SC: 'लोकतंत्र की शुरुआत और अंत चुनाव से नहीं, प्रक्रिया की अखंडता महत्वपूर्ण', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
लोकतंत्र की शुरुआत और अंत चुनाव से नहीं होता है। सीजेआई ने अपने फैसले में कहा, लोकतंत्र कायम है क्योंकि निर्वाचित लोग उन मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होते हैं जो उन्हें उनके कार्यों और निष्क्रियताओं के लिए जवाबदेह ठहराते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र की शुरुआत और अंत चुनाव से नहीं होता। सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए हालांकि चुनाव प्रक्रिया की अखंडता महत्वपूर्ण है। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड योजना को असांवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया।
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा व जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कहा, संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ के रूप में बताया गया है। एक लोकतंत्र जिसमें नागरिकों को जाति और वर्ग के बावजूद राजनीतिक समानता की गारंटी दी जाती है। जहां हर वोट का मूल्य बराबर होता है।
लोकतंत्र की शुरुआत और अंत चुनाव से नहीं होता है। सीजेआई ने अपने फैसले में कहा, लोकतंत्र कायम है क्योंकि निर्वाचित लोग उन मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होते हैं जो उन्हें उनके कार्यों और निष्क्रियताओं के लिए जवाबदेह ठहराते हैं। यदि निर्वाचित लोग जरूरतमंदों की बात पर ध्यान नहीं देंगे तो क्या हम लोकतंत्र बने रहेंगे?
सीजेआई ने कहा, हमारा सवाल है कि क्या निर्वाचित लोग वास्तव में मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होंगे, जबकि कंपनियां जो मोटा चंदा देती हैं, वे पार्टियों के साथ परस्पर लाभ की व्यवस्था में शामिल हों। अगर उन्हें असीमित मात्रा में चंदा देने की अनुमति दी जाती है तो क्या होगा। पीठ ने कहा कि कंपनियों के चंदे का कारण दिन के उजाले जैसा स्पष्ट था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, ने भी केंद्र की ओर से तर्क देने के दौरान इस बात से इन्कार नहीं किया कि कॉर्पोरेट दान के बदले में लाभ देने की व्यवस्था है।
सभी राजनीतिक योगदान सार्वजनिक नीति को बदलने के लिए नहीं होते : पीठ ने कहा, ऐसा नहीं है कि सभी राजनीतिक योगदान सार्वजनिक नीति को बदलने के इरादे से किए जाते हैं। छात्र, दैनिक वेतनभोगी, शिक्षक आदि भी योगदान देते हैं। राजनीतिक योगदानों को सिर्फ इसलिए गोपनीयता का संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि कुछ योगदान अन्य उद्देश्यों के लिए किए गए हैं। यह स्वीकार्य नहीं है।
चुनाव प्रक्रिया की अखंडता अकेले निर्वाचन आयोग का कर्तव्य नहीं
पीठ ने कहा, अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को अधिसूचना जारी होने से लेकर परिणाम की अंतिम घोषणा तक चुनावी प्रक्रिया का प्रभारी जरूर बनाता है। लेकिन चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता और अखंडता सुरक्षित रखना चुनाव आयोग का एकमात्र कर्तव्य नहीं है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका समेत सरकार के अन्य अंगों का भी सांविधानिक कर्तव्य है।
ऐसा नहीं कि विधानमंडल लोगों के चंदे पर सीमा नहीं लगा सकता
पीठ ने कहा, फैसले का यह अर्थ बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि विधानमंडल चंदे पर कोई सीमा नहीं लगा सकता है। बात यह है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में नुकसान की मात्रा में भिन्नता के कारण कानून को कंपनियों और व्यक्तिगत योगदानकर्ताओं के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।
- राजनीतिक समानता वाले समाज में नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए समान मौके मिलने चाहिए। -सुप्रीम कोर्ट
- चुनावी बॉन्ड योजना फूल प्रूफ नहीं है। इसमें पर्याप्त खामियां हैं जो राजनीतिक दलों को किए गए योगदान का विवरण जानने में सक्षम बनाती हैं। -पीठ
- गोपनीयता नहीं, बल्कि पारदर्शिता ही इलाज और औषधि : जस्टिस खन्ना
चुनावी बॉन्ड योजना 2018 को असंवैधानिक घोषित करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी दानकर्ता के खिलाफ प्रतिशोध या उत्पीड़न राजनीतिक दलों को दिए गए दान को छुपाने का औचित्य या उद्देश्य नहीं हो सकता है।
सीजेआई से अलग लेकिन सहमति वाले अपने फैसले में जस्टिस संजीव खन्ना ने केंद्र सरकार के तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि यह बीमारी से निपटने और उसे ठीक करने की बजाय गलत को बनाए रखने और स्वीकार करने का प्रयास करता है।
अपने फैसले में जस्टिस खन्ना ने कहा है कि असंगतता इस रूप में भी स्पष्ट है कि कानून में बदलाव, गोपनीयता का आवरण देकर, सामूहिक रूप से सूचना के अधिकार और जानने के अधिकार पर गंभीर प्रतिबंध और कटौती करता है। गोपनीयता नहीं, बल्कि पारदर्शिता ही इलाज और औषधि है। किसी राजनीतिक दल को दान देने वाले किसी भी दानकर्ता के खिलाफ उत्पीड़न या प्रतिशोध कानून और शक्ति का दुरुपयोग है।
लोकतंत्र में जानने का अधिकार सर्वोपरि
जस्टिस संजीव खन्ना ने केंद्र सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि दानकर्ता अपनी पहचान गुमनाम रखना चाह सकता है।
जस्टिस खन्ना ने कहा, अगर दानकर्ता किसी दल को बैंकिंग चैनल से चंदा देता है तो निजता के अधिकार के उल्लंघन की दलील का कोई मतलब नहीं है। सत्ता में दलों के पास बैंक के साथ जानकारी तक असीमित पहुंच हो सकती है। इस लिहाज से योजना का पूरा उद्देश्य विरोधाभासी और असंगत है। निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र को जानने का अधिकार सर्वोपरि है।
एडीआर समेत चार याचिकाओं पर आया फैसला
चुनाव सुधारों व पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से मुहिम चला रहे गैरसरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर), कांग्रेस नेता जया ठाकुर व माकपा की ओर से चार याचिकाएं योजना के विरोध में दायर की गई थीं। पिछले साल 2 नवंबर को संविधान पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। एडीआर के वकील प्रशांत भूषण ने कहा, आम जनता को अब पता चलेगा कि दलों को कौन चंदा दे रहा है।