सीएए पर पक्ष-विपक्ष की एकाएक बदली रणनीति, विपक्ष में सुर एक मगर मंच पर साथ आने से परहेज
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संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) पर विपक्ष और सत्तारूढ़ राजग में शामिल दलों की रणनीति एकाएक बदल गई है। स्थानीय राजनीति के कारण विरोध पर एकजुटता के बावजूद विपक्षी दल एक मंच पर साथ आने से परहेज बरत रहे हैं।
जबकि राजग (एनडीए) के कई दल सीएए का समर्थन करने के बाद सियासी नुकसान के डर से अब यू टर्न ले रहे हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन की अगुवाई करने वाली भाजपा के इतर अन्य सहयोगी या तो मौन हैं या फिर इसके विरोध में उतर आए हैं।
बीते सोमवार को सीएए, एनआरसी, एनपीआर के खिलाफ हुई विपक्ष की बैठक से सपा, बसपा, शिवसेना, आप, टीएमसी और डीएमके ने दूरी बना ली। दरअसल दिल्ली में आप और कांग्रेस, पश्चिम बंगाल में वाम दल, कांग्रेस व टीएमसी, यूपी में सपा, बसपा व कांग्रेस एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं।
जबकि महाराष्ट्र में एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) और कांग्रेस के साथ सरकार बनाने वाली शिवसेना अपनी हिंदूवादी छवि पर बट्टा लगने के डर से इन मुद्दों पर तीखे तेवर अपनाने से बच रही है। इसलिए बैठक में ज्यादातर ऐसे विपक्षी दल शामिल हुए जिनका राज्यों में एक दूसरे से प्रतिद्वंद्विता नहीं है।
मुसलमानों की नाराजगी का खतरा
दरअसल समर्थन के बाद विरोध में उतरने या चुप्पी साधने वाले सभी सहयोगियों का मुसलमान वर्ग में भी आधार है। सीएए के खिलाफ देशभर के मुसलमान बेहद नाराज हैं। सहयोगियों को लगता है कि ऐेसे में उसे सियासी घाटा उठाना होगा।
खासतौर पर बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संशोधित नागरिकता कानून पर और चर्चा की वकालत करते हुए एनआरसी को न कह दिया है। जबकि एजीपी खुल कर विरोध में है।
राजग में भी बिखराव
दूसरी ओर संसद में सबको साधने के बाद बिल पारित कराने में सफल हुई भाजपा अब इस पर सभी सहयोगियों को साधने में नाकाम रही है। संसद में बिल का समर्थन करने वाली असम गण परिषद ने सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जदयू ने इस पर और विचार की जरूरत बताई है।
वहीं, अकाली दल अब इस कानून में बदलाव चाहता है। संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले दूसरे सहयोगी लोजपा, अपना दल, आरपीआई जैसे दल चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा-कांग्रेस से समान दूरी रखने वाले वाईएसआर कांग्रेस और बीजेडी जैसे दल भी बिल पारित होने के बाद से लगातार चुप हैं।