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बीजेपी के सबसे कठिन मोर्चे पर सुनील बंसलः क्या भेद पाएंगे ममता बनर्जी, केसीआर और नवीन पटनायक का किला
सार
सुनील बंसल के लिए तेलंगाना में पार्टी को जीत दिलाना बड़ी चुनौती का काम होगा। राज्य में केसीआर एक तबके के बीच तेलंगाना के विकास पुरूष के तौर पर देखे जाते हैं। ओवैसी से तालमेल और गैर-भाजपाई नेता के तौर पर वे राज्य के मुसलमान मतदाताओं की पहली पसंद बनकर उभरे हैं।
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उत्तर प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
बीजेपी ने उत्तर प्रदेश के महामंत्री (संगठन) रहे सुनील बंसल को अपने सबसे कठिन मोर्चे पर लगाया है। उन्हें पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तेलंगाना में केसीआर और ओडिशा में नवीन पटनायक का किला भेदने की अहम जिम्मेदारी दी गई है। ये तीनों छत्रप अपने-अपने गृह राज्यों में अजेय माने जाते हैं। ऐसे में पार्टी को इन राज्यों में सफलता दिलाना बंसल के लिए आसान नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में 2014, 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 और 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी को ऐतिहासिक सफलता दिला चुके सुनील बंसल इस कठिन मोर्चे पर क्या करिश्मा कर पाते हैं, इस पर सबकी नजर रहेगी।
भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल की पहेली सुलझाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। पार्टी ने अपने कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय को इस मोर्चे पर लंबे समय से लगा रखा था। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी पूरी ताकत का उपयोग किया और बंगाल की सत्ता तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन वह ममता बनर्जी को तीसरी बार बंगाल का मुख्यमंत्री बनने से रोकने में नाकाम रही। 200 सीटों का दावा करने वाली पार्टी को केवल 77 सीटों से संतोष करना पड़ा। पार्टी के लिए ज्यादा शर्मिंदगी का विषय रहा कि ममता बनर्जी को पहले के चुनाव की तुलना में ज्यादा मत प्रतिशत और सीटें हासिल हुईं। हालांकि, बीजेपी भी कांग्रेस और वामदलों को हटाकर राज्य का मुख्य विपक्षी दल बनने में सफल रही।
ममता बनर्जी ने चुनाव में स्वयं को बंगाली अस्मिता और महिला सशक्तीकरण के प्रतीक के रूप में पेश किया था, जिसका मुकाबला भाजपा नहीं कर पाई। बदले माहौल में उनके करीबी नेता पार्थो चटर्जी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। साल के अंत तक बंगाल में एनआरसी लाने का मुद्दा भी गरम हो सकता है जिससे बंगाल के समाज में विभाजन और ज्यादा गंभीर हो सकता है जिसका फायदा भाजपा को मिलना तय है। चूंकि, राज्य में चुनाव दूर हैं, लिहाजा इस मोर्चे पर सुनील बंसल को अपना कार्ड खेलने के लिए पर्याप्त समय मिल सकता है।
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तेलंगाना विधानसभा चुनाव सामने
सुनील बंसल के लिए तेलंगाना में पार्टी को जीत दिलाना बड़ी चुनौती का काम होगा। राज्य में केसीआर एक तबके के बीच तेलंगाना के विकास पुरूष के तौर पर देखे जाते हैं। ओवैसी से तालमेल और गैर-भाजपाई नेता के तौर पर वे राज्य के मुसलमान मतदाताओं की पहली पसंद बनकर उभरे हैं। हालांकि, केसीआर पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के गंभीर आरोप लगे हैं जिन्हें उछालकर भाजपा अपनी राह आसान कर सकती है। मुस्लिम धर्मगुरूओं को राज्य में दी जा रही विशेष प्राथमिकता का मुद्दा भी भाजपा जोरशोर से उठाएगी और इससे राज्य में लाभ मिल सकता है। हालांकि, इसके बाद भी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में केसीआर के किले को भेदना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।
नवीन पटनायक की छवि से लड़ना सबसे अहम
