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Supreme Court: दावों के निपटारे में बीमा कंपनियों को बहुत तकनीकी पेंच नहीं फंसाने चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने कही यह बड़ी बात
Fri, 20 May 2022 10:01 PM IST
अभिषेक दीक्षित
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Fri, 20 May 2022 10:01 PM IST
सार
जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने छत्तीसगढ़ के दुर्ग के इस मामले में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसलों को खारिज कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनियों को दावों के निपटारे में बहुत तकनीकी पेंच नहीं फंसाने की नसीहत दी है। वाहन बीमा के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सिर्फ कुछ दस्तावेज नहीं पेश करने पर अपीलकर्ता को बीमे की रकम देने से इनकार करना गलत है।
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जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने छत्तीसगढ़ के दुर्ग के इस मामले में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसलों को खारिज कर दिया। साथ ही बीमा कंपनी को आवेदक को बीमे की कुल राशि 12 लाख रुपये का और दावा दाखिल करने से अब तक का 7 फीसदी ब्याज के भुगतान का निर्देश दिया। इसके अलावा कानूनी कार्यवाही में खर्च हुए 25 हजार रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया।
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पीठ ने कहा, कई ऐसे मामले आते हैं जब बीमा कंपनियां बेतुके आधार पर बेवजह की तकनीकी खामियां निकालकर दावों का निस्तारण करने से इनकार कर देती हैं। कई बार ऐसे दस्तावेजों की मांग की जाती है जिन्हें पेश करना उपस्थित हालात में अपीलकर्ता के लिए असंभव होता है। उक्त मामले में ही जब आवेदक का ट्रक खो गया है और उसके लिए बीमा राशि का दावा किया गया तो उससे रजिस्ट्रेशन के कागज की मूल प्रति मांगी जा रही है। जबकि आरटीओ की ओर से पंजीकरण का पूरा विवरण बीमा कंपनी को उपलब्ध कराया गया है।
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पीठ ने आदेश में स्पष्ट कहा कि बीमा कंपनियों को ऐसे दस्तावेजों की मांग पर नहीं अड़ना चाहिए जिसे पेश करना आवेदक के लिए नामुमकिन हो।
'जमानत पर फैसला लेते वक्त कारणों के महत्व को कम नहीं आंक सकते'
- एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने या खारिज करने के मामले में एक बार फिर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। शीर्ष अदालत ने कहा, जमानत देने या इनकार करने के कारण बताने के महत्व को कभी भी कम नहीं आंका जा सकता। क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि विवेकाधीन शक्ति का इस्तेमाल न्यायिक ढंग से किया गया। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट से हत्या के मामले में मिली जमानत खारिज कर दी।
- सीजेआई एनवी रमण, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने कहा, जमानत देने या खारिज करने के फैसले में अपराध की प्रकृति का बहुत भारी महत्व है। इसका कोई सीधा फार्मूला नहीं हो सकता, जिसके तहत अदालतें जमानत अर्जी पर फैसला सुना दें। जमानत दी जानी चाहिए या नहीं यह कई पहलुओं के इर्द गिर्द घूमता है। जैसे अपराध की प्रकृति क्या है, सजा की गंभीरता, प्रथमदृष्टया अपराध में आरोपी की संलिप्तता। ये सभी पहलू जमानत पर फैसले के लिए बेहद जरूरी हैं। जमानत के क्षेत्राधिकार को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा, आमतौर पर शीर्ष अदालत ऐसे आदेश में हस्तक्षेप नहीं करती है। हालांकि, यह हाईकोर्ट पर निर्भर है कि वह जमानत पर फैसला करते वक्त इस अदालत के निर्णयों में निर्धारित बुनियादी सिद्धांतों का विवेकपूर्ण ढंग से पालन करें।
