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समान नागरिक संहिता: क्या इसे लागू करने के नाम पर मुसलमानों को डराने की हो रही कोशिश? महिलाओं को अधिकार मिलने से किसे है परेशानी?

Tue, 03 May 2022 12:03 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Tue, 03 May 2022 12:03 PM IST
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सार
कॉमन सिविल कोड लाने के लिए सबसे मजबूत तर्क यही दिया जाता है कि इससे देश के विविधता भरे समाज में एकरूपता लाने में मदद मिलेगी। इससे विवाह, बच्चों को गोद लेने की व्यवस्था, तलाक देने में एकरूपता और वैवाहिक संबंध विच्छेद के बाद महिलाओं को उचित भरण-पोषण देने के मामले में एकरूपता लाई जा सकेगी...
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supporters of Uniform Civil code always argued that it will help bring the uniformity in the diverse society of the country
समान नागरिक संहिता - फोटो : pixa

विस्तार

भाजपा शासित राज्य उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लाने के लिए इसके विविध आयामों पर विचार करने के लिए एक कमेटी का गठन कर दिया है। उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और असम के मुख्यमंत्री भी कॉमन सिविल कोड लाने की वकालत कर रहे हैं। चूंकि, समान नागरिक संहिता भाजपा के कोर एजेंडे का हिस्सा रही है, माना जा रहा है कि तीन तलाक और अनुच्छेद 370 के विवादित अंशों को खत्म कर चुकी केंद्र सरकार भी देर-सबेर इसे लाने की पहल कर सकती है।



चूंकि, यह प्रचारित किया जा रहा है कि कॉमन सिविल कोड मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखल देगा, अल्पसंख्यक समुदाय में इसे लेकर चर्चा तेज हो गई है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे गैर-इस्लामी बताते हुए इसका विरोध किया है और कहा है कि यह कानून देश के मुसलमानों के खिलाफ है।

समर्थन में तर्क

कॉमन सिविल कोड लाने के लिए सबसे मजबूत तर्क यही दिया जाता है कि इससे देश के विविधता भरे समाज में एकरूपता लाने में मदद मिलेगी। इससे विवाह, बच्चों को गोद लेने की व्यवस्था, तलाक देने में एकरूपता और वैवाहिक संबंध विच्छेद के बाद महिलाओं को उचित भरण-पोषण देने के मामले में एकरूपता लाई जा सकेगी। जो लोग इन व्यवस्थाओं का उल्लंघन करते हैं, उन्हें दंड देने में भी एकरूपता लाई जा सकेगी।

चूंकि, देश के संविधान के अनुच्छेद-44 में यह कहा गया है कि ‘राज्य समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा’, यह माना जाता है कि संविधान निर्माता चाहते थे कि देश में समान नागरिक संहिता लागू हो। यदि वे समान नागरिक संहिता को देश के लिए आवश्यक न समझते तो वे इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों की श्रेणी में क्यों रखते? इसके पक्ष में संविधान सभा में हुई बहस और नेहरू-अंबेडकर के विचारों को उद्धृत किया जाता है।

संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर महिला अधिकारों के बड़े पैरोकार थे। संविधान सभा की बहस में पांच विद्वानों ने देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का विरोध किया था। उनके विरोध में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अंबेडकर ने कहा था कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर वे लोग कॉमन सिविल कोड के विरोध में क्यों हैं? यहां तक कहा जाता है कि नेहरू मंत्रिमंडल से उनके इस्तीफा देने के पीछे कई कारणों में एक अहम कारण यह भी था कि सरकार देश में कॉमन सिविल कोड लागू करने से पीछे हट गई थी।


ध्यान देने की बात है कि जब सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने से अपने कदम पीछे खींच लिए, तो कई महिला नेताओं ने इसे लेकर सरकार की आलोचना भी की थी। राजकुमारी अमृतकौर ने इसके लिए सरकार पर कट्टरपंथियों के सामने झुकने का आरोप लगाया था, तो कुछ ने यहां तक कहा था कि सरकार महिलाओं को उनका अधिकार देने के प्रति ईमानदार नहीं है। तत्कालीन समय में नेहरू सरकार के लिए इसे एक बेहद गंभीर टिप्पणी मानी गई थी।  

