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GB रोड का किंगपिन, जानें मामूली मिस्त्री से कैसे बना करोड़पति
अमर उजाला ब्यूरो/मुरादाबाद
Updated Wed, 31 Aug 2016 05:50 AM IST
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बाप गरीब काश्तकार था लेकिन मेहनत से दो जून की रोटी जुटाकर परिवार को पालता रहा। लेकिन जुर्म की घिनौनी दलदल में घुस चुके आफाक को गरीबी मंजूर न थी। पच्चीस साल पहले वो दिल्ली पहुंचा तो पेट पालने के लिए उसने इमारतों में बेलदारी का काम शुरू किया। थोड़े दिनों में राजमिस्त्री बन गया लेकिन उसे पैसों की चाहत ने उसे अंधा कर दिया था। लिहाजा लड़कियों को सेक्स की मंडी में बेचना शुरू कर दिया। इसके बाद देखते-देखते कच्चे मकान में रहने वाला बेलदार आलीशान कोठियों का मालिक बनता चला गया और फारच्यूनर गाड़ियों में घूमने लगा।
आफाक बाकरी के पिता इकबाल हुसैन गरीब काश्तकार थे और आसपास के खेतों में मेहनत मजदूरी करके परिवार को पेट पालते थे। उझारी के मोहल्ला सादात में आफाक के पिता इकबाल का कच्चा मिट्टी का मकान था। गांव में मजदूरी से परिवार का पेट नहीं भरा तो इकबाल दिल्ली चले गए।
उझारी के लोगों का कहना है कि करीब 25 साल पहले आफाक बाकरी मजदूरी करने दिल्ली गया था उसकी उम्र 20 साल थी। करीब पंद्रह सालों तक तो आफाक गांव की ओर पलटा ही नहीं। वह दिल्ली में मजदूरी करता था फिर राज मिस्त्री बन गया। लेकिन दस साल पहले से उसकी आर्थिक स्थिति बहुत तेजी से बदली।
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आफाक बाकरी के पिता इकबाल हुसैन गरीब काश्तकार थे और आसपास के खेतों में मेहनत मजदूरी करके परिवार को पेट पालते थे। उझारी के मोहल्ला सादात में आफाक के पिता इकबाल का कच्चा मिट्टी का मकान था। गांव में मजदूरी से परिवार का पेट नहीं भरा तो इकबाल दिल्ली चले गए।
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उझारी के लोगों का कहना है कि करीब 25 साल पहले आफाक बाकरी मजदूरी करने दिल्ली गया था उसकी उम्र 20 साल थी। करीब पंद्रह सालों तक तो आफाक गांव की ओर पलटा ही नहीं। वह दिल्ली में मजदूरी करता था फिर राज मिस्त्री बन गया। लेकिन दस साल पहले से उसकी आर्थिक स्थिति बहुत तेजी से बदली।
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10 साल में 100 बीघा जमीन खरीदी
पत्नी के साथ अफाक
उझारी के लोगों का कहना है कि आफाक का बड़ा भाई अखलाक गांव में रहता है, बड़ी बहन आले जैश की मौत हो चुकी है और छोटी बहन की शादी संभल के पास सिरसी कस्बे में हुई है। पिछले दस साल में आफाक ने गांव में करीब सौ बीघा जमीन खरीदी। कई बाग खरीद लिए और बाप के नाम पर आलीशान हवेली गांव में खड़ी कर दी। गांव की जमीन जायदाद की देखभाल आफाक का बड़ा भाई अखलाक करता है और गांव में ही रहता है। वह कार से चलता है। पूरे इलाके में उसकी गिनती मालदारों में होती है।
गांव में भाई के लिए हवेली, जमीन और बाग खरीदकर देने वाले आफाक ने दिल्ली के पॉश इलाकों में कई अलीशान कोठियां, फार्म हाऊस और होटल बना लिए। गांव वाले सोचते थे रातोंरात इतनी रकम कहां से आई। अब दिल्ली पुलिस ने आफाक और उसकी पत्नी सायरा को गिरफ्तार किया तो पता चला कि ये पूरी रकम सेक्स के गंदे धंधे से जुटाई गई थी।
