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एफसीआरए बिल के लिए जेपीसी गठित: कमेटी की कमान भाजपा सांसद संजय जायसवाल के हाथ: लिस्ट में और किन सांसदों के नाम
Thu, 03 Sep 2026 09:32 PM IST
प्रशांत तिवारी
एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Thu, 03 Sep 2026 09:32 PM IST
सार
भाजपा सांसद संजय जायसवाल को FCRA संशोधन विधेयक-2026 की जांच के लिए गठित जेपीसी का अध्यक्ष बनाया गया है। समिति में लोकसभा और राज्यसभा के 21 सदस्य शामिल हैं।
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भाजपा सांसद संजय जायसवाल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
भारतीय जनता पार्टी के सांसद संजय जायसवाल को FCRA संशोधन विधेयक-2026 पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। बिहार के बेतिया से लोकसभा सांसद संजय जायसवाल की नियुक्ति गुरुवार को की गई। FCRA संशोधन विधेयक-2026 की विस्तृत जांच के लिए गठित संयुक्त समिति में लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों के सदस्य शामिल हैं।
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जेपीसी में और कौन-कौन से सांसद?
लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, समिति में लोकसभा से नामित 21 सदस्यों में संजय जायसवाल के अलावा भर्तृहरि महताब, तेजस्वी सूर्या, कमलेश जांगड़े, मुकेशकुमार चंद्रकांत दलाल, निशिकांत दुबे, विष्णु दयाल राम, अनंत नायक, अरविंद धर्मपुरी, एंटो एंटनी, कैप्टन विरियाटो फर्नांडिस, मोहम्मद हमदुल्ला सईद, कालीचरण मुंडा, जिया उर रहमान, कल्याण बनर्जी, ए. राजा, लावू श्रीकृष्ण देवरायालु, नरेश गणपत म्हासके, कौशलेन्द्र कुमार, सुप्रिया सुले और ई. टी. मोहम्मद बशीर शामिल हैं। राज्यसभा से सी. सदानंदन मास्टर, हर्षवर्धन श्रृंगला, उज्ज्वल देवराे निकम और अलका गुर्जर को समिति में नामित किया गया है।
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विपक्ष के विरोध के बीच JPC को भेजा गया विधेयक
हाल ही में संपन्न हुए मानसून सत्र के दौरान विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया था। विपक्ष ने इस विधेयक को वापस लेने की जोरदार मांग की थी। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने आरोप लगाया था कि प्रस्तावित बदलावों का इस्तेमाल गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), अल्पसंख्यक संस्थानों और विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
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विपक्ष ने सरकार पर नियंत्रण बढ़ाने का लगाया आरोप
विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रस्तावित संशोधनों से विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है। उनका दावा है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल उन संस्थानों के खिलाफ चुनिंदा तरीके से किया जा सकता है, जो सरकार के रुख से सहमत नहीं हैं। विपक्ष का कहना है कि विधेयक में नागरिक समाज और अल्पसंख्यक संस्थानों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा के प्रावधान होने चाहिए।
सरकार ने बताया राष्ट्रीय हित से जुड़ा कदम
वहीं, सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी अंशदान की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना है, ताकि विदेश से मिलने वाली रकम का दुरुपयोग या ऐसी गतिविधियों में उसका इस्तेमाल न हो सके, जिससे राष्ट्रीय हित प्रभावित हों। सरकार ने विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर जोर दिया है। JPC को विधेयक भेजे जाने से दोनों पक्षों को संसद के समक्ष विस्तृत प्रस्ताव और अपनी आपत्तियां रखने का अवसर मिलेगा।
सर्दियों के सत्र में फिर संसद के सामने आएगा विधेयक
अब दोनों सदनों के सदस्यों वाली समिति इस विधेयक के प्रावधानों और विभिन्न पक्षों की ओर से उठाई गई चिंताओं की विस्तार से जांच करेगी। समिति की रिपोर्ट संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की उम्मीद है। हालांकि, कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों ने स्पष्ट कर दिया है कि समिति की समीक्षा पूरी होने के बाद भी वे विधेयक का विरोध जारी रखेंगे। इससे सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
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क्या है FCRA का ढांचा?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) का ढांचा व्यक्तियों, संघों और संगठनों को मिलने वाले विदेशी अंशदान के प्राप्त करने और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करता है। इसका घोषित उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से प्राप्त धनराशि का इस्तेमाल उन्हीं उद्देश्यों के लिए किया जाए, जिनके लिए उसे अनुमति दी गई है। मौजूदा राजनीतिक गतिरोध ऐसे समय में सामने आया है, जब सरकार विदेशी फंडिंग की निगरानी और जांच को और मजबूत करना चाहती है, जबकि विपक्षी दल नागरिक समाज और अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं।