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करियर बनाने कोटा जाने वाले छात्र क्यों कर रहे हैं आत्महत्या?

Fri, 20 May 2016 07:25 PM IST
शिल्पा कन्नन /सवादाता बीबीसी
शिल्पा कन्नन /सवादाता बीबीसी Updated Fri, 20 May 2016 07:25 PM IST
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suicide cashes increasing in engineering students
- फोटो : BBC

एक 17 साल की लड़की ने अपने सुसाइड नोट में कोटा के कोचिंग संस्थानों के बारे में लिखा था, 'बहुत ही घिनौना. सच लिखा  'बीते 28 अप्रैल को कृति ने अपनी रिहाइशी इमारत की पांचवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी थी। पांच पन्नों के अपने सुसाइड नोट में उसने भारत सरकार से इन कोचिंग संस्थाओं को, जितनी जल्दी हो बंद करने की गुहार लगाई थी। कोटा में जवाहर नगर के एसएचओ हरीश भारती ने सुसाइड नोट के बारे में बताया, "असल में लड़की ने शुरुआती प्रवेश परीक्षा को पास कर लिया था और इंजीनियरिंग में दाख़िले के लिए पात्र थी, लेकिन उसने ऐसा क़दम इसलिए उठाया क्योंकि वो इंजीनियर नहीं बनना चाहती थी. उसने लिखा है कि इन कोचिंग क्लासेज़ की वजह से उसने असहनीय दर्द उठाए है।

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अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है, "बुरे नंबर आना इसकी वजह नहीं है....ऐसा इसलिए है, क्योंकि मैं खुद से इस हद तक घृणा करने लगी थी कि मैं खुद को ख़त्म करना चाहती हूँ।" जिस दबाव का कृति ने ज़िक्र किया है, उससे 19 साल के सौरव कुमार बखूबी वाक़िफ़ हैं.बार बार आने वाले आत्महत्या के ख़यालों से वो रोज़ ही जूझते हैं। कभी वो अपने क्लास के टॉपर हुआ करते थे, लेकिन अब भारी तनाव के शिकार हो गए हैं और खुद को समाज की मुख्य धारा से दरकिनार किया हुआ महसूस करने लगे हैं। 
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शीर्ष कॉलेज में दाख़िले का मौक़ा तलाशने की उम्मीद से, वो देश भर से चलकर हर साल कई छात्र,छात्राए राजस्थान के कोटा में पढ़ाई करने चले आते हैं। कई धन्टों की कड़ी मेहनत,मशक्कत के बाद भी कुछ दुर्भाग्यशाली छात्र अपने अभिभावकों की भारी भरकम उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाते। खुदकुशी करने वाले छात्रों मे से एक छात्र सौरव का कहना हैं, "मेरे मां बाप को मुझसे काफ़ी उम्मीदें थीं. उन्होंने सोचा कि यहां मेरी पढ़ाई बहुत अच्छी चल रही है और मैं अव्वल आ रहा हूँ. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका, अपने क्लासमेट को देखकर मैं हताश हो गया. मुझे रात दिन चिंता सताने लगी, मैंने सोचा कि अब मर जाना ही एकमात्र चारा बचा है।
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"सौरव भाग्यशाली रहे कि उन्हें बचा लिया गया। और उनका सही समय पर इलाज कराया गया, लेकिन ऐसा सोचने वाले बाक़ी छात्र इतने भाग्यशाली नहीं रहे। पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक़, कोटा में पिछले पांच साल में 73 छात्रों ने आत्महत्या की है, जिनमें इस साल के पांच छात्र भी शामिल हैं. आत्महत्या करने की यह दर, राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है.राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक़, 2014 में राष्ट्रीय औसत एक लाख़ आबादी पर 10.6 आत्महत्याएं थीं.आत्महत्या के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए, अब कई उपाय किये जा रहे हैं. इनमें से एक है 'होप' नामक हेल्पलाइन का शुरू किया जाना। इसमें हताश लोगों से बात करने के लिए सलाहकारों की एक टीम, सातों दिन 24 घंटे काम करती है. इस पर अधिकांश फ़ोन कॉल्स रात में आती हैं, क्योंकि उस समय स्टूडेंट्स तनाव की वजह से सो नहीं पाते हैं और घबराहट में फ़ोन करते हैं।