गांव में भाई के लिए हवेली, जमीन और बाग खरीदकर देने वाले आफाक ने दिल्ली के पॉश इलाकों में कई अलीशान कोठियां, फार्म हाऊस और होटल बना लिए। गांव वाले सोचते थे रातोंरात इतनी रकम कहां से आई। अब दिल्ली पुलिस ने आफाक और उसकी पत्नी सायरा को गिरफ्तार किया तो पता चला कि ये पूरी रकम सेक्स के गंदे धंधे से जुटाई गई थी।
भांजी की शादी में खर्च किए लाखों
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कुछ महीने पहले आफाक बाकरी ने अपनी भांजी की शादी की थी जिसमें उसने रुपये को पानी की तरह बहाया था। उझारी के लोगों का कहना है कि जैसे - जैसे आफाक पर अकूत दौलत आती गई उसने अपने परिवार को भी आगे बढ़ाया।
अपनी बहनों की शादी उसने खुद की और भांजे - भांजियों की शादी पर भी दौलत लुटाता रहा। गरीब - मजबूर लड़कियों को सेक्स की मंडियों में बेचकर वह अपने लिए ऐश ओ आराम की जिंदगी बुनता चला गया। लेकिन उसकी करतूत ने उसे आखिरकार सलाखों के पीछे पहुंचा ही दिया।
अपनी बहनों की शादी उसने खुद की और भांजे - भांजियों की शादी पर भी दौलत लुटाता रहा। गरीब - मजबूर लड़कियों को सेक्स की मंडियों में बेचकर वह अपने लिए ऐश ओ आराम की जिंदगी बुनता चला गया। लेकिन उसकी करतूत ने उसे आखिरकार सलाखों के पीछे पहुंचा ही दिया।
पिता के नाम पर बनवाई इकबाल मंजिल
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पिछले दस सालों में जब आफाक बाकरी की आर्थिक स्थिति तेजी से सुधरी तो गांव वालों की नजरें भी गरीब इकबाल के घर की ओर पड़ने लगीं। गांव वालों ने आफाक का कामकाज पूछना शुरू किया तो इकबाल और उनकी पत्नी अमीर जहां ने कहा कि बेटा दिल्ली में प्रापर्टी का काम करता है। मुनाफा अच्छा है और अरबपति बन गया है। पिछले दस सालों से आफाक के परिवार की गिनती इलाके के मालदारों में होने लगी थी।
आफाक बाकरी के पिता इकबाल हुसैन शुरू में दिल्ली के एक दवाखाने में काम करते थे। दिल्ली से काम छोड़कर उन्होंने उझारी में दवाखाना खोला लेकिन चल नहीं सका। इसके बाद इकबाल हुसैन ने फिर से दिल्ली जाकर मजदूरी शुरू कर दी। इकबाल का पूरा जीवन मजदूरी में ही बीता।
आफाक बाकरी के पिता इकबाल हुसैन शुरू में दिल्ली के एक दवाखाने में काम करते थे। दिल्ली से काम छोड़कर उन्होंने उझारी में दवाखाना खोला लेकिन चल नहीं सका। इसके बाद इकबाल हुसैन ने फिर से दिल्ली जाकर मजदूरी शुरू कर दी। इकबाल का पूरा जीवन मजदूरी में ही बीता।
मोहल्ले वालों से नहीं रखता था वास्ता
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अलबत्ता जब आफाक ने दिल्ली के कोठों से अकूत दौलत जुटा ली तो उसने गांव पहुंचकर पिता के नाम पर इकबाल मंजिल बनाई। इस दोमंजिला घर में ऐश ओ आराम की सभी सहूलियतें हैं। पूरे घर में महंगी टाइल्स लगी हैं। यहां आफाक का बड़ा भाई अखलाक रहता है।
उझारी के लोगों का कहना है कि आफाक बाकरी और उसके परिवार का रवैय्या पैसा आते ही बदलता गया। आफाक आसपास के लोगों से रईसों की तरह सुलूक करता था। त्यौहारों पर वह आता था तो किसी पड़ोसी से कोई मतलब नहीं रखता था। ज्यादा वक्त अपने घर में रहता था और उससे मिलने वाले लोग उसके घर इकबाल मंजिल पर ही जाकर उससे मुलाकात करते थे।
उझारी के लोगों का कहना है कि आफाक बाकरी और उसके परिवार का रवैय्या पैसा आते ही बदलता गया। आफाक आसपास के लोगों से रईसों की तरह सुलूक करता था। त्यौहारों पर वह आता था तो किसी पड़ोसी से कोई मतलब नहीं रखता था। ज्यादा वक्त अपने घर में रहता था और उससे मिलने वाले लोग उसके घर इकबाल मंजिल पर ही जाकर उससे मुलाकात करते थे।