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मौसम की मार: 2027 तक मौसम पर भारी पड़ेगा अल नीनो, अभी और प्रचंड रूप लेने की चेतावनी
Thu, 03 Sep 2026 09:01 PM IST
राहुल कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: राहुल कुमार
Updated Thu, 03 Sep 2026 09:01 PM IST
सार
प्रशांत महासागर में अल नीनो सक्रिय हो चुका है और 2026 के अंत तक इसके मजबूत होने की आशंका है। इसका असर वैश्विक तापमान, बारिश और चरम मौसम पर पड़ेगा। भारत में कहीं सूखा तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
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अल नीनो का दिखने लगा असर।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
प्रशांत महासागर में बढ़ती असाधारण गर्मी ने दुनिया के मौसम को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक अल नीनो अब सक्रिय हो चुका है और आने वाले महीनों में इसके और मजबूत होने की आशंका है। पूर्वानुमानों के अनुसार इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना करीब 100 फीसदी है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि यह 2026 के अंत में अपने चरम पर पहुंच सकता है।
अल नीनो की तीव्रता मापने वाले नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक अधिक पहुंच चुका है। मई-जुलाई 2026 में यह अंतर औसतन 1.5 डिग्री था, जो जुलाई में करीब 2 डिग्री हो गया। जुलाई के अंत से अगस्त के मध्य तक साप्ताहिक तापमान सामान्य से 2.2 से 2.6 डिग्री अधिक दर्ज किया गया। इससे भी ज्यादा चिंता समुद्र के भीतर की गर्मी को लेकर है, जहां कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से 8 डिग्री सेल्सियस से अधिक ऊपर रहा।डब्ल्यूएमओ के अनुसार समुद्र और वायुमंडल से जुड़े संकेतों के साथ अलग-अलग मौसमी पूर्वानुमान प्रणालियां भी अल नीनो के मजबूत होने की ओर इशारा कर रही हैं। इसका असर केवल प्रशांत महासागर के आसपास के देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
सितंबर से नवंबर 2026 के दौरान दुनिया के ज्यादातर भू-भागों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की आशंका है। मजबूत अल नीनो के कारण कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे इलाकों में बारिश घटने से सूखे की स्थिति बन सकती है। कई क्षेत्रों में असामान्य गर्मी भी बढ़ सकती है।वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो का प्रभाव समुद्र के तापमान के चरम पर पहुंचने के बाद भी कुछ समय तक जारी रह सकता है। इसलिए 2027 में भी दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर इसका असर दिखाई दे सकता है।
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भारत में सिर्फ कमजोर बारिश का खतरा नहीं
भारत के लिए अल नीनो की सबसे अहम बात यह है कि इसका असर पूरे देश में एक जैसा नहीं होगा। इसे केवल मानसून कमजोर होने या बारिश घटने के खतरे के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। बारिश की मात्रा के साथ उसके समय, वितरण और तीव्रता में भी बदलाव हो सकता है।भारत में 100 से अधिक वर्षों के बारिश के आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि अल नीनो के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह के प्रभाव सामने आ सकते हैं। दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भारत जैसे अपेक्षाकृत सूखे क्षेत्रों में कुल बारिश और भारी बारिश की घटनाओं में कमी आ सकती है। इससे खेती, जलाशयों और भूजल पर दबाव बढ़ने का खतरा रहेगा।इसके उलट मध्य और दक्षिण-पश्चिमी भारत जैसे अपेक्षाकृत नम क्षेत्रों में बारिश के दिन कम हो सकते हैं, लेकिन जब बारिश होगी तो वह बेहद तेज हो सकती है। अध्ययन के मुताबिक ऐसे नम इलाकों में भारी बारिश की आशंका 43 फीसदी तक बढ़ सकती है। यानी कुल बारिश में बड़ी वृद्धि न होने के बावजूद कम समय में बहुत ज्यादा पानी गिरने से अचानक बाढ़, जलभराव और फसलों को नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।
