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Supreme Court: बेटिकट यात्रियों के मिलने के मामले में बस कंडक्टर की बर्खास्तगी रद्द, शीर्ष कोर्ट ने दिया आदेश

Sun, 31 Aug 2025 05:55 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sun, 31 Aug 2025 05:55 AM IST
सार

अदालत ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि जिस वाहन की जांच की गई, वह बरेली से पीलीभीत जा रहा था। इसलिए बीच में रुकना पड़ा होगा। रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्य यह है कि जो लोग बिना टिकट के पाए गए, वे अलग-अलग जगहों से बस में चढ़े थे। अदालत ने नोट किया कि 29 यात्री टिकट के साथ पाए गए थे। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता की यह दलील उचित थी और श्रम न्यायालय ने भी इसे स्वीकार कर लिया था।

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Supreme Court cancels Delhi High Court order on ticketless passengers
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें 15 यात्रियों को बिना टिकट बस में यात्रा करने देने के आरोप में बर्खास्त दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के कंडक्टर की बहाली के निर्देश को रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि जिन यात्रियों को टिकट नहीं दिए गए थे, उनके बारे में कोई सबूत न होने पर मामले में संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्तियों के प्रयोग में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी।

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जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने मोहिंदर सिंह के कानूनी प्रतिनिधि की तरफ से हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले के खिलाफ दायर अपील को इस आधार पर स्वीकार कर लिया कि वह टिकट देने की प्रक्रिया में था। अदालत ने अपीलकर्ता के वकील दुष्यंत पाराशर के बचाव को इस आधार पर विश्वसनीय माना कि वह अलग-अलग जगहों से बस में चढ़ने वाले लोगों को टिकट जारी करने की प्रक्रिया में था और यह आरोप नहीं था कि उसके पास अतिरिक्त नकदी पाई गई थी और वह यात्रियों से नकदी लेकर उन्हें बिना टिकट जाने दे रहा था।
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अदालत ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि जिस वाहन की जांच की गई, वह बरेली से पीलीभीत जा रहा था। इसलिए बीच में रुकना पड़ा होगा। रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्य यह है कि जो लोग बिना टिकट के पाए गए, वे अलग-अलग जगहों से बस में चढ़े थे। अदालत ने नोट किया कि 29 यात्री टिकट के साथ पाए गए थे। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता की यह दलील उचित थी और श्रम न्यायालय ने भी इसे स्वीकार कर लिया था। पीठ ने कहा कि जब हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने श्रम न्यायालय के आदेश की पुष्टि कर दी थी तो अंतर-न्यायालयीय अपील में खंडपीठ को निर्णय में कोई बदलाव नहीं करना चाहिए था।

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अपील लंबित रहने के दौरान ही निधन
उक्त मामले में 2 जून, 2009 को श्रम न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रबंधन की जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन हुआ। न्यायालय ने आरोप सिद्ध नहीं होने का निर्णय दिया और कर्मचारी को बहाल करने का निर्देश दिया। फिर प्रबंधन की तरफ से दायर रिट पर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इसकी पुष्टि कर दी। अंतर्न्यायालयीय अपील पर, 2016 में खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया, जिससे कर्मचारी को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। हालांकि, अपील लंबित रहने के दौरान उसकी मृत्यु हो गई और इस प्रकार उसके स्थान पर कानूनी प्रतिनिधि नियुक्त किए गए थे।

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