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Hindi News ›   India News ›   Supreme Court contempt case on Prashant Bhushan, What is the maximum punishment against contempt

क्या सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगेंगे प्रशांत भूषण? कितनी हो सकती है अधिकतम सजा

Fri, 14 Aug 2020 07:24 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 14 Aug 2020 07:24 PM IST
सार

प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना का का दोषी पाया, 20 अगस्त को होगी सजा पर सुनवाई...

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Supreme Court contempt case on Prashant Bhushan, What is the maximum punishment against contempt
प्रशांत भूषण - फोटो : ANI (File Photo)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी पाया है। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया। प्रशांत भूषण को इस मामले में कितनी सजा दी जाएगी, इस पर 20 अगस्त को कोर्ट में सुनवाई होगी। इस मामले में छह महीने की सजा या/और दो हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है, लेकिन अगर प्रशांत भूषण अपने ट्वीट के लिए माफी मांग लेते हैं और कोर्ट उनकी माफी से संतुष्ट हो जाती है, तो उन्हें प्रतीकात्मक सजा देकर माफ भी किया जा सकता है। लेकिन क्या प्रशांत भूषण अपने ट्वीट के लिए माफी मांगेंगे? उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए अपने ट्वीट को ‘स्वस्थ आलोचना’ के दायरे में बताया है।

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न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं- आभा सिंह  

वरिष्ठ वकील आभा सिंह ने प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी पाए जाने पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि प्रशांत भूषण ने अपने ट्वीट के जरिए न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। प्रशांत भूषण के ट्वीट पर कार्रवाई करते हुए इस मामले की जांच कराई जानी चाहिए थी। आज कोई भी यह नहीं कह सकता कि न्यायपालिका पूरी तरह भ्रष्टाचार से मुक्त है, इसलिए इस तरह का मुद्दा उठाने को न्यायपालिका की अवमानना नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे उम्मीद करती हैं कि 20 अगस्त को जब इस मामले में सजा पर बहस होगी, सर्वोच्च अदालत दयापूर्ण रुख अपनाएगी  और उन्हें सजा से मुक्त कर दिया जाएगा।

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बरकरार रहे सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता- माजिद मेनन

वरिष्ठ वकील माजिद मेनन ने कहा कि देश में लोकतंत्र की सफलता निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका के आधार पर टिकी है। इसकी सर्वोच्चता हर हाल में बरकरार रहनी चाहिए। कोई वकील हो या कोई जज या समाज के अन्य हिस्से का कोई व्यक्ति, किसी को भी न्यायपालिका की अवमानना की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का डर बरकरार रहना चाहिए। उसकी सर्वोच्चता पर कोई उंगली नहीं उठाई जा सकती।

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सजा के कड़े प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी उपाध्याय ने कहा कि न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of court Act, 1971) के अंतर्गत इस मामले में दोषी व्यक्ति को छह महीने की सजा सुनाई जा सकती है, या/और दो हजार रुपये का जुर्माना किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कोर्ट कई तरह के दंडात्मक आदेश दे सकता है। इसमें किसी वकील का वकालत का लाइसेंस निरस्त करना और उसका ग्रेड नीचे करना भी हो सकता है।

किस तरह के मामले

अदालत की अवमानना के मामले में भी कई विषय हैं। अदालत के निर्णय डिक्री, आदेश या अन्य प्रक्रिया की जानबूझकर अवज्ञा करना सिविल अवमानना कहा जाता है। अदालत के विषय में कोई आपत्तिजनक बात प्रकाशित करना आपराधिक अवमानना के दायरे में आता है। लेकिन किसी मामले का स्वस्थ प्रकाशन, स्वस्थ आलोचना या अदालत के प्रशासनिक पक्ष पर टिप्पणी करना अवमानना के दायरे में नहीं आता है।

1991 के एक मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया था कि उसे न सिर्फ अपनी अवमानना के मामले में, बल्कि हाई कोर्ट या अधीनस्थ न्यायालयों के मामलों में भी किसी को दंडित करने का अधिकार है। इसका एक्ट का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय का किसी के भी डर के बिना निष्पक्ष निर्णय लेने की क्षमता से देखा जाता है।

इन्हें मिल चुकी है सजा

अदालत की अवमानना का मामला कई बार न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों पर भी भारी पड़ा है। पूर्व जस्टिस कर्णन और वरिष्ठ वकील आरके आनंद को भी अदालत की अवमानना के मामले में सजा दी जा चुकी है। इसी प्रकार कुछ बड़ी कंपनियों को भी अदालत की अवमानना के मामले में जुर्माना भुगतना पड़ा है।

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