{"_id":"5b1305074f1c1ba66e8b5ece","slug":"supreme-court-dismisses-plea-of-delhi-high-court-challenging-order-of-railway-petition","type":"story","status":"publish","title_hn":"वेटिंग में पेपर और ई-टिकट का अंतर हो सकता है खत्म, सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती देने वाली याचिका की खारिज","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
वेटिंग में पेपर और ई-टिकट का अंतर हो सकता है खत्म, सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती देने वाली याचिका की खारिज
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Sun, 03 Jun 2018 01:01 PM IST
विज्ञापन
काउंटर से वेटिंग टिकट लेने वालों और इंटरनेट के जरिए वेटिंग टिकट लेने का भेद हो सकता है खत्म। जल्द ही इंटरनेट के जरिए वेटिंग टिकट वालों को भी ट्रेन में सवार होने की इजाजत मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली रेलवे की याचिका को खाजिर कर दिया है जिसमें रेल मंत्रालय को काउंटर और इंटरनेट से लिए वेटिंग टिकट के भेद को खत्म करने पर कहा गया था। वर्तमान व्यवस्था के तहत जहां वेटिंग पेपर टिकट वालों को ट्रेन में सवार हो सकते हैं और कंफर्म टिकट वाले यात्रियों के नहीं आने की स्थिति में उन्हें सीट मिल जाती है वहीं दूसरी तरफ वेटिंग ई-टिकट वाले कंफर्म न होने की स्थिति में ट्रेन में सवार नहीं हो सकते। कंफर्म न होने की स्थिति में ई-टिकट खुद व खुद निरस्त हो जाता है।
न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने वर्ष 2014 के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली रेल मंत्रालय की याचिका खारिज कर दी है। वास्तव में सुनवाई की तारीख पर दो मौका देने के बाद भी रेलवे की ओर से कोई वकील अदालत के समक्ष पेश नहीं हुआ, लिहाजा पीठ ने याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेलवे की इस अपील को खारिज करने का मतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश प्रभावी रहेगा और रेलवे उस आदेश को मानने के लिए बाध्य है। यानी अब रेलवे को वेटिंग में पेपर और ई-टिकट का भेद खत्म करने कोई उपाय करना होगा।
जुलाई, 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रेलवे को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि ई-टिकट लेने वालों को नुकसान नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह आदेश एक वकील विभास कुमार झा की याचिका कर दिया था। हाईकोर्ट ने रेल मंत्रालय को काउंटर टिकट और ई-टिकट लेने वालों के बीच भेद को दूर करने का काम छह महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया था। साथ ही हाईकोर्ट ने रेलवे को यह भी सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि दलाल व एजेंट फर्जी नाम के जरिए टिकट ब्लॉक न करा पाए जिससे कि लोग अतिरिक्त पैसे देकर दलाल व एजेंट से पेपर टिकट खरीद सकें।
विज्ञापन
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इंटरनेट के जरिए लिया गया वेटिंग टिकट कंफर्म नहीं होने की स्थिति में खुद निरस्त हो जाता है। ऐसे में इन लोगों के लिए यह अवसर खत्म हो जाता है कि वे रेलवे स्टेशन जाकर सीट पाने की कोशिश करें। इस बात की संभावना होती है कि कुछ कंफर्म टिकट वाले लोग किसी कारणवश ट्रेन में सवार न हो पाए, ऐसी स्थिति में वेटिंग टिकट वालों को सीटें दी जाती है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो पेपर टिकट को ई-टिकट से अधिक तव्वजो देता हो।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने वर्ष 2014 के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली रेल मंत्रालय की याचिका खारिज कर दी है। वास्तव में सुनवाई की तारीख पर दो मौका देने के बाद भी रेलवे की ओर से कोई वकील अदालत के समक्ष पेश नहीं हुआ, लिहाजा पीठ ने याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेलवे की इस अपील को खारिज करने का मतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश प्रभावी रहेगा और रेलवे उस आदेश को मानने के लिए बाध्य है। यानी अब रेलवे को वेटिंग में पेपर और ई-टिकट का भेद खत्म करने कोई उपाय करना होगा।
विज्ञापन
जुलाई, 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रेलवे को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि ई-टिकट लेने वालों को नुकसान नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह आदेश एक वकील विभास कुमार झा की याचिका कर दिया था। हाईकोर्ट ने रेल मंत्रालय को काउंटर टिकट और ई-टिकट लेने वालों के बीच भेद को दूर करने का काम छह महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया था। साथ ही हाईकोर्ट ने रेलवे को यह भी सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि दलाल व एजेंट फर्जी नाम के जरिए टिकट ब्लॉक न करा पाए जिससे कि लोग अतिरिक्त पैसे देकर दलाल व एजेंट से पेपर टिकट खरीद सकें।
विज्ञापन
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इंटरनेट के जरिए लिया गया वेटिंग टिकट कंफर्म नहीं होने की स्थिति में खुद निरस्त हो जाता है। ऐसे में इन लोगों के लिए यह अवसर खत्म हो जाता है कि वे रेलवे स्टेशन जाकर सीट पाने की कोशिश करें। इस बात की संभावना होती है कि कुछ कंफर्म टिकट वाले लोग किसी कारणवश ट्रेन में सवार न हो पाए, ऐसी स्थिति में वेटिंग टिकट वालों को सीटें दी जाती है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो पेपर टिकट को ई-टिकट से अधिक तव्वजो देता हो।