सुप्रीम कोर्ट ने खनन कंपनियों को कर्नाटक के बल्लारी, चित्रदुर्ग और तुमकुरु जिलों की खदानों से अपने लौह अयस्क का निर्यात करने की अनुमति दे दी। सीजेआई एनवी रमण, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस हिमा कोहली ने शुक्रवार को केंद्र सरकार के रुख पर गौर किया और लौह अयस्क के निर्यात पर लगी रोक हटा दी।
पीठ ने कंपनियों को अधिकारियों की लगाई गई शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, हम अपीलकर्ताओं को कर्नाटक के तीन जिलों में पहले से ही उत्खनित लौह अयस्क स्टॉक आदि को बेचने की अनुमति देते हैं।
साथ ही ई-नीलामी का सहारा लिए बिना प्रत्यक्ष अनुबंधों में प्रवेश करके लौह अयस्क आवंटित करने की भी मंजूरी देते हैं। आवेदक को सरकार की नीतियों के दायरे में रहते हुए कर्नाटक में उत्पादित लौह अयस्क को विदेश में निर्यात करने की अनुमति देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में कर्नाटक की खदानों से लौह अयस्क के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।
केंद्र-राज्य कर्मियों के अधिकार सेवा नियमों से तय होते हैं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मियों के अधिकार और कर्तव्य संबंधित सेवा नियमों से ही निर्धारित होते हैं। यह फैसला देते हुए शीर्ष अदालत ने अपने ही 1983 के फैसले को पलट दिया। पुराने फैसले में कहा गया था कि नियमों में संशोधन से पहले वाली रिक्तियां पुराने नियम से प्रशासित होंगी न कि नए नियम से।
जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एसआर भट और पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि 1983 के फैसले का उक्त बयान, संविधान की 14वीं अनुसूची में दर्ज केंद्र और राज्यों के सेवा नियमों से संबंधित कानून को सही तरीके से नहीं प्रस्तुत करता। पीठ ने यह फैसला हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील पर दिया।
हाईकोर्ट ने तीन याचिकाकर्ताओं के मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि उन्हें उस नियम के आधार पर प्रोन्नति दी जाए जो रिक्तियों के समय लागू थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में 1983 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था। शीर्ष कोर्ट ने कहा, सवाल यह है कि नियमों के संशोधित होने से पहले खाली हुए पदों पर होने वाली नियुक्ति पर पुराने नियम लागू होंगे या नए।
यूजीसी के नियम बाध्यकारी न होने संबंधित उड़ीसा हाईकोर्ट के आदेश पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों में शिक्षकों व अन्य अकादमी पदों पर नियुक्ति के बारे में यूजीसी के 2018 के नियम ओडिशा के विश्वविद्यालयों पर बाध्यकारी न होने संबंधित उड़ीसा हाईकोर्ट के आदेश पर तीन महीने की रोक लगा दी है। जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की अपील पर यह रोक लगाई है।
यूजीसी का पक्ष है कि 2018 के नियमों में साफ किया गया है कि राज्य विश्वविद्यालयों पर बाध्यकारी है, ऐसे में उड़ीसा हाईकोर्ट का फैसला गलत है। हाईकोर्ट ने फैसले में कहा था कि राज्य के विश्वविद्यालय ओडिशा यूनिवर्सिटी एक्ट, 1989 (2020 में संशोधित) से प्रशासित होते हैं इसलिए उनपर यूजीसी के ये नियम लागू नहीं होते। यूजीसी ने इन नियमों में पूरे देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शैक्षिक स्टॉफ की नियुक्ति को लेकर न्यूनतम मानक तय किए हैं।
इन नियमों के लागू होने के बाद ओडिशा सरकार ने ओडिशा यूनिवर्सिटी एक्ट 2020 लागू किया। इस कानून को हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर कर यह कहते हुए चुनौती दी गई थी कि यह यूजीसी के नियम से असंगत है। हाईकोर्ट ने यूजीसी के नियम को राज्य के विश्वविद्यालयों पर बाध्यकारी न होने का आदेश पारित किया था।