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नौकरियों में प्रमोशन के लिए आरक्षण की मांग मौलिक अधिकार नहीं, राज्य सरकार बाध्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Sun, 09 Feb 2020 10:20 PM IST
आसिम खान पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Sun, 09 Feb 2020 10:20 PM IST
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State governments not bound to provide reservations in jobs and promotions says Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकारें नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए कोटा या आरक्षण की मांग करना मौलिक अधिकार नहीं है। शुक्रवार को जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा इस अदालत द्वारा निर्धारित कानून के मद्देनजर, इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। 

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पीठ ने कहा, सरकारी सेवा में कुछ समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न दिए जाने का आंकड़ा सामने लाए बिना राज्य सरकारों को ऐसे प्रावधान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करता है कि उन्हें प्रमोशन में आरक्षण देना है या नहीं? कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार की अपील पर यह फैसला सुनाया।
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पीठ ने ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने को प्रतिबद्ध नहीं है। लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा इसको लेकर दावा करना मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं है और न ही इस संबंध में कोर्ट राज्य सरकार को कोई आदेश जारी कर सकता है।
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कोर्ट ने आगे कहा कि अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) आरक्षण लागू करने की शक्ति जरूर देता है, लेकिन यह तभी हो सकता है जब राज्य सरकार यह मानती हो कि सरकारी सेवाओं में कुछ समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा 2012 में दिया गया फैसला निष्प्रभावी हो गया, जिसमें विशेष समुदायों को कोटा प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को आदेश दिया गया था। 

उच्चतम न्यायालय के फैसले से असहमत कांग्रेस 

कांग्रेस ने रविवार को कहा कि वह नियुक्तियों और पदोन्नतियों में आरक्षण के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से असहमत है। पार्टी ने आरोप लगाया कि भाजपा शासन में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति समुदायों के अधिकार खतरे में है। कांग्रेस महासचिव मुकुल वासनिक ने यहां पार्टी मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि पार्टी इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह उठाएगी।

गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार ने राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण उपलब्ध कराए बगैर सार्वजनिक सेवाओं में सभी पदों को भरे जाने का फैसला लिया गया था। वासनिक ने कहा, ‘हम सम्मानपूर्वक कहते हैं कि हम इस निर्णय से सहमत नहीं हैं... भाजपा सरकार में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकार सुरक्षित नहीं है।’

उन्होंने कहा, कांग्रेस पार्टी का मानना है कि सरकारी पदों पर एससी/एसटी समुदाय के लोगों की नियुक्ति सरकारों के विवेकाधिकार पर नहीं होनी चाहिए, लेकिन यह संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार है। संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस प्रवक्ता उदित राज भी मौजूद थे। उदित राज ने भी इसी तरह की भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि यह विषय भाजपा नीत केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विरोधाभास को प्रदर्शित करता है क्योंकि केंद्र ने इसी तरह के मामले में पदोन्नति में आरक्षण का समर्थन किया था। भगवा पार्टी पर निशाना साधते हुए दलित नेता ने कहा, भाजपा बुनियादी तौर पर दलितों और आरक्षण के खिलाफ है।

न्यायालय के आदेश के मद्देनजर पुनर्विचार याचिका दायर करे केंद्र: खड़गे
ग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने रविवार को कहा कि आरक्षण के संबंध में उच्चतम न्यायालय के हालिया आदेश के मद्देनजर केंद्र सरकार या तो पुनर्विचार याचिका दायर करे, या फिर आरक्षण को मूल अधिकार बनाने के लिए संविधान में संशोधन करे। खड़गे ने कहा, कम से कम अब भारत सरकार को जागना चाहिए। वे या तो विधि विभाग से सलाह करके संविधान के अनुच्छेद 16 (4) (बी) और (सी) में संशोधन कर सकते हैं या फिर पुनर्विचार याचिका दायर कर मामले की सुनवाई संविधान पीठ द्वारा कराए जाने का अनुरोध कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह उठाएगी। कांग्रेस नेता का दावा है कि संविधान से जुड़े इस मामले की सुनवाई दो सदस्यीय पीठ द्वारा नहीं की जानी चाहिए थी। इसकी सुनवाई पूर्ण (संविधान) पीठ द्वारा की जानी चाहिए थी।

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