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Covid 19: स्टडी में दावा- कोरोना की पहली लहर के दौरान बंगाल के हर पांच में से एक परिवार पर आया खाद्य संकट
Fri, 01 Jul 2022 04:27 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 01 Jul 2022 04:27 PM IST
सार
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन कुछ परिवारों ने भोजन की कमी की सूचना दी उनमें से सबसे अधिक (29 प्रतिशत) वे थे जिनकी आय का प्राथमिक स्त्रोत कृषि गतिविधियों के लिए श्रमिकों को काम पर रखना था, इसके बाद वे लोग थे जो गैर-कृषि कार्यों से जीवन यापन करते थे।
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कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।
- फोटो : PTI
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विस्तार
कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान पश्चिम बंगाल में हर पांच घरों में से कम से कम एक को खाद्य संकट का सामना करना पड़ा। यह स्थिति और खराब हो सकती थी अगर राज्य सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मुफ्त अनाज का वितरण नहीं करती। नोबेल पुरुस्कार विजेता अमर्त्य सेन के नेतृत्व वाले प्रतिचि (इंडिया) ट्रस्ट द्वारा जारी एक स्टडी रिपोर्ट में यह बातें कही गई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस स्टडी के निष्कर्षों के मुताबिक पांच में एक परिवार को खाद्य संकट का सामना करना पड़ा। संकट की अवधि 4 से 240 दिनों के बीच थी। इनमें से अधिकांश परिवारों को करीब साठ दिनों तक परेशानियों को झेलना पड़ा।
शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में ज्यादा रहा खाद्य संकट
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रामीण इलाकों में ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग शहरी इलाकों की तुलना में मामूली अधिक थी। यह काफी हद तक इस वजह से था कि शहरी क्षेत्रों में आय के स्त्रोत अधिक स्थिर थे। शहरी परिवारों की उच्च अनुपात में वेतन और पेंशन से आय होती है।
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स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के अनुसूचित जनजाति (समुदाय) के परिवारों में खाद्य संकट अन्य सामाजिक समूहों की तुलना में अधिक था।
अनुसूचित जनजाति के परिवारों को करना पड़ा सबसे ज्यादा खाद्य संकट का सामना
'स्टेइंग अलाइव कोविड 19 एंड पब्लिक सर्विसेज इन वेस्ट बंगाल' नाम से जारी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि "जब सामाजिक समूहों को ध्यान में रखा जाता है तो अनुसूचित जनजातियों में खाद्य संकट की रिपोर्टिंग किसी भी अन्य सामाजिक समूह की तुलना में अधिक थी। ऐसा प्रतीत होता है कि अविकसित कृषि, गैर कृषि गतिविधियों और प्रवास के साथ जुड़ाव ने इस संबंध में एक भूमिका निभाई है। सामान्य समय में खेती से होने वाली कथित आय से गैर कृषि गतिविधियों और मौसमी प्रवास को पूरा किया जा सकता था। लेकिन लॉकडाउन के दौरान ये दोनों रास्ते बंद हो गए।"
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन कुछ परिवारों ने भोजन की कमी की सूचना दी उनमें से सबसे अधिक (29 प्रतिशत) वे थे जिनकी आय का प्राथमिक स्त्रोत कृषि गतिविधियों के लिए श्रमिकों को काम पर रखना था, इसके बाद वे लोग थे जो गैर-कृषि कार्यों (25 प्रतिशत) से जीवन यापन करते थे।
सर्वेक्षण में दो हजार से ज्यादा परिवारों ने लिया हिस्सा
रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि स्टडी के लिए 2020 में जुलाई और दिसंबर के बीच की अवधि और 2021 के शुरुआती कुछ महीनों के दौरान प्राथमिक आंकड़ों को फोन के जरिए एकत्र किया गया था। सर्वेक्षण में 2000 से ज्यादा परिवारों ने भाग लिया था।
सर्वेक्षण के मुताबिक सभी जिलों में खाद्य संकट से पीड़ित एक समान नहीं थे। इससे सबसे अधिक प्रभावित पुरुलिया (47.5 प्रतिशत) और उसके बाद बांकुरा (35 प्रतिशत) रहे। जबकि उत्तर बंगाल के कूचबिहार जिले में ऐसे मामलों की संख्या सबसे कम दर्ज की गई।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि इस स्टडी के निष्कर्षों के मुताबिक पांच में एक परिवार को खाद्य संकट का सामना करना पड़ा। संकट की अवधि 4 से 240 दिनों के बीच थी। इनमें से अधिकांश परिवारों को करीब साठ दिनों तक परेशानियों को झेलना पड़ा।
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शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में ज्यादा रहा खाद्य संकट
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रामीण इलाकों में ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग शहरी इलाकों की तुलना में मामूली अधिक थी। यह काफी हद तक इस वजह से था कि शहरी क्षेत्रों में आय के स्त्रोत अधिक स्थिर थे। शहरी परिवारों की उच्च अनुपात में वेतन और पेंशन से आय होती है।
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स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के अनुसूचित जनजाति (समुदाय) के परिवारों में खाद्य संकट अन्य सामाजिक समूहों की तुलना में अधिक था।
अनुसूचित जनजाति के परिवारों को करना पड़ा सबसे ज्यादा खाद्य संकट का सामना
'स्टेइंग अलाइव कोविड 19 एंड पब्लिक सर्विसेज इन वेस्ट बंगाल' नाम से जारी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि "जब सामाजिक समूहों को ध्यान में रखा जाता है तो अनुसूचित जनजातियों में खाद्य संकट की रिपोर्टिंग किसी भी अन्य सामाजिक समूह की तुलना में अधिक थी। ऐसा प्रतीत होता है कि अविकसित कृषि, गैर कृषि गतिविधियों और प्रवास के साथ जुड़ाव ने इस संबंध में एक भूमिका निभाई है। सामान्य समय में खेती से होने वाली कथित आय से गैर कृषि गतिविधियों और मौसमी प्रवास को पूरा किया जा सकता था। लेकिन लॉकडाउन के दौरान ये दोनों रास्ते बंद हो गए।"
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन कुछ परिवारों ने भोजन की कमी की सूचना दी उनमें से सबसे अधिक (29 प्रतिशत) वे थे जिनकी आय का प्राथमिक स्त्रोत कृषि गतिविधियों के लिए श्रमिकों को काम पर रखना था, इसके बाद वे लोग थे जो गैर-कृषि कार्यों (25 प्रतिशत) से जीवन यापन करते थे।
सर्वेक्षण में दो हजार से ज्यादा परिवारों ने लिया हिस्सा
रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि स्टडी के लिए 2020 में जुलाई और दिसंबर के बीच की अवधि और 2021 के शुरुआती कुछ महीनों के दौरान प्राथमिक आंकड़ों को फोन के जरिए एकत्र किया गया था। सर्वेक्षण में 2000 से ज्यादा परिवारों ने भाग लिया था।
सर्वेक्षण के मुताबिक सभी जिलों में खाद्य संकट से पीड़ित एक समान नहीं थे। इससे सबसे अधिक प्रभावित पुरुलिया (47.5 प्रतिशत) और उसके बाद बांकुरा (35 प्रतिशत) रहे। जबकि उत्तर बंगाल के कूचबिहार जिले में ऐसे मामलों की संख्या सबसे कम दर्ज की गई।