हिंद महासागर भी बदलेगा असर
भारत में अल नीनो के प्रभाव को समझने के लिए सिर्फ प्रशांत महासागर को देखना पर्याप्त नहीं होगा। डब्ल्यूएमओ ने सितंबर से नवंबर 2026 के दौरान सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) के विकसित होने की संभावना जताई है। इसके अलावा उष्णकटिबंधीय अटलांटिक महासागर का तापमान भी सामान्य से अधिक रहने की आशंका है।इन समुद्री परिस्थितियों का मेल कुछ क्षेत्रों में अल नीनो के पारंपरिक प्रभावों को बढ़ा सकता है तो कहीं उनका स्वरूप बदल सकता है। इसलिए किसी क्षेत्र में बारिश कितनी होगी, इसका आकलन केवल अल नीनो की तीव्रता के आधार पर नहीं किया जा सकता।
समुद्र का रिकॉर्ड तापमान भी चिंता बढ़ा रहा
अल नीनो की यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब पूरी दुनिया पहले से ही असाधारण समुद्री गर्मी का सामना कर रही है। 22 अगस्त को वैश्विक औसत समुद्री सतह का तापमान 21.1 डिग्री सेल्सियस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। वैज्ञानिकों के लिए यह महासागरों पर बढ़ते तापीय दबाव का एक और संकेत है।अल नीनो स्वयं जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा नहीं होता। यह अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) की प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह आमतौर पर हर दो से सात वर्ष में आता है और करीब नौ से 12 महीने तक बना रहता है।लेकिन बदलती वैश्विक जलवायु की पृष्ठभूमि में इसके साथ आने वाली गर्मी और चरम मौसमी घटनाओं का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। यही वजह है कि डब्ल्यूएमओ ने सरकारों और राष्ट्रीय मौसम एजेंसियों से समय रहते पूर्व चेतावनी और आपदा तैयारी मजबूत करने की अपील की है।
अब चुनौती तैयारी की
अल नीनो के मजबूत होने का मतलब हर जगह एक जैसा मौसम नहीं है। असली चुनौती यह पहचानने की है कि कहां सूखे का खतरा बढ़ेगा और कहां कम दिनों में अत्यधिक बारिश होगी।भारत में किसानों के लिए समय पर मौसम आधारित सलाह, जलाशयों और सिंचाई व्यवस्था का बेहतर प्रबंधन, बाढ़ संभावित क्षेत्रों की तैयारी और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा। शहरों में जलभराव और अत्यधिक गर्मी से निपटने की तैयारी भी जरूरी होगी। प्रशांत महासागर में उठ रही गर्मी हजारों किलोमीटर दूर भारत के खेतों, जलस्रोतों और शहरों तक असर डाल सकती है। इसलिए अल नीनो की यह चेतावनी सिर्फ मौसम का पूर्वानुमान नहीं, बल्कि समय रहते तैयारी करने का संकेत भी है।
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अल नीनो की तीव्रता मापने वाले नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक अधिक पहुंच चुका है। मई-जुलाई 2026 में यह अंतर औसतन 1.5 डिग्री था, जो जुलाई में करीब 2 डिग्री हो गया। जुलाई के अंत से अगस्त के मध्य तक साप्ताहिक तापमान सामान्य से 2.2 से 2.6 डिग्री अधिक दर्ज किया गया। इससे भी ज्यादा चिंता समुद्र के भीतर की गर्मी को लेकर है, जहां कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से 8 डिग्री सेल्सियस से अधिक ऊपर रहा।डब्ल्यूएमओ के अनुसार समुद्र और वायुमंडल से जुड़े संकेतों के साथ अलग-अलग मौसमी पूर्वानुमान प्रणालियां भी अल नीनो के मजबूत होने की ओर इशारा कर रही हैं। इसका असर केवल प्रशांत महासागर के आसपास के देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
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सितंबर से नवंबर 2026 के दौरान दुनिया के ज्यादातर भू-भागों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की आशंका है। मजबूत अल नीनो के कारण कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे इलाकों में बारिश घटने से सूखे की स्थिति बन सकती है। कई क्षेत्रों में असामान्य गर्मी भी बढ़ सकती है।वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो का प्रभाव समुद्र के तापमान के चरम पर पहुंचने के बाद भी कुछ समय तक जारी रह सकता है। इसलिए 2027 में भी दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर इसका असर दिखाई दे सकता है।
