Justice A. Amanullah: 'मध्यस्थता अपनाने के लिए सोच बदलना जरूरी', जस्टिस ने बताया कैसे कम होगा अदालतों का बोझ
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ए अमानुल्लाह ने कहा कि देश में मध्यस्थता को लोकप्रिय बनाने के लिए लोगों की सोच बदलनी होगी और जमीनी स्तर पर भरोसा पैदा करना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता और पंचाट अलग प्रक्रियाएं हैं।
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देश में विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता को व्यापक रूप से अपनाने के लिए लोगों की सोच में बदलाव और जमीनी स्तर पर भरोसा पैदा करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ए अमानुल्लाह ने शनिवार को यह बात कही। उन्होंने कहा कि जब तक आम लोगों में यह विश्वास नहीं बनेगा कि मध्यस्थता उनके हित में है, तब तक यह व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाएगी।
राष्ट्रीय मध्यस्थता सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि अक्सर लोग मध्यस्थता को पंचाट से जोड़कर देखते हैं, जबकि दोनों प्रक्रियाएं मूल रूप से अलग हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक मध्यस्थ का नजरिया पंच की तरह नहीं हो सकता। मध्यस्थता का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच संवाद के जरिए समाधान निकालना होता है, न कि किसी एक को विजेता और दूसरे को पराजित घोषित करना।
मुकदमेबाजी से मुक्ति का रास्ता
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि जब किसी विवाद का समाधान मध्यस्थता से होता है, तो इससे मध्यस्थ को भी गहरी संतुष्टि मिलती है। आम लोग भी चाहते हैं कि उनके झगड़े अदालतों में वर्षों तक न चलें और पीढ़ियों तक न खिंचें। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति लंबी कानूनी लड़ाई नहीं चाहता, बल्कि सम्मानजनक और शांतिपूर्ण समाधान चाहता है।
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न्याय प्रणाली से अलग, लेकिन समानांतर व्यवस्था
उन्होंने यह भी कहा कि मध्यस्थता और पारंपरिक न्यायिक व्यवस्था में कोई टकराव नहीं होना चाहिए। दोनों को समानांतर रूप से काम करना चाहिए। जमीनी स्तर पर यह भरोसा पैदा करना जरूरी है कि मध्यस्थता न सिर्फ पक्षकारों के हित में है, बल्कि देशहित में भी है। इससे अदालतों पर बोझ कम होगा और न्याय सुलभ बनेगा।
न्यायाधीश ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया और उसके ट्रस्ट द्वारा आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन की सराहना की। उन्होंने बताया कि इस दौरान 11 घंटे से अधिक समय तक पैनल चर्चा, नीति संवाद, प्रशिक्षण कार्यक्रम और तकनीकी सत्र हुए। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि कुछ चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन मध्यस्थता के विस्तार के लिए आदर्श हालात का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए।
संवाद की पुरानी परंपरा की याद
समापन सत्र में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह ने कहा कि भारत में अदालतों और कानूनों से पहले भी संवाद और समुदाय के जरिए विवाद सुलझाए जाते थे। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता कोई नई व्यवस्था नहीं, बल्कि पुरानी समझदारी की वापसी है। कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा सहित कई न्यायाधीश मौजूद रहे।
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