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धनुष बाण विवाद: शिंदे गुट का सुप्रीम कोर्ट में दावा- उद्धव ने 2018 में बदला बालासाहेब का संविधान, बवाल क्यों?
Wed, 02 Sep 2026 03:41 PM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 02 Sep 2026 03:41 PM IST
सार
शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न 'धनुष-बाण' को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जारी कानूनी जंग में शिंदे गुट ने दावा किया है कि उद्धव ठाकरे ने 2018 में बालासाहेब की ओर से बनाए गए लोकतांत्रिक संविधान को बदलकर तानाशाही अधिकार हासिल कर लिए थे। वहीं, उद्धव गुट ने शिंदे खेमे के दावों को असांविधानिक बताते हुए नाम और चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग की है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
महाराष्ट्र की सियासत और 'असली शिवसेना' की जंग एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे पर आ पहुंची है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट ने अपना पक्ष रखते हुए गंभीर आरोप लगाए। शिंदे गुट ने अदालत में कहा कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने पार्टी के अंदर लोकतंत्र बनाए रखने और शक्तियां एक हाथ में केंद्रित न हों, इसके लिए एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा तैयार किया था। हालांकि, साल 2018 में उद्धव ठाकरे ने इस पूरे ढांचे को बदलकर सारी ताकतें अपने हाथों में समेट लीं।
शिंदे गुट का तर्क
शिंदे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने तर्क रखा। उन्होंने बताया कि 1999 में चुनाव आयोग के निर्देश के बाद पार्टी का संविधान आयोग को सौंपा गया था। कौल ने कहा कि 1994 से ही चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक संविधान अपनाने का निर्देश देता आ रहा था। शुरुआत में शिवसेना ने कहा था कि उनका संविधान चुनावों की अनुमति नहीं देता, लेकिन बाद में आयोग के समझाने पर संविधान में संशोधन किया गया।
2018 का बदलाव और आंतरिक असंतोष
वरिष्ठ वकील कौल ने आरोप लगाया कि बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद 2018 में उद्धव ठाकरे ने पार्टी संविधान में चोरी-छिपे बड़ा बदलाव किया। उन्होंने कहा कि नए बदलावों के जरिए सभी प्रशासनिक अधिकार पार्टी प्रमुख को दे दिए गए और इस संशोधित संविधान की जानकारी चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं कराई गई। कौल ने तर्क दिया कि पार्टी के भीतर लगातार असंतोष पनप रहा था, क्योंकि नेतृत्व ने उन दलों (कांग्रेस-एनसीपी) से हाथ मिला लिया था जो शिवसेना की मूल विचारधारा के बिल्कुल विपरीत थे। इसी वजह से विधायकों ने बगावत की और असली शिवसेना होने का दावा ठोका।
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उद्धव गुट का पक्ष
शिंदे गुट ने दलील दी कि चुनाव आयोग का 'विधायी बहुमत' के आधार पर असली पार्टी तय करने का फैसला पूरी तरह सही था। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और देवदत्त कामत ने इसका कड़ा विरोध किया। उद्धव गुट ने कहा कि शिंदे गुट की ओर से 'शिवसेना' नाम और 'धनुष-बाण' निशान का इस्तेमाल पूरी तरह गैर-कानूनी है। उन्होंने शीर्ष अदालत से गुहार लगाई कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक शिंदे गुट को इस नाम और चिह्न के इस्तेमाल से रोका जाए। इस मामले पर सुनवाई बेनतीजा रही और अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने पार्टी के संविधान और 19 लाख प्राथमिक सदस्यों की अनदेखी कर सिर्फ विधायकी संख्या बल के आधार पर फैसला दे दिया, जो पूरी तरह से गलत है।
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शिंदे गुट का तर्क
शिंदे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने तर्क रखा। उन्होंने बताया कि 1999 में चुनाव आयोग के निर्देश के बाद पार्टी का संविधान आयोग को सौंपा गया था। कौल ने कहा कि 1994 से ही चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक संविधान अपनाने का निर्देश देता आ रहा था। शुरुआत में शिवसेना ने कहा था कि उनका संविधान चुनावों की अनुमति नहीं देता, लेकिन बाद में आयोग के समझाने पर संविधान में संशोधन किया गया।
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2018 का बदलाव और आंतरिक असंतोष
वरिष्ठ वकील कौल ने आरोप लगाया कि बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद 2018 में उद्धव ठाकरे ने पार्टी संविधान में चोरी-छिपे बड़ा बदलाव किया। उन्होंने कहा कि नए बदलावों के जरिए सभी प्रशासनिक अधिकार पार्टी प्रमुख को दे दिए गए और इस संशोधित संविधान की जानकारी चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं कराई गई। कौल ने तर्क दिया कि पार्टी के भीतर लगातार असंतोष पनप रहा था, क्योंकि नेतृत्व ने उन दलों (कांग्रेस-एनसीपी) से हाथ मिला लिया था जो शिवसेना की मूल विचारधारा के बिल्कुल विपरीत थे। इसी वजह से विधायकों ने बगावत की और असली शिवसेना होने का दावा ठोका।
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उद्धव गुट का पक्ष
शिंदे गुट ने दलील दी कि चुनाव आयोग का 'विधायी बहुमत' के आधार पर असली पार्टी तय करने का फैसला पूरी तरह सही था। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और देवदत्त कामत ने इसका कड़ा विरोध किया। उद्धव गुट ने कहा कि शिंदे गुट की ओर से 'शिवसेना' नाम और 'धनुष-बाण' निशान का इस्तेमाल पूरी तरह गैर-कानूनी है। उन्होंने शीर्ष अदालत से गुहार लगाई कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक शिंदे गुट को इस नाम और चिह्न के इस्तेमाल से रोका जाए। इस मामले पर सुनवाई बेनतीजा रही और अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने पार्टी के संविधान और 19 लाख प्राथमिक सदस्यों की अनदेखी कर सिर्फ विधायकी संख्या बल के आधार पर फैसला दे दिया, जो पूरी तरह से गलत है।