सर्वोच्च न्यायालय और देश की कई हाईकोर्ट भी समय-समय पर सरकारों से अपील करती रही हैं कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के विवाह-तलाक के मामलों में एक-समान कानून न होने से विवादों को निपटाने में कठिनाई आती है, लिहाजा सरकार को कॉमन सिविल कोड लागू करने पर विचार करना चाहिए। कॉमन सिविल कोड की मांग करने वाले लोग सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को बहुत मजबूती से इसके पक्ष में रखते हैं।  

तथ्य यह भी है कि इस देश में अपराध, टैक्स और व्यापार के मामलों में पहले से एक देश, एक संविधान की बात लागू है। यानी अपराध करने पर किसी हिंदू को भी वही सजा मिलेगी जो एक मुसलमान को मिलेगी। नौकरी या व्यापार करने वाले लोगों को एक समान टैक्स देना पड़ता है, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। यदि इसके मानने से किसी धर्म के अधिकारों में कोई दखल नहीं पड़ता तो सिविल मामलों को भी स्वीकार करने से कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।  

विरोध में तर्क

देश में कॉमन सिविल कोड लागू करने का विरोध करने वालों का सबसे बड़ा तर्क यही है कि यह देश विविधता भरी संस्कृति को लेकर चलने वाला देश है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों में एक-दूसरे से बिल्कुल अलग और कई बार परस्पर विरोधी रीति-रिवाज प्रचलित हैं। ऐसे में सबको एक ही कानून से हांकने की गलती नहीं की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए उत्तरी भारत में मामा-भांजी में पिता-पुत्री जैसा संबंध माना जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में मामा और भांजी के बीच विवाह सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य होते हैं।

इसी प्रकार, गुजरात के कुछ समुदायों में एक पुरूष एक विवाहिता पत्नी के रहते दूसरा विवाह कर सकता है, तो उत्तर-पूर्व के कुछ समुदायों में एक महिला एक से अधिक पुरूषों से विवाह कर सकती है। आदिवासी समाजों में भी बहुविवाह स्वीकार्य है। ऐसे में यदि सभी समाजों के लिए एक जैसा कानून लाया जाता है तो इससे अलग-अलग समाजों में तलाक देने, भरण-पोषण भत्ता देने के संदर्भ में अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है।

तीसरे विधि आयोग ने देश की विविधता को देखते हुए कॉमन सिविल कोड लागू करने में अनेक कठिनाइयां सामने आने की आशंका जाहिर की थी। आयोग ने कॉमन सिविल कोड को लागू करने की आवश्यकता न होने की बात भी कही थी, लिहाजा कॉमन सिविल कोड के विरोधी तीसरे विधि आयोग की बात को रखते हुए देश में इसे लागू करने का विरोध करते हैं।

ड्राफ्ट अब तक सामने नहीं

अभी तक कॉमन सिविल कोड का ड्राफ्ट सामने नहीं आया है। उत्तराखंड सरकार भी अभी यह समझने की कोशिश ही कर रही है कि इस कानून में किन बिंदुओं को किस सीमा तक शामिल किया जाना चाहिए। ऐसे में अभी से यह कहना गलत है कि कॉमन सिविल कोड मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों में दखल देता है। कई मुस्लिम विद्वानों का भी मत है कि पहले इस बिल का प्रारूप सामने आने दिया जाए तब इसके बारे में कुछ कहना ज्यादा उचित होगा।

मुसलमानों के खिलाफ नहीं है कानून, महिलाओं को आजादी मिलेगी

देश में कॉमन सिविल कोड लागू कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में पीआईएल दाखिल करने वाले वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि कुछ मुस्लिम नेता कॉमन सिविल कोड के नाम पर मुसलमानों को डराने की कोशिश कर रहे हैं। वे उनके बीच समान नागरिक संहिता के बारे में भ्रम फैला रहे हैं, जबकि समान नागरिक संहिता में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे गैर-इस्लामी या मुसलमानों के खिलाफ कहा जा सके। लेकिन यह सच्चाई है कि कॉमन सिविल कोड महिलाओं को ज्यादा आजादी और अधिकार देने की बात करता है, लिहाजा पुरूषवादी मानसिकता के कुछ नेता इसका विरोध कर रहे हैं।    

