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विशेष अदालतें वैध: सांसदों व विधायकों पर मुकदमों के लिए गठित न्यायालयों पर न्याय मित्र की राय

Tue, 23 Nov 2021 09:47 PM IST
सुरेंद्र जोशी पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Tue, 23 Nov 2021 09:47 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सवाल उठाया गया था कि क्या सांसदों व विधायकों के खिलाफ मजिस्ट्रेट अदालतों द्वारा विचारणीय मामूली अपराधों पर एक सत्र न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष अदालत के समक्ष मुकदमा चलाया जा सकता है, जो मजिस्ट्रेट से वरिष्ठ है।

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Special courts set up by SC to try lawmakers are valid, says Amicus tells top court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मौजूदा व पूर्व सांसदों व विधायकों के खिलाफ दर्ज मुकदमों के तेजी से निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष अदालतें वैध हैं। इन अदालतों को अवैध नहीं माना जा सकता है, क्योंकि इनका गठन शीर्ष कोर्ट को प्राप्त विशेष अधिकार के तहत किया गया है। 

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यह बात प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले पर विचार के लिए नियुक्त न्याय मित्र विजय हंसारिया और स्नेहा कलिता ने अपनी रिपोर्ट में कही है। 
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इन अदालतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सवाल उठाया गया है कि क्या सांसदों व विधायकों के खिलाफ मजिस्ट्रेट अदालतों द्वारा विचारणीय मामूली अपराधों पर एक सत्र न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष अदालत के समक्ष मुकदमा चलाया जा सकता है, जो न्यायिक मजिस्ट्रेट से वरिष्ठ है।
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इससे संबंधित याचिका में आरोप लगाया गया है कि सत्र न्यायाधीशों द्वारा सांसदों व विधायकों के मामलों की सुनवाई से उन्हें एक अदालत में अपील के अधिकार से वंचित होना पड़ता है, जो कि दूसरे आरोपियों को आमतौर पर मिलता है। मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को सत्र न्यायाधीश के समक्ष चुनौती दी जा सकती है। याचिका में इस पर सवाल उठाया गया है कि चूंकि माननीयों (सांसद-विधायकों) के केस की सुनवाई सीधे सत्र न्यायाधीश स्तर के जज करते हैं, इसलिए उन्हें एक अपील का अवसर नहीं मिलता। 


न्याय मित्रों ने अपनी 34 पेज की यह 15 वीं रिपोर्ट वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा 2016 में दायर जनहित याचिका को लेकर दायर की है। उपाध्याय ने अपनी याचिका में जघन्य आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए माननीयों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने और उनके खिलाफ मामलों के त्वरित निपटारे की मांग की है। 

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