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SC-ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट कायम, बदलाव से किया इनकार

Tue, 03 Apr 2018 08:54 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 03 Apr 2018 08:54 PM IST
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Supreme Court agrees for an open court hearing on SC-ST Act

सुप्रीम कोर्ट अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए दिए गए अपने आदेश पर फिलहाल कायम है। इसके खिलाफ मंगलवार को केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा है कि हमने अधिनियम के किसी भी प्रावधान को कमतर नहीं किया है। जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं उन्होंने हमारा आदेश ही नहीं पढ़ा है और कुछ लोगों ने अपने लाभ के लिए लोगों को बरगलाया है।

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न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने स्पष्ट किया कि हमारा आदेश अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ नहीं है। हमारा मानना है कि किसी भी व्यक्ति का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए और किसी भी बेगुनाह को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाना चाहिए। जहां तक मुआवजे का सवाल है तो एफआईआर से पहले भी दिया जा सकता है। पीठ ने केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर दो हफ्ते बाद विस्तार से सुनवाई करने का निर्णय लेते हुए पक्षकारों को लिखित दलीलें पेश करने के लिए कहा है।
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मालूम हो कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति(अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के दुरुपयोग के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने गत 20 मार्च को इसके तहत शिकायत पर स्वत: एफआईआर और गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए आरोपियों की अग्रिम जमानत का भी रास्ता साफ कर दिया था। शीर्ष अदालत का कहना था कि कानून ऐसा नहीं होना चाहिए जो जातियों के बीच नफरत फैलाए। 

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कोर्ट रूम लाइव-
 

अटॉर्नी जनरल: शोषित वर्ग के पीड़ितों को संरक्षण मिलना चाहिए। किसी कानून का दुरुपयोग या उसके दुरुपयोग होने की आशंका के आधार पर प्रावधानों को तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता। 20 मार्च के आदेश के बाद लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हो रहा है। जिसकी वजह से लोगों की जानें गई हैं। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा है।


जस्टिस आदर्श गोयल: जो लोग विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं उन्होंने हमारा आदेश तक नहीं पढ़ा है। कभी-कभार इसमें लोगों का स्वार्थ भी छुपा रहता है।
अटॉर्नी जनरल: जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने कहा था कि सुविधाओं से वंचित लोगों के अधिकारों को हमेशा ऊंची पायदान पर रखना चाहिए।

जस्टिस गोयल : हमारा सिर्फ यह मानना है कि निर्दोष लोगों को जेल न भेजा जाए। हम एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ कतई नहीं है। सीआरपीसी के हर प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 21(जीने व स्वंत्रतता का अधिकार) के साथ पढ़ा जाना चाहिए। कानून यह नहीं है कि एफआईआर दर्ज होते ही व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाए।

अटॉर्नी जनरल: ऐसे मामलों की की संख्या बेहद कम है। यह देखने की जरूरत है कि शोषित वर्ग के साथ कितनी संख्या में और किस हद तक अत्याचार होता है। जांच की जरूरत ही क्या है।

जस्टिस गोयल : हमने अपने आदेश में कहा है कि एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज होनी वाली शिकायतों पर गिरफ्तारी से पहले कुछ प्रारंभिक जांच-पड़ताल हो। हमने यह नहीं कहा कि आपराधियों को सजा न दी जाए। अगर सरकारी अधिकारियों पर गलत आरोप लगेंगे तो अधिकारी काम कैसे करेंगे। अगर अटॉर्नी जनरल के खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाए जाएंगे तो वह कैसे काम करेंगे।

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