पतालों में किया गया।
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सुप्रीम कोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उपहार सिनेमा अग्निकांड पीड़ित संघ (एवीयूटी) को निर्देश दिया कि वह दिल्ली सरकार द्वारा बताए गए उन ट्रॉमा सेंटर्स का दौरा करे, जिनके निर्माण के लिए अंसल बंधुओं द्वारा जमा कराए गए 60 करोड़ रुपये का उपयोग किया गया। अदालत ने कहा कि अगर इन केंद्रों में किसी सुविधा की कमी पाई जाती है, तो सुधार के लिए आवश्यक आदेश दिए जा सकते हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत, उज्जल भुयान और एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने एवीयूटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत मेहता से कहा कि वे किसी प्रतिनिधि को भेजकर इन अस्पतालों की हकीकत जानें। अदालत ने टिप्पणी की कि शायद अब इस विवाद को गरिमामय तरीके से खत्म करना बेहतर होगा, ताकि बार-बार इस त्रासदी को याद कर पीड़ितों को दुखी न किया जाए।
एवीयूटी का आरोप
एवीयूटी की ओर से कहा गया कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिए थे, उनका पालन नहीं हुआ। उनका दावा था कि अंसल बंधुओं ने अदालत की नरमी का फायदा उठाया और सजा से बच निकले। मेहता ने कहा कि ऐसा लगता है कि 60 करोड़ रुपये काले गड्ढे में चले गए। उनका कहना था कि दिल्ली विद्युत बोर्ड को पांच एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश भी पूरा नहीं हुआ।
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दिल्ली सरकार की दलील
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक डेव ने अदालत को बताया कि अंसल बंधुओं ने 60 करोड़ रुपये का भुगतान किया था और इनका इस्तेमाल तीन सरकारी अस्पतालों संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल (मंगोलपुरी), सत्यवादी राजा हरिश चंदर हॉस्पिटल (नरेला) और सिरसपुर हॉस्पिटल में ट्रॉमा सेंटर्स बनाने में हुआ।
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लागत पर अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि 60 करोड़ रुपये, दिल्ली में किसी अस्पताल को बनाने और चलाने की लागत की तुलना में मूंगफली जैसे हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने अतिरिक्त धनराशि लगाकर इन अस्पतालों को पूरी तरह चालू किया है। अदालत ने मेहता से कहा कि वह यह देखें कि ट्रॉमा सेंटर्स में आपातकालीन सेवाएं, एंबुलेंस और अन्य जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं या नहीं।
सरकार की स्थिति
दिल्ली सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि इन अस्पतालों में ट्रॉमा सेंटर्स बनाए गए क्योंकि इन इलाकों की आबादी अधिक है और जरूरत ज्यादा थी। जबकि पहले अदालत ने द्वारका में ट्रॉमा सेंटर बनाने का निर्देश दिया था, उस समय वहां कोई सरकारी अस्पताल मौजूद नहीं था। बाद में मई 2021 से द्वारका का इंदिरा गांधी अस्पताल भी शुरू हो गया, जिसमें 1,241 बेड हैं, जिनमें से 330 आईसीयू बेड हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने उफ्फार अग्निकांड पीड़ित संघ (एवीयूटी) से कहा कि वे अंसल बंधुओं के 60 करोड़ रुपये से बने ट्रॉमा सेंटर्स का दौरा करें और सुविधाओं का आकलन करें। एवीयूटी का आरोप है कि 2015 के आदेश का पालन नहीं हुआ और पैसे बेकार गए। दिल्ली सरकार ने दावा किया कि राशि का उपयोग तीन अस्पतालों में किया गया। कोर्ट ने कहा, 60 करोड़ अस्पताल निर्माण के खर्च के सामने मामूली है।
ये भी पढ़ें- '10 हजार शब्दों का शब्दकोश तैयार', सांकेतिक भाषा पर मंत्री बोले- दिव्यांगों को अवसर देना जरूरी
जानें क्या है उपहाल सिनेमा कांड
13 जून 1997 को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में फिल्म बॉर्डर की स्क्रीनिंग के दौरान लगी आग ने 59 लोगों की जान ले ली और 100 से अधिक लोग घायल हुए। आग की शुरुआत डीवीबी ट्रांसफार्मर की खराब मरम्मत से हुई, जिससे तेल रिसकर पार्किंग और फिर ऑडिटोरियम तक फैल गया। धुआं तेजी से हॉल में घुसा, लेकिन सिनेमा प्रबंधन ने आपातकालीन लाइट, अलार्म या घोषणा नहीं की। निकास द्वार बंद होने और सीटों के अवैध विस्तार के कारण लोग फंस गए।
घटना की जांच में दिल्ली विद्युत बोर्ड, सिनेमा प्रबंधन और अधिकारियों की गंभीर लापरवाही सामने आई। कई सुरक्षा नियमों का उल्लंघन पाया गया। पीड़ितों के परिवारों ने एवीयूटी बनाकर न्याय की लड़ाई लड़ी और नागरिक मुआवजा हासिल किया। 2007 में अंसल बंधुओं समेत 12 लोगों को दोषी ठहराया गया और जेल की सजा दी गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार फैसलों में बदलाव किए। 2015 में अंसलों पर 30-30 करोड़ का जुर्माना लगाया गया।
