फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court CJI suryakant says Delivering flurry of judgments before retirement is unfortunate

Supreme Court: 'सेवानिवृत्ति से पहले ताबड़तोड़ फैसले सुनाना...दुर्भाग्यपूर्ण', CJI बोले- यह प्रवृत्ति ठीक नहीं

Fri, 19 Dec 2025 06:19 AM IST
हिमांशु चंदेल अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Fri, 19 Dec 2025 06:19 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्ति से ठीक पहले जजों द्वारा बड़ी संख्या में आदेश पारित करने की प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई है। मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी के निलंबन मामले में कोर्ट ने न्यायिक त्रुटि और कदाचार में फर्क स्पष्ट किया। वहीं, लावारिस कुत्तों के प्रबंधन पर दिल्ली नगर निगम के नए नियमों में तत्काल हस्तक्षेप से भी इन्कार किया गया।

विज्ञापन
Supreme Court  CJI suryakant says Delivering flurry of judgments before retirement is unfortunate
सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्ति से ठीक पहले बहुत सारे आदेश पारित करने की जजों की बढ़ती प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई। शीर्ष अदालत ने इसकी तुलना मैच के अंतिम ओवरों में बल्लेबाज के छक्के मारने से की और कहा कि जजों ही यह प्रवृत्ति ठीक नहीं।
विज्ञापन

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ मध्य प्रदेश के एक प्रधान और जिला न्यायाधीश की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। 
विज्ञापन


इसमें उन्होंने कुछ संदिग्ध न्यायिक आदेशों के संबंध में उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति से ठीक 10 दिन पहले उन्हें निलंबित करने के हाईकोर्ट के सामूहिक फैसले को चुनौती दी थी। पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्ति से ठीक पहले छक्के लगाने शुरू कर दिए। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति है। मैं इस पर विस्तार से चर्चा नहीं करना चाहता। सीजेआई ने कहा, सेवानिवृत्ति से ठीक पहले जजों की बहुत सारे आदेश पारित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी का मामला
मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी 30 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले थे और उन्हें उनके पारित दो न्यायिक आदेशों के कारण 19 नवंबर को निलंबित कर दिया गया। उनकी ओर से पेश हुए वकील विपिन सांघी ने बताया कि उनका सेवा रिकॉर्ड बेदाग है और उन्हें वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों में लगातार उच्च अंक प्राप्त हुए हैं।

सीजेआई ने न्यायिक त्रुटि व कदाचार के बीच अंतर किया स्पष्ट
सीजेआई ने न्यायिक त्रुटि और कदाचार के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा, उन्हें इसके लिए निलंबित नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर आदेश स्पष्ट रूप से बेईमानी भरे हों तो क्या होगा? सीजेआई ने यह भी उल्लेख किया कि 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को राज्य में न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 61 वर्ष करने का निर्देश दिया था। इसके परिणामस्वरूप, न्यायिक अधिकारी अब 30 नवंबर, 2026 को सेवानिवृत्त होंगे। सीजेआई ने यह भी कहा कि विवादित आदेश पारित करते समय अधिकारी को सेवानिवृत्ति की आयु में विस्तार की जानकारी नहीं थी।

ये भी पढ़ें- Insurance Regulation: दावा निपटान में लापरवाही पड़ी महंगी, केयर हेल्थ पर IRDAI का एक करोड़ का जुर्माना

निलंबन की वैधता पर उठाए सवाल
वकील सांघी ने निलंबन की वैधता पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि न्यायिक अधिकारियों को सिर्फ न्यायिक आदेश पारित करने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में नहीं लाया जा सकता। पीठ ने सैद्धांतिक रूप से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी के गलत आदेशों के खिलाफ सामान्यतः अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती है।

हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया- सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने पूछा कि अधिकारी ने निलंबन को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया। सांघी ने इस पर कहा कि चूंकि निलंबन सामूहिक फैसले पर आधारित था, इसलिए अधिकारी का मानना था कि सीधे सुप्रीम कोर्ट से राहत मांगना अधिक उचित होगा। इस पर पीठ ने कहा कि कई मौकों पर हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही में सामूहिक फैसलों को रद्द किया है। इसके अतिरिक्त, अदालत ने अधिकारी के सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन के माध्यम से निलंबन का विवरण मांगने पर आपत्ति जताई।

इस पर पीठ ने कहा, किसी वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी से सूचना प्राप्त करने के लिए आरटीआई का सहारा लेने की अपेक्षा नहीं की जाती है। वे एक आवेदन पेश कर सकते थे। पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इन्कार करते हुए न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट में अपील करने की छूट दी और हाईकोर्ट को चार सप्ताह के भीतर उनके आवेदन पर विचार करने और निर्णय लेने का निर्देश दिया।

ये भी पढ़ें- Supreme Court: केरल में कुलपतियों की नियुक्ति का विवाद सुलझा, सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से बनी सहमति


लावारिस कुत्तों के प्रबंधन पर हस्तक्षेप से इन्कार
वहीं, दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली नगर निगम के लावारिस कुत्तों के प्रबंधन के लिए बनाए गए नए नियमों में तत्काल हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि अगली सुनवाई में कोर्ट एक वीडियो दिखाएगा ताकि यह परखा जा सके कि इंसानियत क्या होती है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ लावारिस कुत्तों की बढ़ती समस्या को लेकर स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी। 

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दिल्ली नगर निगम के नियमों पर कड़ा विरोध जताते हुए उन्हें अमानवीय और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत बताया। सिब्बल ने कहा, निगम के बनाए नए नियमों के तहत लावारिस कुत्तों को हटाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है जबकि उनके लिए पर्याप्त शेल्टर और बुनियादी सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह कदम न सिर्फ पशु कल्याण कानूनों का उल्लंघन है बल्कि मानवीय दृष्टिकोण के भी खिलाफ है। सिब्बल ने बताया कि इस मामले की सुनवाई के लिए प्रस्तावित तीन-जजों की विशेष पीठ को रद्द कर दिया गया है, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है। उन्होंने आग्रह किया कि निगम के इन नियमों को दिसंबर में लागू किए जाने की संभावना है, इसलिए इस पर तत्काल सुनवाई की जाए।

जब शेल्टर ही नहीं तो ऐसे में कुत्तों को हटाना बेहद अमानवीय
सिब्बल ने कहा कि जब शेल्टर ही नहीं हैं तो ऐसे में कुत्तों को हटाना बेहद अमानवीय है। हालांकि पीठ इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि अदालत अगली तारीख पर इस विषय पर विचार करेगी। वहीं जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि अगली सुनवाई में अदालत वीडियो दिखाकर यह परखेगी कि मानवता की परिभाषा क्या है। इस मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी को होगी।


अन्य वीडियो-
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article