सुनील बंसल को मिली जिम्मेदारियों में ओडिशा एक मायने में सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण कहा जा सकता है। बेहद शालीन और ईमानदार छवि के नेता नवीन पटनायक पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप भी नहीं है। जनता से उनके व्यक्तिगत स्तर तक के रिश्ते उनकी बड़ी राजनीतिक पूंजी रही है। केंद्र के उनके साथ मधुर रिश्तों के कारण भी भाजपा उन पर बहुत ज्यादा आक्रामक नहीं रही है। प्रधानमंत्री अपनी चुनावी रैलियों में ओडिशा को परिवारवाद से मुक्त करने से ज्यादा गंभीर आरोप नहीं लगा पाए हैं। वे चुनावी रैलियों में भी ओडिशा को बीजू बाबू के सपनों का राज्य बनाने की बात कहते रहे हैं।
जाहिर है कि जब जनता के सामने बीजू बाबू की राजनीति का असली दावेदार सामने है तो ऐसे में वह भाजपा को अवसर नहीं देगी। हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव में मोदी जनता की पहली पसंद बन सकते हैं। ऐसे में माना जाता है कि सुनील बंसल को ओडिशा में नवीन पटनायक के बाद के युग के लिए भाजपा की मजबूत नींव रखने की जिम्मेदारी दी गई है जिसके लिए वे मजबूती से काम कर सकते हैं।
योगी की जीत, लेकिन लोस चुनाव को लेकर बढ़ी जिम्मेदारी
सुनील बंसल की उत्तर प्रदेश से विदाई को योगी आदित्यनाथ की जीत के तौर पर भी देखा जा रहा है। गृहमंत्री अमित शाह के बेहद भरोसेमंद सिपाहसालारों में से एक सुनील बंसल से कथित तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से रिश्ते तल्ख थे। चर्चा यहां तक थी कि योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल के गठन में भी वे कुछ दखलदाजी करना चाहते थे जिसे योगी ने कभी स्वीकार नहीं किया जिससे दोनों वरिष्ठ नेताओं के बीच रिश्ते नाजुक हो गए थे। एके शर्मा को योगी मंत्रिमंडल में शामिल करने और केशव प्रसाद मौर्या से सीएम के बीच की खटास को दूर करने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाने की कोशिश की थी।
इस तरह 80 लोकसभा सीटों वाले यूपी से सुनील बंसल की विदाई को योगी आदित्यनाथ को यूपी में खुली छूट देने के तौर पर भी देखा जा रहा है। बदले में योगी आदित्यनाथ को लोकसभा चुनाव में यूपी से बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद लगाई गई है। हाल ही में केंद्रीय नेताओँ के प्रति उनके बयानों में भी बेहद नरमी देखी गई थी जिसे बीजेपी में सत्ता के दो केंद्रों में बेहतर समन्वय हो जाने के संकेत मिले थे। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश के नए महामंत्री (संगठन) धर्मपाल बेहद सुलझे हुए व्यक्ति माने जाते हैं। उनके योगी आदित्यनाथ से रिश्ते भी काफी अच्छे रहे हैं, लिहाजा इस समन्वय से पार्टी को बेहतर परिणाम मिलने की उम्मीद लगाई जा रही है।
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भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल की पहेली सुलझाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। पार्टी ने अपने कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय को इस मोर्चे पर लंबे समय से लगा रखा था। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी पूरी ताकत का उपयोग किया और बंगाल की सत्ता तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन वह ममता बनर्जी को तीसरी बार बंगाल का मुख्यमंत्री बनने से रोकने में नाकाम रही। 200 सीटों का दावा करने वाली पार्टी को केवल 77 सीटों से संतोष करना पड़ा। पार्टी के लिए ज्यादा शर्मिंदगी का विषय रहा कि ममता बनर्जी को पहले के चुनाव की तुलना में ज्यादा मत प्रतिशत और सीटें हासिल हुईं। हालांकि, बीजेपी भी कांग्रेस और वामदलों को हटाकर राज्य का मुख्य विपक्षी दल बनने में सफल रही।
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ममता बनर्जी ने चुनाव में स्वयं को बंगाली अस्मिता और महिला सशक्तीकरण के प्रतीक के रूप में पेश किया था, जिसका मुकाबला भाजपा नहीं कर पाई। बदले माहौल में उनके करीबी नेता पार्थो चटर्जी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। साल के अंत तक बंगाल में एनआरसी लाने का मुद्दा भी गरम हो सकता है जिससे बंगाल के समाज में विभाजन और ज्यादा गंभीर हो सकता है जिसका फायदा भाजपा को मिलना तय है। चूंकि, राज्य में चुनाव दूर हैं, लिहाजा इस मोर्चे पर सुनील बंसल को अपना कार्ड खेलने के लिए पर्याप्त समय मिल सकता है।