कोई स्टूडेंट नदी के किनारे खड़े होकर कूदने की सोच रहा होता है

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हेल्पलाइन के प्रभारी मनोचिकित्सक, डॉ एमएल अग्रवाल कहते हैं कि थकाउ दिनचर्या और लगातार होने वाले टेस्ट की वजह से स्टूडेंट मदद की गुहार लगाने को मजबूर होते हैं. उन्होंने बताया, "हमें अक्सर ऐसी पैनिक कॉल्स आती हैं, जब कोई स्टूडेंट नदी के किनारे खड़े होकर कूदने की सोच रहा होता है या कोई अपने कमरे में आत्महत्या के बारे में सोच रहा होता है. ऐसे में एक टीम उसे बातों में लगाए रहती है और दूसरी टीम उसे बचाने के लिए दौड़ पड़ती है. हम उसे वापस लाते हैं और उसके अभिभावकों और संस्थान को फ़ोन करते हैं।" उनके मनोचिकित्सा वार्ड में बहुत से ऐसे स्टूडेंट हैं जिनका इलाज चल रहा है।

इनमें से एक 17 साल की लड़की है, जो पड़ोस के गांव 'भूनास' की रहने वाली हैं. जैसे ही उनकी परीक्षा क़रीब आई, वो हताश हो गईं और उन्हें भूख भी नहीं लगने लगी. उनके मां बाप को उनके नोटबुक में एक सुसाइड नोट मिला, फिर उन्हें मनोचिकित्सा वार्ड में भर्ती कराया गया.चिकित्सकों ने उन्हें गहरी निराशा में पाया और निगरानी में रखा.उनके दादा वार्ड के बाहर इंतज़ार करते रहते हैं और कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि डॉक्टर उसे जल्दी ठीक कर देंगे ताकि वो समय पर अपनी परीक्षाएं दे सके। डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि अक्सर अभिभावकों को भी परामर्श देने की ज़रूरत होती है, उन्हें ये बताने की ज़रूरत होती है कि वो इतनी उम्मीद न पालें और अपने बच्चों से थोड़े व्यावहारिक उम्मीदें लगाएं। डॉ. अग्रवाल के अनुसार, अभिभावकों को समझाना उनके काम का बड़ा हिस्सा है.लेकिन अपने बच्चे के लिए बड़े सपने संजोने वाले अभिभावकों में यह शहर बड़ी उम्मीदें जगाता है।

पूरे शहर में की ऊंची उंची इमारतें, कोचिंग सस्थानों के बिल बोर्डों से ढंकी हैं, जिनमें उन स्टूडेंट्स की खुशी मनाती तस्वीरें होती हैं, जिन्होंने प्रवेश परीक्षाओं में सफलता पाई है। यहां आने वाले अधिकांश स्टूडेंट का सपना, इन बिल बोर्डों में जगह बनाने की होती है।यहां तक कि स्थानीय मॉल में भी कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन लगे होते हैं, अधिकांश में ऐसे स्टार टीचरों की तस्वीरें होती हैं, जो स्थानीय स्तर पर सेलिब्रिटीज़ की तरह होते हैं.इन कोचिंग संस्थानों में दो साल की फ़ीस कम से कम दो लाख़ रुपये होती है, जो कि अधिकांश लोगों के लिए बहुत सस्ता सौदा नहीं है.अधिकांश अभिभावकों के लिए कोटा आना और कोचिंग पर बहुत अधिक पैसे ख़र्च करना, किसी बड़े निवेश जैसा होता है।

वो चाहते हैं कि उनके बच्चे देश के किसी एक आईआईटी में दाख़िला पा जाएं। इनमें से किसी एक से भी डिग्री मिलने का मतलब है, ग़रीबी से छुटकारा पाने का टिकट मिल जाना, लेकिन इसे हासिल करने के मौक़े बहुत ही कम हैं हर साल 14 लाख़ छात्र, प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं, लेकिन 10,000 से भी कम चुने जाते हैं। लेकिन ये आंकड़े भी उन्हें कोशिश करने से रोक नहीं पाते और यहां हर साल डेढ़ लाख़ नए छात्र आते हैं। इन प्रतिष्ठित कॉलेजों में दाख़िला पाने की प्रतियोगिता जितनी कड़ी होती जाती है, इस तरह के कोचिंग संस्थानों की मांग भी बढ़ती जाती है। सरकार का अनुमान है कि इस समय देश में यह व्यवसाय क़रीब 272 अरब रुपए का बन गया है।

