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सुप्रीम कोर्ट: नागरिकता अधिसूचना को लेकर केंद्र सरकार के हलफनामे पर दो हफ्ते में आईयूएमएल से मांगा जवाब
Tue, 15 Jun 2021 01:53 PM IST
Tanuja Yadav
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Tanuja Yadav
Updated Tue, 15 Jun 2021 01:53 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से 28 मई को जारी नागरिकता अधिसूचना पर जवाब मांगा है, जिसे आईयूएमएल ने चुनौती दी थी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : social media
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) को केंद्र सरकार के उस तर्क का जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया जिसमें कहा गया है कि 28 मई की अधिसूचना कानूनी प्रवासियों के लिए है और इसका नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 से कोई लेना-देना नहीं है।
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जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एमआर शाह की पीठ से आईयूएमएल की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा दायर हलफनामा उन्हें सोमवार को ही दिया गया था। ऐसे में उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए समय चाहिए। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आईयूएमएल को पक्ष रखने के लिए दो सप्ताह का समय दे दिया।
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मालूम हो कि आईयूएमएल ने 28 मई की अधिसूचना को चुनौती दी है। गृह मंत्रालय द्वारा 28 मई को जारी इस अधिसूचना में गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब और हरियाणा के 13 जिलों में रह रहे अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता का आवेदन करने का अधिकार दिया गया है।
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सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे के जरिए दायर अपने जवाब में केंद्र सरकार ने कहा था कि वह अधिसूचना वास्तव में चुनिंदा मामलों में केंद्र सरकार के अधिकारों को स्थानीय अथॉरिटी को हस्तांतरित करना है। सरकार ने कहा है कि यह अधिसूचना सभी विदेशियों को रियायत देने वाला नहीं है बल्कि कानूनी तरीके से देश में आए विदेशियों के लिए है।
केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि राजस्थान के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा वर्ष 2004 और 2009 में दिए गए अभ्यावेदन सहित कई अभ्यावेदनों पर जारी यह अधिसूचना विदेशियों को कोई छूट प्रदान नहीं करती है और यह सिर्फ उन लोगों पर लागू होती है जो वैध पासपोर्ट और वीजा के जरिए भारत में दाखिल हुए थे।
केंद्र ने यह भी कहा है कि इससे पहले वर्ष 2016, 2018, 2004, 2005 में भी जिलाधिकारियों को नागरिकता अधिनियम,1955 के तहत नागरिकता के लिए आवेदन स्वीकार करने के लिए कहा गया था।