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सबरीमाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर स्टे लगाने के लिए दायर होगी याचिका

Tue, 13 Nov 2018 11:07 PM IST
अमित शर्मा
अमित शर्मा Updated Tue, 13 Nov 2018 11:07 PM IST
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Stay on pre-decision and petition for early hearing on Sabarimala controversy
सबरीमाला मंदिर

सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश दिए जाने के फैसले पर पुनर्विचार के लिए सहमत हो गया है। इस मामलों में दायर सभी 49 याचिकाओं की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच अब 22 जनवरी को खुली अदालत में करेगी।

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याचिकाकर्ताओं ने इसे अपनी जीत बताया है। लेकिन मामले में देरी से समय दिये जाने पर अपनी नाखुशी भी जाहिर की है। खबर है कि अगली सुनवाई तक पूर्व के फैसले पर रोक (स्टे) लगाने के लिए याचिकाकर्ता दोबारा कोर्ट की शरण में जा सकते हैं।
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सबरीमाला मंदिर पर सबसे पहले याचिका दायर करने वालों में से एक प्रग्न्या परांडे ने अमर उजाला से कहा कि 16 नवंबर से मंदिर के कपाट खुल रहे हैं और दर्शन शुरू हो जाएंगे। ऐसे समय में नए आदेश के मुताबिक कुछ लोग परंपरा के खिलाफ जाकर मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश कर सकते हैं। इससे तनाव भी बढ़ सकता है।
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इसके अलावा 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष दर्शन भी होंगे। उस समय भी मंदिर के आसपास अशांति का वातावरण बन सकता है। ऐसे में वे एक याचिका दायर कर कोर्ट से अपील करेंगी कि वे मामले की सुनवाई पूरी होने तक नया आदेश लागू करने पर स्थगन आदेश दें। 

कहां फंसा है कानूनी पेच

मामले की मूल याचिकाकर्ता और एक वकील के रुप में कार्यरत परांडे का कहना है कि इस मामले की सुनवाई काफी पहले से चल रही थी। केरल हाईकोर्ट तक ने इस मामले में मंदिर की भावनाओं का सम्मान किया था। लेकिन जब यह मामला सर्वोच्च अदालत में आया तब कोर्ट ने इसकी व्याख्या मूल अधिकारों से जोड़कर करना शुरु कर दिया।

परांडे ने कहा कि कोर्ट ने किसी व्यक्ति के मंदिर दर्शन करने को उसके मूल अधिकार से जोड़कर देखा है। विशेष आयु वर्ग की किसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोकने को अस्पृश्यता से जोड़कर देखा है जो कानूनन अपराध है। इसी नजरिए से मंदिर में प्रवेश को उन्होंने मूल अधिकारों का हनन माना है।

परांडे का कहना है कि दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए जिन सवालों को आधार बनाया है, वही त्रुटिपूर्ण हैं। सर्वोच्च अदालत के सामने मंदिर की परंपराओं की सही व्याख्या नहीं की गई है जिसके कारण फैसला त्रुटिपूर्ण हो गया है। उनका प्रयास है कि कोर्ट मंदिर की परंपराओं को सही ढंग से समझे और उसके हिसाब से अपना निर्णय दे।

क्या मूल अधिकारों का हो रहा हनन?

चेतना महिला अधिकार संगठन की जनरल सेक्रेटरी प्रग्न्या परांडे का कहना है कि संविधान में जिन मूल अधिकारों और अश्पृश्यता की बात की गई है, सबरीमाला मंदिर में उनमें से किसी का भी उल्लंघन नहीं हो रहा है। दरअसल, सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी स्वरुप में स्थित हैं। परंपरा है कि मंदिर का दर्शन वही कर सकता है जिसने पिछले 41 दिन से ब्रह्मचर्य का पालन कर रखा हो।

कोई पुरुष भी अगर 41 दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करता हो तो वह भी मंदिर की 18 सीढ़ियों के नीचे से ही दर्शन कर सकता है। यही नियम महिलाओं के लिए भी लागू है। चूंकि दस से पचास वर्ष की महिलाओं को 41 दिनों के बीच एक बार माहवारी होना प्राकृतिक घटना है, ऐसे में सिर्फ इस आयु वर्ग की महिलाएं मंदिर में दर्शन नहीं करती हैं। लेकिन इसे अस्पृश्यता इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि वही महिला दस साल की आयु के पहले और पचास वर्ष से अधिक की उम्र में दर्शन कर सकती है। 

परांडे ने कहा कि इस मामले को तीन तलाक जैसी स्थिति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। तीन तलाक में महिला के साथ-साथ बच्चों का पूरा जीवन प्रभावित होता है जबकि इस मामले में किसी को सामाजिक स्थिति में किसी विषमता का सामना नहीं करना पड़ता। इसलिए उनका मानना है कि कोर्ट को इसे मूल अधिकार और अस्पृश्यता से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

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