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शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग से सवाल- क्या दोनों गुटों को चिह्न देने से रोकने पर विचार हुआ था?
Thu, 17 Sep 2026 09:23 PM IST
अमन तिवारी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Thu, 17 Sep 2026 09:23 PM IST
सार
शिवसेना के धनुष-बाण चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग दोनों गुटों से आरक्षित चिह्न वापस लेकर उन्हें अलग-अलग चुनाव चिह्न पर लड़ने को कह सकता था। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को शिवसेना विवाद की सुनवाई के दौरान एक बड़ा सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे दोनों गुटों को पार्टी का आरक्षित चुनाव चिह्न 'धनुष-बाण' देने से इनकार करने और उन्हें अलग-अलग चुनाव चिह्नों पर चुनाव लड़ाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया था?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें शिंदे गुट को असली शिवसेना मानकर 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न दिया गया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि जब पार्टी और चुनाव चिह्न के स्वामित्व का फैसला हो रहा था, उस समय शिंदे गुट के विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भले ही अब उस फैसले का तात्कालिक असर न बचा हो, लेकिन अदालत यह तय करने के लिए आदेश दे सकती है कि आयोग का फैसला सही था या नहीं। इससे पहले बुधवार को भी जस्टिस बागची ने सवाल किया था कि जब विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटक रही हो, तो क्या विधायी बहुमत को पार्टी के स्वामित्व का सुरक्षित पैमाना माना जा सकता है?
अदालत ने साफ किया कि न्यायिक समीक्षा के तहत कोर्ट चुनाव आयोग के विवेक की जगह अपना फैसला नहीं थोप सकता, लेकिन यह जरूर देख सकता है कि क्या सभी जरूरी विकल्पों और पहलुओं पर ठीक से विचार किया गया था। शिंदे गुट के वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने दलील दी कि चुनाव आयोग का विधायी बहुमत वाला पैमाना पूरी तरह वैध है। उन्होंने 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग' मामले का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ अयोग्यता याचिका लंबित होने से विधायी ताकत को दरकिनार नहीं किया जा सकता, वरना इससे दुर्भावनापूर्ण याचिकाओं की बाढ़ आ जाएगी। उन्होंने 'सुभाष देसाई' मामले का जिक्र करते हुए कहा कि आयोग का फैसला विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर निर्भर नहीं होता क्योंकि दोनों संस्थाओं के काम और नियम अलग हैं।
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ये भी पढ़ें: तमिलनाडु: नवोदय विद्यालय पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से कहा- अपना नजरिया बदलें; हिंदी भाषा पर क्या है विवाद?
कौल ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि 2019 के विधानसभा चुनाव में जीते 55 शिवसेना विधायकों के वोटों में से शिंदे का समर्थन करने वाले 40 विधायकों को 76 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि ठाकरे समर्थक 15 विधायकों को केवल 23.5 प्रतिशत वोट मिले। कुल पार्टी वोटों में भी शिंदे समर्थक विधायकों का हिस्सा 40 प्रतिशत और ठाकरे गुट का 12 प्रतिशत था। वहीं 18 लोकसभा सांसदों में से शिंदे समर्थक 13 सांसदों को 73 प्रतिशत और ठाकरे समर्थक सांसदों को 27 प्रतिशत वोट मिले थे। उन्होंने कहा कि अयोग्यता याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं और 2019 की विधानसभा भंग होकर 2024 में नई विधानसभा बन चुकी है, इसलिए यह मामला निष्प्रभावी हो चुका है। इस मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। उद्धव ठाकरे गुट ने शिंदे गुट की ओर से नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल को अवैध बताते हुए इसे वापस दिलाने या शिंदे गुट पर रोक लगाने की मांग की है।
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चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें शिंदे गुट को असली शिवसेना मानकर 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न दिया गया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि जब पार्टी और चुनाव चिह्न के स्वामित्व का फैसला हो रहा था, उस समय शिंदे गुट के विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भले ही अब उस फैसले का तात्कालिक असर न बचा हो, लेकिन अदालत यह तय करने के लिए आदेश दे सकती है कि आयोग का फैसला सही था या नहीं। इससे पहले बुधवार को भी जस्टिस बागची ने सवाल किया था कि जब विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटक रही हो, तो क्या विधायी बहुमत को पार्टी के स्वामित्व का सुरक्षित पैमाना माना जा सकता है?
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अदालत ने साफ किया कि न्यायिक समीक्षा के तहत कोर्ट चुनाव आयोग के विवेक की जगह अपना फैसला नहीं थोप सकता, लेकिन यह जरूर देख सकता है कि क्या सभी जरूरी विकल्पों और पहलुओं पर ठीक से विचार किया गया था। शिंदे गुट के वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने दलील दी कि चुनाव आयोग का विधायी बहुमत वाला पैमाना पूरी तरह वैध है। उन्होंने 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग' मामले का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ अयोग्यता याचिका लंबित होने से विधायी ताकत को दरकिनार नहीं किया जा सकता, वरना इससे दुर्भावनापूर्ण याचिकाओं की बाढ़ आ जाएगी। उन्होंने 'सुभाष देसाई' मामले का जिक्र करते हुए कहा कि आयोग का फैसला विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर निर्भर नहीं होता क्योंकि दोनों संस्थाओं के काम और नियम अलग हैं।
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कौल ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि 2019 के विधानसभा चुनाव में जीते 55 शिवसेना विधायकों के वोटों में से शिंदे का समर्थन करने वाले 40 विधायकों को 76 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि ठाकरे समर्थक 15 विधायकों को केवल 23.5 प्रतिशत वोट मिले। कुल पार्टी वोटों में भी शिंदे समर्थक विधायकों का हिस्सा 40 प्रतिशत और ठाकरे गुट का 12 प्रतिशत था। वहीं 18 लोकसभा सांसदों में से शिंदे समर्थक 13 सांसदों को 73 प्रतिशत और ठाकरे समर्थक सांसदों को 27 प्रतिशत वोट मिले थे। उन्होंने कहा कि अयोग्यता याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं और 2019 की विधानसभा भंग होकर 2024 में नई विधानसभा बन चुकी है, इसलिए यह मामला निष्प्रभावी हो चुका है। इस मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। उद्धव ठाकरे गुट ने शिंदे गुट की ओर से नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल को अवैध बताते हुए इसे वापस दिलाने या शिंदे गुट पर रोक लगाने की मांग की है।