2021 में सबूतों से छेड़छाड़ के मामले में उन्हें सात साल जेल की सजा मिली, हालांकि 2022 में बुढ़ापे के आधार पर राहत दे दी गई। यह त्रासदी दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा मानकों की पोल खोलने वाली और भारत के न्यायिक इतिहास में लंबी लड़ाई का प्रतीक बन गई।
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न्यायमूर्ति सूर्यकांत, उज्जल भुयान और एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने एवीयूटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत मेहता से कहा कि वे किसी प्रतिनिधि को भेजकर इन अस्पतालों की हकीकत जानें। अदालत ने टिप्पणी की कि शायद अब इस विवाद को गरिमामय तरीके से खत्म करना बेहतर होगा, ताकि बार-बार इस त्रासदी को याद कर पीड़ितों को दुखी न किया जाए।
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एवीयूटी का आरोप
एवीयूटी की ओर से कहा गया कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिए थे, उनका पालन नहीं हुआ। उनका दावा था कि अंसल बंधुओं ने अदालत की नरमी का फायदा उठाया और सजा से बच निकले। मेहता ने कहा कि ऐसा लगता है कि 60 करोड़ रुपये काले गड्ढे में चले गए। उनका कहना था कि दिल्ली विद्युत बोर्ड को पांच एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश भी पूरा नहीं हुआ।
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दिल्ली सरकार की दलील
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक डेव ने अदालत को बताया कि अंसल बंधुओं ने 60 करोड़ रुपये का भुगतान किया था और इनका इस्तेमाल तीन सरकारी अस्पतालों संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल (मंगोलपुरी), सत्यवादी राजा हरिश चंदर हॉस्पिटल (नरेला) और सिरसपुर हॉस्पिटल में ट्रॉमा सेंटर्स बनाने में हुआ।
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लागत पर अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि 60 करोड़ रुपये, दिल्ली में किसी अस्पताल को बनाने और चलाने की लागत की तुलना में मूंगफली जैसे हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने अतिरिक्त धनराशि लगाकर इन अस्पतालों को पूरी तरह चालू किया है। अदालत ने मेहता से कहा कि वह यह देखें कि ट्रॉमा सेंटर्स में आपातकालीन सेवाएं, एंबुलेंस और अन्य जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं या नहीं।
सरकार की स्थिति
दिल्ली सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि इन अस्पतालों में ट्रॉमा सेंटर्स बनाए गए क्योंकि इन इलाकों की आबादी अधिक है और जरूरत ज्यादा थी। जबकि पहले अदालत ने द्वारका में ट्रॉमा सेंटर बनाने का निर्देश दिया था, उस समय वहां कोई सरकारी अस्पताल मौजूद नहीं था। बाद में मई 2021 से द्वारका का इंदिरा गांधी अस्पताल भी शुरू हो गया, जिसमें 1,241 बेड हैं, जिनमें से 330 आईसीयू बेड हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने उफ्फार अग्निकांड पीड़ित संघ (एवीयूटी) से कहा कि वे अंसल बंधुओं के 60 करोड़ रुपये से बने ट्रॉमा सेंटर्स का दौरा करें और सुविधाओं का आकलन करें। एवीयूटी का आरोप है कि 2015 के आदेश का पालन नहीं हुआ और पैसे बेकार गए। दिल्ली सरकार ने दावा किया कि राशि का उपयोग तीन अस्पतालों में किया गया। कोर्ट ने कहा, 60 करोड़ अस्पताल निर्माण के खर्च के सामने मामूली है।
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जानें क्या है उपहाल सिनेमा कांड
13 जून 1997 को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में फिल्म बॉर्डर की स्क्रीनिंग के दौरान लगी आग ने 59 लोगों की जान ले ली और 100 से अधिक लोग घायल हुए। आग की शुरुआत डीवीबी ट्रांसफार्मर की खराब मरम्मत से हुई, जिससे तेल रिसकर पार्किंग और फिर ऑडिटोरियम तक फैल गया। धुआं तेजी से हॉल में घुसा, लेकिन सिनेमा प्रबंधन ने आपातकालीन लाइट, अलार्म या घोषणा नहीं की। निकास द्वार बंद होने और सीटों के अवैध विस्तार के कारण लोग फंस गए।
घटना की जांच में दिल्ली विद्युत बोर्ड, सिनेमा प्रबंधन और अधिकारियों की गंभीर लापरवाही सामने आई। कई सुरक्षा नियमों का उल्लंघन पाया गया। पीड़ितों के परिवारों ने एवीयूटी बनाकर न्याय की लड़ाई लड़ी और नागरिक मुआवजा हासिल किया। 2007 में अंसल बंधुओं समेत 12 लोगों को दोषी ठहराया गया और जेल की सजा दी गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार फैसलों में बदलाव किए। 2015 में अंसलों पर 30-30 करोड़ का जुर्माना लगाया गया।
2021 में सबूतों से छेड़छाड़ के मामले में उन्हें सात साल जेल की सजा मिली, हालांकि 2022 में बुढ़ापे के आधार पर राहत दे दी गई। यह त्रासदी दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा मानकों की पोल खोलने वाली और भारत के न्यायिक इतिहास में लंबी लड़ाई का प्रतीक बन गई।