तीन तलाक कानून की तरह होगा स्वागत

इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि कॉमन सिविल कोड को लेकर कुछ मुसलमान नेता ठीक उसी प्रकार भ्रम फैला रहे हैं जैसा उन्होंने तीन तलाक के मामले में फैलाया था। लेकिन उनका विश्वास है कि जब कॉमन सिविल कोड का कानून लागू होगा तो उसका स्वागत भी ठीक उसी तरह किया जाएगा जिस तरह तीन तलाक के कानून के लागू होने के बाद किया गया था।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कॉमन सिविल कोड किसी मुसलमान या हिंदू या किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने, पूजा-पाठ करने से नहीं रोकता है। यह इन मूल धार्मिक विषयों से संबंधित ही नहीं है। यह केवल महिला अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए, तलाक होने की स्थिति में महिलाओं-बच्चों को भरण पोषण का अधिकार देने से संबंधित है। यह किसी भी तरह एंटी-इस्लामिक नहीं है, लिहाजा इसका विरोध करना पूरी तरह गलत है।

डॉ. फैयाज अहमद फैजी समान नागरिक संहिता के विरोध की व्याख्या बिल्कुल अलग दृष्टिकोण से करते हैं। उन्होंने कहा कि वे मुसलमान जो पहले हिंदू थे, और बाद में मुसलमान बन गए, उन्हें पसमांदा मुसलमान कहा जाता है। ये मुसलमान अलग धर्म अपनाने के बाद भी हिंदुओं के जैसा व्यवहार करते हैं। पति-पत्नी के संबंध और उसके भरण-पोषण के मामले में भी व्यवहार में वे पूरी तरह हिंदू परिवारों के जैसा बर्ताव करते हैं। इन परिवारों में एक पत्नी के रहते दूसरी शादी करना, या बच्चों को भरण-पोषण न देने जैसी बातें न के बराबर ही पाई जा सकती हैं। इस समुदाय में समान नागरिक संहिता का कोई विरोध नहीं है।

जबकि मुस्लिमों का दूसरा वर्ग अशराफ मुसलमान कहा जाता है, वह अरबी संस्कृति का पालन करता है और उसे ही श्रेष्ठ समझता है। इन समाजों में पुरूषों को महिलाओं पर बहुत ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं, उनका आरोप है कि यह वर्ग महिलाओं पर अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता, लिहाजा वह समान नागरिक संहिता का विरोध कर रहा है।

हिंदू बिल का भी हुआ था विरोध

देश में जब हिंदू बिल लाया गया था तब इसका भी खूब पुरजोर विरोध हुआ था। यहां तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति ने यहां तक कह दिया था कि यदि बिल उनके सामने लाया जाता है तो वे उस पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। यह विरोध देखते हुए ही हिंदू बिल को पास नहीं कराया जा सका। बाद में इसे चार अलग-अलग टुकड़ों में पारित कराया गया।

समान नागरिक संहिता के समर्थक कहते हैं कि इसी तरह तीन तलाक के अवैध घोषित होने, दत्तक मामलों में भी कानून बन जाने से समान नागरिक संहिता की कई बातें आंशिक रूप से पहले से ही लागू हो चुकी हैं। बचे मामलों को भी सरकार को लागू कराने पर विचार करना चाहिए। केवल विरोध को ध्यान में रखा जाता तो न कभी दहेज विरोधी कानून पास हो पाता और न कभी सती प्रथा विरोधी कानून पास हो पाता, इसलिए सरकार को व्यापक जनसमुदाय के हित को ध्यान में रखते हुए समान नागरिक संहिता कानून लाने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।

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