रूह कंपा देने वाली ट्रेनिंग से तैयार होते हैं तीनों सेनाओं के स्पेशल फोर्स के कमांडो
किसी भी प्राकृतिक और आकस्मिक आपदा की स्थिति में आपने कई बार स्पेशल कमांडो को बड़ी संख्या में कार्रवाई करते हुए देखा होगा। दरअसल, ये कमांडोज देश की थलसेना, वायुसेना और नौसेना की स्पेशल फोर्सेस का हिस्सा होते हैं। देश की सेना विशेष परिस्थितियों में ही इनकी मदद लेती है।
हाल ही में मध्यप्रदेश में इन कमांडोज की वीरता को देखा गया। मध्यप्रदेश के बाढ़ग्रस्त इलाकों में फंसे हुए हजारों लोगों को बाहर निकालने और राहत बचाव कैंप्स में शिफ्त करने तक इन कमांडोज की मदद ली गई। इस रेस्क्यू मिशन में वायुसेना और उनके गरुड़ कमांडोज ने अहम भूमिका निभाई।
वास्तव में देश की स्पेशल फोर्स सेना की पैरा स्पेशल फोर्स, एयर फोर्स की गरुड़ और नेवी की मार्कोस हैं। इनमें कमांडोज को सेना के जवानों में से ही चुना जाता है। आइए इन तीनों फोर्सेस के बारे में और उनकी विशेषताओं के बारे में विस्तृत से जानते हैं।
थलसेना की पैरा स्पेशल फोर्स
भारतीय थलसेना की एलीट कमांडो फोर्स पैरा रेजीमेंट की स्थापना आजादी से पहले साल 1941 में ही हो गई थी लेकिन 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बाद एक स्पेशल कमांडो यूनिट की जरूरत महसूस की गई। एक जुलाई 1966 को भारतीय सेना की पहली स्पेशल फोर्स 9 पैरा यूनिट की स्थापना की गई। इसका बेस ग्वालियर में बनाया गया।
पैरा कमांडो बनने के लिए 90 दिनों की कठिन ट्रेनिंग दी जाती है। इसकी कठिनाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ ही सैनिक इसे सफलतापूर्वक पूरा कर पाते हैं। इस प्रशिक्षण के दौरान जवानों के मानसिक, शारीरिक क्षमता और इच्छाशक्ति का जबरदस्त इम्तिहान लिया जाता है। इसके दौरान दिनभर में जवानों को पीठ पर 30 किलो सामान जिसमें हथियार व अन्य जरूरी साजो-सामान शामिल होते हैं उसे उठाकर 30 से 40 किमी की दौड़ लगाना होता है।
पहले कैडेट्स आईएमए और ओटीए से चुने जाते हैं और कमीशंड होने के बाद पांच सालों तक स्पेशल फोर्स के लिए वॉलिंटियर कर सकते हैं। प्रोबेशन पीरियड और पैराट्रूपर के बाद चयनित उम्मीदवार पैरा स्पेशल फोर्स के लिए आवेदन कर सकते हैं। कठिन ट्रेनिंग के बाद एक साल तक हॉस्टाइल जोन में सेवा देनी होती है, जिसके बाद बलिदान बैज दिया जाता है।
नौसेना के मार्कोस कमांडो
थलसेना के पैरा और नौसेना के मार्कोस कमांडो तैरने में भी माहिर होते हैं। ट्रेनिंग के दौरान इनके हाथ-पैर बांधकर पानी में फेंक दिया जाता है। इसमें इन्हें पांच मिनट बिताना होता है। मार्कोज कमांडो का फिजिकल टेस्ट इतना कठिन होता है कि 80 फीसदी आवेदक शुरू के तीन दिन में ही इसे छोड़ देते हैं।
इस फोर्स का प्रशिक्षण दुनिया के बाकी प्रशिक्षणों में सबसे ज्यादा कठिन है। इसमें चयन प्रक्रिया के चार चरण होते हैं। प्री-सिलेक्शन चयन में तीन दिन की स्क्रीनिंग होती है, दूसरे चरण में पांच हफ्तों तक ट्रेनिंग दी जाती है। तीसरे चरण यानि बेसिक एसएफ ट्रेनिंग में दस हफ्तों तक आईएनएस अभिमन्यू पर अभ्यास करने के साथ ही उम्मीदवारों को तीन हफ्ते तक पैराशूट कोर्स भी करना होता है।
इसके बाद आखिरी चरण में मिजोरम से राजस्थान तक ट्रेनिंग के बाद उम्मीदवार ग्रेजुएट होते हैं।
वायुसेना के गरुड़
भारतीय वायुसेना की स्पेशल फोर्स गरुड़ कमांडो काउंटर इमरजेंसी और बचाव कार्यों में माहिर होते हैं। इनकी ट्रेनिंग इतनी मुश्किल होती है कि अधिकतर जवान ट्रेनिंग पूरा नहीं कर पाते। इन जवानों को तीन साल तक अलग-अलग तरह की ट्रेनिंग दी जाती है।
इसके तहत योग्य पाए गए कैंडिडेट्स को 52 हफ्तों तक बेसिक ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग के अलग-अलग फेजेज में उम्मीदवार को सेना, एनएसजी और पैरामिलिट्री फोर्सेस की सहायता से स्पेशल ऑपरेशन्स के बारे में पढ़ाया और सिखाया जाता है। इसमें जंगल वॉरफेयर और स्नो सर्वाइकल आदि शामिल हैं।
अगर आप वायुसेना की ग्राउंड ड्यूटी ब्रांच से हैं तो एक ऑफिसर के तौर पर वायुसेना की गरुड़ फोर्स में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा एयरमैन का सिलेक्शन एयरमैन सिलेक्शन सेंटर्स से विज्ञापन के जरिए किया जाता है।