एक दिन के लिए पढ़ाई के भूत से निजात पा सकते थे

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अभिभावक - फोटो : bbc

यहां के शीर्ष कोचिंग संस्थानों में से एक 'रेज़ोनेंस' है.यह कोचिंग संस्थान में एडमिशन का समय है और इनके हॉल पूरे देश से आए स्टूडेंट्स से भरे पड़े हैं। हालांकि यहां आने वाले स्टूडेंट्स का मुख्य लक्ष्य आईआईटी में प्रवेश पाना और इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करना है। लेकिन बहुत सारे स्टूडेंट्स, यहां मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने के लिए भी आते हैं।

17 साल के यशस्वी शाही अपने पिता के साथ यहां आए हुए हैं. वो बिहार के भागलपुर से हैं.जब उनसे पूछा गया कि क्या इस शहर में आत्महत्या के ताबड़तोड़ मामलों से चिंतित हैं, तो उनके पिता का जवाब 'नहीं था। उन्हें भरोसा है कि आईआईटी की तैयारी की कठिनाइयां, उनके बेटे को तनाव में नहीं डालेंगी। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और इन्फ़ोसिस के नारायन मूर्ती जैसे आईआईटी के पूर्व छात्रों से प्रेरित, यशस्वी कहते हैं कि वो एयरोनॉटिकल इंजीनियर बनना चाहते हैंरेज़ोनेंस में इस समय क़रीब 70,000 स्टूडेंट हैं। 

हालांकि यहां भी हाल ही में मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले एक स्टूडेंट ने आत्महत्या कर ली थी।इस संस्थान के प्रबंध निदेशक आरके वर्मा कहते हैं कि हर किसी पर तनाव हावी नहीं होता है। उनके मुताबिक, "कुछ बच्चों को तनाव महसूस होता है क्योंकि उनके अभिभावकों पर सामाजिक दबाव है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि समाज में रिवाज ही ऐसा है। अगर वो एक इंजीनियर, डॉक्टर या चार्टर्ड अकाउंटेंट या वकील बन जाए तो समाज में उसकी हैसियत अच्छी हो जाती है। "लेकिन स्थानीय प्रशासन ने कोचिंग संस्थानों की खिंचाई की है और उन्हें साप्ताहिक अवकाश देने और रैंकों पर जोर डालने को कम करने को कहा है। जिलाधिकारी रविकुमार सुरपुर के अनुसार, शहर में तनाव कम करना बहुत महत्वपूर्ण है.उन्होंने स्टूडेंट्स से नाम एक चिट्ठी लिख कर कहा है, "गिलहरियों और रंगबिरंगी तितलियों को देखो, चिड़ियों की चहचहाट सुनो...किसी भी चीज को मत छोड़ो."

पिछले क्रिसमस में 'फ़न डे' का आयोजन हुआ जिसमें स्टूडेंट्स पेंटिंग कर सकते थे, गाना गा सकते थे। और एक दिन के लिए पढ़ाई के भूत से निजात पा सकते थे। अब प्रशासन ने टीचर्स के लिए योगा कक्षाएं लेकर आया है। सुरपूर कहते हैं कि यह मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के कई उपायों में से एक है। हालांकि इंजीनियरिंग डिग्री हासिल करने का सौरव का सपना पूरा नहीं हुआ, लेकिन उसने अपनी पढ़ाई छोड़ी नहीं। भारत में बच्चों में बहुत छोटी उम्र से ही पढ़ाई में अव्वल आने का भारी दबाव बना दिया जाता है. लेकिन कई लोग अब इस नज़रिये पर सवाल उठाने लगे हैं कि कहीं यह कुछ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर उल्टा असर तो नहीं डालने लगा है।

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