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Supreme Court: 'प्रशासन में निष्पक्षता अनुग्रह नहीं दायित्व', अदालत ने कई फैसलों का हवाला देकर की अहम टिप्पणी

Wed, 20 Aug 2025 07:12 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 20 Aug 2025 07:12 AM IST
सार

यूपी के कर्मचारियों ने राज्य सरकार की ओर से स्वीकृत पदों के सृजन के आयोग के बार-बार प्रस्तावों को अस्वीकार करने को चुनौती दी थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रशासन में निष्पक्षता और पारदर्शिता अनुग्रह का विषय नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत दायित्व हैं। 

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supreme court Impartial administration Justice Dipankar Datta AG Masih order
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रशासन में निष्पक्षता और पारदर्शिता अनुग्रह का विषय नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत दायित्व हैं। यूपी के कर्मचारियों ने राज्य सरकार की ओर से स्वीकृत पदों के सृजन के आयोग के बार-बार प्रस्तावों को अस्वीकार करने को चुनौती दी थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की खंडपीठ ने फैसला दिया। 

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1999 और फिर 2003 में, सरकार ने वित्तीय बाधाओं और नए पदों पर प्रतिबंध का हवाला देते हुए उनके अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2009 में उनकी रिट याचिका खारिज कर दी। वर्ष 2017 में एक खंडपीठ ने भी बर्खास्तगी की पुष्टि करते हुए कहा कि नियमितीकरण के लिए कोई नियम नहीं हैं और यह कहते हुए कि कोई रिक्तियां नहीं हैं, उन्हें राहत देने से इन्कार कर दिया।
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कई फैसलों का दिया हवाला
अदालत ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता आयोग के कामकाज के लिए जरूरी बारहमासी काम में लगातार लगे हुए थे और वित्तीय संकट के सामान्य तर्क पर राज्य द्वारा इनकार करना बेतुका और अनुचित था। न्यायालय ने जग्गो बनाम भारत सरकार (2024) और श्रीपाल बनाम नगर निगम, गाजियाबाद (2025) जैसे हालिया उदाहरणों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक रोजगार में दीर्घकालिक तदर्थवाद संवैधानिक गारंटियों के विपरीत है।

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यह पिछले दरवाजे से नियुक्ति का मामला नहीं
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता राजेश जी इनामदार और शाश्वत आनंद ने तर्क दिया कि यह मामला पिछले दरवाजे से नियुक्तियों का नहीं है बल्कि राज्य के मनमाने ढंग से पदों को स्वीकृत करने से इन्कार करने का है, जबकि आयोग ने स्वयं 1991 में ही इस आवश्यकता को स्वीकार कर लिया था। अदालत ने कहा कि आयोग ने 1991 से पदों के सृजन के लिए प्रस्ताव पारित किए हैं और कई सिफारिशें भेजी हैं।

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