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भारत में सिर्फ कमजोर बारिश का खतरा नहीं
भारत के लिए अल नीनो की सबसे अहम बात यह है कि इसका असर पूरे देश में एक जैसा नहीं होगा। इसे केवल मानसून कमजोर होने या बारिश घटने के खतरे के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। बारिश की मात्रा के साथ उसके समय, वितरण और तीव्रता में भी बदलाव हो सकता है।भारत में 100 से अधिक वर्षों के बारिश के आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि अल नीनो के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह के प्रभाव सामने आ सकते हैं। दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भारत जैसे अपेक्षाकृत सूखे क्षेत्रों में कुल बारिश और भारी बारिश की घटनाओं में कमी आ सकती है। इससे खेती, जलाशयों और भूजल पर दबाव बढ़ने का खतरा रहेगा।इसके उलट मध्य और दक्षिण-पश्चिमी भारत जैसे अपेक्षाकृत नम क्षेत्रों में बारिश के दिन कम हो सकते हैं, लेकिन जब बारिश होगी तो वह बेहद तेज हो सकती है। अध्ययन के मुताबिक ऐसे नम इलाकों में भारी बारिश की आशंका 43 फीसदी तक बढ़ सकती है। यानी कुल बारिश में बड़ी वृद्धि न होने के बावजूद कम समय में बहुत ज्यादा पानी गिरने से अचानक बाढ़, जलभराव और फसलों को नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।
हिंद महासागर भी बदलेगा असर
भारत में अल नीनो के प्रभाव को समझने के लिए सिर्फ प्रशांत महासागर को देखना पर्याप्त नहीं होगा। डब्ल्यूएमओ ने सितंबर से नवंबर 2026 के दौरान सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) के विकसित होने की संभावना जताई है। इसके अलावा उष्णकटिबंधीय अटलांटिक महासागर का तापमान भी सामान्य से अधिक रहने की आशंका है।इन समुद्री परिस्थितियों का मेल कुछ क्षेत्रों में अल नीनो के पारंपरिक प्रभावों को बढ़ा सकता है तो कहीं उनका स्वरूप बदल सकता है। इसलिए किसी क्षेत्र में बारिश कितनी होगी, इसका आकलन केवल अल नीनो की तीव्रता के आधार पर नहीं किया जा सकता।
समुद्र का रिकॉर्ड तापमान भी चिंता बढ़ा रहा
अल नीनो की यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब पूरी दुनिया पहले से ही असाधारण समुद्री गर्मी का सामना कर रही है। 22 अगस्त को वैश्विक औसत समुद्री सतह का तापमान 21.1 डिग्री सेल्सियस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। वैज्ञानिकों के लिए यह महासागरों पर बढ़ते तापीय दबाव का एक और संकेत है।अल नीनो स्वयं जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा नहीं होता। यह अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) की प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह आमतौर पर हर दो से सात वर्ष में आता है और करीब नौ से 12 महीने तक बना रहता है।लेकिन बदलती वैश्विक जलवायु की पृष्ठभूमि में इसके साथ आने वाली गर्मी और चरम मौसमी घटनाओं का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। यही वजह है कि डब्ल्यूएमओ ने सरकारों और राष्ट्रीय मौसम एजेंसियों से समय रहते पूर्व चेतावनी और आपदा तैयारी मजबूत करने की अपील की है।
अब चुनौती तैयारी की
अल नीनो के मजबूत होने का मतलब हर जगह एक जैसा मौसम नहीं है। असली चुनौती यह पहचानने की है कि कहां सूखे का खतरा बढ़ेगा और कहां कम दिनों में अत्यधिक बारिश होगी।भारत में किसानों के लिए समय पर मौसम आधारित सलाह, जलाशयों और सिंचाई व्यवस्था का बेहतर प्रबंधन, बाढ़ संभावित क्षेत्रों की तैयारी और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा। शहरों में जलभराव और अत्यधिक गर्मी से निपटने की तैयारी भी जरूरी होगी। प्रशांत महासागर में उठ रही गर्मी हजारों किलोमीटर दूर भारत के खेतों, जलस्रोतों और शहरों तक असर डाल सकती है। इसलिए अल नीनो की यह चेतावनी सिर्फ मौसम का पूर्वानुमान नहीं, बल्कि समय रहते तैयारी करने का संकेत भी है।