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SC: लाल किले हमले से जुड़े 22 साल पुराने केस में फैसला, बरकरार रहेगी आतंकी आरिफ की फांसी की सजा

Thu, 03 Nov 2022 12:51 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 03 Nov 2022 12:51 PM IST
सार

आरिफ ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर कर अपनी सजा माफ करने की मांग की थी। उसका कहना था कि वह उम्रकैद के बराबर की सजा पहले ही जेल में काट चुका है।

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Supreme Court dismissed Mohammad Arif Ashfaq petition upholds death sentence in 2000 Red fort attack case
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने 22 साल पुराने लाल किले पर हमले के मामले में गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने हमले में दोषी करार दिए गए आतंकी आरिफ उर्फ अशफाक की फांसी की सजा बरकरार रखी है। दरअसल, आरिफ ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर कर अपनी सजा माफ करने की मांग की थी। उसका कहना था कि वह उम्रकैद के बराबर की सजा पहले ही जेल में काट चुका है। 
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चीफ जस्टिस यूयू ललित और न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी की एक पीठ ने कहा कि उसने ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड’ पर विचार करने के आवेदन को स्वीकार किया है। पीठ ने कहा, ‘‘हम उस आवेदन को स्वीकार करते हैं कि ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड’ पर विचार किया जाना चाहिए। वह दोषी साबित हुआ है। हम इस अदालत द्वारा किए गए फैसले को बरकरार रखते हैं और पुनर्विचार याचिका खारिज करते हैं।’’
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क्या है मामला?
22 दिसंबर 2000 में दिल्ली के लाल किले पर हुए हमले तीन लोगों की मौत हो गई थी।। इसमें हमले में सेना के दो जवानों समेत तीन लोग मारे गए थे। आरिफ उर्फ अशफाक इसी मामले में पकड़ा गया मुख्य आरोपी है। तब से वह दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद है। बाद में आरिफ को कोर्ट ने दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन आरिफ ने सुप्रीम कोर्ट में फांसी पर रोक लगाने की याचिका दायर की थी।
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2014 में लगी थी फांसी पर रोक
शीर्ष अदालत ने 2011 में दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दी थी। उसकी समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी थी। 28 अप्रैल, 2014 को कोर्ट ने फांसी पर रोक लगा दी। वर्ष 2016 में शीर्ष अदालत ने 2014 में दिए संविधान पीठ के एक फैसले के आलोक में समीक्षा याचिका पर फिर सुनवाई करने का फैसला किया।

22 साल पहले हुई थी घटना
22 दिसंबर, 2000 को कुछ दहशतगर्दों ने लाल किला परिसर में अंधाधुंध गोलीबारी में 7वीं राजपूताना राइफल्स के दो जवानों सहित तीन लोगों को मार दिया था। 25 दिसंबर, 2000 को पाकिस्तानी नागरिक मो. आरिफ को गिरफ्तार किया गया था। 24 अक्तूबर, 2005 को निचली अदालत ने उसे हत्या, आपराधिक साजिश और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने का दोषी ठहराया। 31 अक्तूबर, 2005 को मौत की सजा सुनाई गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 सितंबर, 2007 को मौत की सजा की पुष्टि की थी।

फैसले के बाद मंडोली में अशफाक की निगरानी बढ़ी
लालकिला गोली कांड के दोषी लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मुहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की फांसी की सजा को बरकरार रखे जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद मंडोली जेल में उसकी निगरानी बढ़ा दी गई है। जिस सेल में इसे रखा गया है वहां लगे सीसीटीवी कैमरे से उसपर नजर रखी जा रही है। साथ ही सेल में तैनात जेलकर्मियों को बाडी वार्न कैमरे से लैस कर दिया गया है। 

जेल प्रशासन का कहना है कि जेलकर्मी आतंकी के हर हावभाव और उसकी हरकत के बारे में जेल के आला अधिकारियों को सूचना दे रहे हैं। कैदी के स्वास्थ्य की लगातार जांच की जा रही है। उसके सेल से बाहर निकलने के दौरान भी उसपर विशेष निगरानी रखी जाएगी। साथ ही उसके आस पास किसी भी कैदी को जाने की इजाजत नहीं होगी।


गौरतलब है कि लाल किला हमले में दोषी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य है। आतंकी संगठन ने 22 दिसंबर 2000 को लाल किले पर धावा बोलते हुए सैन्य शिविर पर गोलीबारी की थी। इस हमले में सेना की तीन जवान मारे गए थे। जवाबी कार्रवाई में जवानों ने दो आतंकियों को मार गिराया गया था। अशफाक ही  हमले का मास्टरमाइंड था।
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