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तेलंगाना विधानसभा चुनाव सामने
सुनील बंसल के लिए तेलंगाना में पार्टी को जीत दिलाना बड़ी चुनौती का काम होगा। राज्य में केसीआर एक तबके के बीच तेलंगाना के विकास पुरूष के तौर पर देखे जाते हैं। ओवैसी से तालमेल और गैर-भाजपाई नेता के तौर पर वे राज्य के मुसलमान मतदाताओं की पहली पसंद बनकर उभरे हैं। हालांकि, केसीआर पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के गंभीर आरोप लगे हैं जिन्हें उछालकर भाजपा अपनी राह आसान कर सकती है। मुस्लिम धर्मगुरूओं को राज्य में दी जा रही विशेष प्राथमिकता का मुद्दा भी भाजपा जोरशोर से उठाएगी और इससे राज्य में लाभ मिल सकता है। हालांकि, इसके बाद भी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में केसीआर के किले को भेदना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।
नवीन पटनायक की छवि से लड़ना सबसे अहम
सुनील बंसल को मिली जिम्मेदारियों में ओडिशा एक मायने में सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण कहा जा सकता है। बेहद शालीन और ईमानदार छवि के नेता नवीन पटनायक पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप भी नहीं है। जनता से उनके व्यक्तिगत स्तर तक के रिश्ते उनकी बड़ी राजनीतिक पूंजी रही है। केंद्र के उनके साथ मधुर रिश्तों के कारण भी भाजपा उन पर बहुत ज्यादा आक्रामक नहीं रही है। प्रधानमंत्री अपनी चुनावी रैलियों में ओडिशा को परिवारवाद से मुक्त करने से ज्यादा गंभीर आरोप नहीं लगा पाए हैं। वे चुनावी रैलियों में भी ओडिशा को बीजू बाबू के सपनों का राज्य बनाने की बात कहते रहे हैं।
जाहिर है कि जब जनता के सामने बीजू बाबू की राजनीति का असली दावेदार सामने है तो ऐसे में वह भाजपा को अवसर नहीं देगी। हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव में मोदी जनता की पहली पसंद बन सकते हैं। ऐसे में माना जाता है कि सुनील बंसल को ओडिशा में नवीन पटनायक के बाद के युग के लिए भाजपा की मजबूत नींव रखने की जिम्मेदारी दी गई है जिसके लिए वे मजबूती से काम कर सकते हैं।
योगी की जीत, लेकिन लोस चुनाव को लेकर बढ़ी जिम्मेदारी
सुनील बंसल की उत्तर प्रदेश से विदाई को योगी आदित्यनाथ की जीत के तौर पर भी देखा जा रहा है। गृहमंत्री अमित शाह के बेहद भरोसेमंद सिपाहसालारों में से एक सुनील बंसल से कथित तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से रिश्ते तल्ख थे। चर्चा यहां तक थी कि योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल के गठन में भी वे कुछ दखलदाजी करना चाहते थे जिसे योगी ने कभी स्वीकार नहीं किया जिससे दोनों वरिष्ठ नेताओं के बीच रिश्ते नाजुक हो गए थे। एके शर्मा को योगी मंत्रिमंडल में शामिल करने और केशव प्रसाद मौर्या से सीएम के बीच की खटास को दूर करने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाने की कोशिश की थी।
इस तरह 80 लोकसभा सीटों वाले यूपी से सुनील बंसल की विदाई को योगी आदित्यनाथ को यूपी में खुली छूट देने के तौर पर भी देखा जा रहा है। बदले में योगी आदित्यनाथ को लोकसभा चुनाव में यूपी से बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद लगाई गई है। हाल ही में केंद्रीय नेताओँ के प्रति उनके बयानों में भी बेहद नरमी देखी गई थी जिसे बीजेपी में सत्ता के दो केंद्रों में बेहतर समन्वय हो जाने के संकेत मिले थे। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश के नए महामंत्री (संगठन) धर्मपाल बेहद सुलझे हुए व्यक्ति माने जाते हैं। उनके योगी आदित्यनाथ से रिश्ते भी काफी अच्छे रहे हैं, लिहाजा इस समन्वय से पार्टी को बेहतर परिणाम मिलने की उम्मीद लगाई जा रही है।