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जानलेवा गर्मी: भारत में भीषण लू से गंभीर हो रहे हालात, सिस्टम की खामी से सटीक आंकड़ों का अभाव

Mon, 09 Jun 2025 10:45 AM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: बशु जैन Updated Mon, 09 Jun 2025 10:45 AM IST
सार

इन दिनों देश में खूब गर्मी पड़ रही है। लगातार भीषण लू और गर्म हवाएं लोगों को तड़पा रही हैं। लोग दम भी तोड़ रहे हैं। मगर पुरानी रिपोर्टिंग प्रणाली से मरने वालों की सही संख्या सामने नहीं आ पा रही है। इसके चलते मौतों की संख्या कम करने और इससे बचाव के उपायों पर काम नहीं हो पा रहा है।

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Situation becoming serious due to severe heat wave in India, lack of accurate data due to flaw in the system
भारत में गर्मी। - फोटो : PTI

विस्तार

भारत में गर्मी जान ले रही है। इन दिनों भीषण लू और गर्मी से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। मगर सिस्टम की खामी से मरने वालों के सही आंकड़े सामने नहीं आ पा रहे हैं। हालात यह हैं कि देश में तीन अलग-अलग सिस्टम गर्मी से मरने वालों के अलग-अलग आंकड़े देते हैं। इसके चलते तमाम लोगों की मौत को न गर्मी से रिपोर्ट किया जाता है और न ही उनको मुआवजा मिल पाता है। 
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इन दिनों देश में खूब गर्मी पड़ रही है। लगातार भीषण लू और गर्म हवाएं लोगों को तड़पा रही हैं। लोग दम भी तोड़ रहे हैं। मगर पुरानी रिपोर्टिंग प्रणाली से मरने वालों की सही संख्या सामने नहीं आ पा रही है। इसके चलते मौतों की संख्या कम करने और इससे बचाव के उपायों पर काम नहीं हो पा रहा है। बिना सटीक आंकड़ों के न तो सरकार प्रभावी योजना बना सकती है और न ही समय पर कार्रवाई कर सकती है। 
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Situation becoming serious due to severe heat wave in India, lack of accurate data due to flaw in the system
भारत में गर्मी। - फोटो : PTI
तीन विभाग देते हैं अलग-अलग आंकड़े
देश में तीन अलग-अलग विभाग हीटस्ट्रोक या गर्मी से संबंधित मौतों की निगरानी करते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) और गृह मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) गर्मी से मरने वालों का डाटा मिलता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) भी हीटवेव से होने वाली मौतों के आंकड़े देता है, लेकिन यह आंकड़े मुख्य रूप से मीडिया कवरेज से प्राप्त होते हैं। खास बात ये है कि तीनों स्रोत से अलग-अलग आंकड़े सामने आते हैं।

एनसीडीसी ने बताईं 3812 मौत और एनसीआरबी ने बताईं 8171 मौतें
आंकड़ों में अंतर का आलम यह है कि 2015 से 2022 के बीच एनसीडीसी के प्रबंधित एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) के तहत गर्मी से संबंधित 3,812 मौतें दर्ज की गईं। जबकि इसी अवधि में एनसीआरबी ने गर्मी/लू से 8,171 मौतों का आंकड़ा दिया। जबकि आईएमडी ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में हीट वेब के कारण 3,436 मौतें दर्ज कीं।

इसलिए अलग-अलग होती है संख्या
आंकड़ों में बड़े अंतर को लेकर विशेषज्ञों ने बड़ा खुलासा किया है। दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एनसीआरबी के आंकड़े मुख्य रूप से सार्वजनिक स्थानों, घरों और अन्य स्थानों पर पुलिस द्वारा मृत पाए गए लावारिस व्यक्तियों की संख्या को दर्शाते हैं। एनसीआरबी के अनुसार 2022 में गर्मी से 730 लोगों की मृत्यु हुई, 2021 में 374 और 2020 में 530 लोगों की मृत्यु हुई। जबकि एनसीडीसी के आंकड़ों के अनुसार 2022 में गर्मी से संबंधित केवल 33 मौतें हुईं। 2021 में कोई भी नहीं और 2020 में चार मौतें हुईं। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि एनसीआरबी और एनसीडीसी के आंकड़ों की तुलना नहीं की जा सकती। 

अधिकारियों का कहना है कि एनसीडीसी उन मरीजों की मृत्यु की रिपोर्ट करता है जो अस्पताल की ओपीडी में आते हैं या भर्ती होते हैं। लेकिन यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसे पोस्टमार्टम के लिए लाया जाता है, तो वह डाटा फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग को चला जाता है। यहां से एनसीडीसी को डाटा नहीं दिया जाता है।
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भारत में गर्मी। - फोटो : PTI
सटीक रिर्पोटिंग कठिन
एक अन्य अधिकारी का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग में अभी भी डाटा मैनुअली दर्ज किया जाता है। गर्मी से संबंधित मौतों की पुष्टि करना पहले ही काफी जटिल है। ऐसे में मैनुअल डाटा प्रविष्टि से सटीक रिपोर्टिंग और भी कठिन हो जाती है। हालांकि एकीकृत स्वास्थ्य सूचना प्लेटफॉर्म (IHIP) गर्मी से संबंधित मौतों का डिजिटल दर्ज करता है, लेकिन यह भी अस्पताल के कर्मचारी मैनुअल तौर पर फार्म में भरकर देते हैं।  एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि अधिकांश अस्पतालों में स्टाफ की कमी है, जिससे उचित डाटा संग्रह और समय पर रिपोर्टिंग में बाधा आती है। डॉक्टर ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारी मुआवजा देने से बचने के लिए मौत के आंकड़ों को दबा सकते हैं।

मौत की रिपोर्टिंग प्रणाली कमजोर
स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाहकार सौम्या स्वामीनाथन कई बार देश की मृत्यु-रिपोर्टिंग प्रणालियों की कमजोर होने की बात कह चुकी हैं। उनका कहना है कि देश में मृत्यु-सूचना प्रणालियों को मजबूत बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि वे सरकार और नीति निर्माताओं को मृत्यु के कारणों को समझने के लिए सही स्रोत देते हैं। 

अलग विभाग बनाने की वकालत
एनआरडीसी इंडिया में जलवायु लचीलापन एवं स्वास्थ्य प्रमुख अभियंत तिवारी ने कहा कि गर्मी के कारण होने वाली मौतों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराना न केवल भारत में बल्कि वैश्विक चुनौती बनी हुई है। उन्होंने कहा कि गर्मी से संबंधित कई मौतें दर्ज नहीं की जाती हैं या उन्हें दिल के दौरे या अन्य कारणों के रूप में गलत वर्गीकृत किया जाता है। उन्होंने सभी कारणों से होने वाली मृत्यु के आंकड़ों की रिपोर्टिंग में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही इसके लिए अलग विभाग बनाने की वकालत की। 

वहीं ग्रीनपीस दक्षिण एशिया के उप कार्यक्रम निदेशक अविनाश चंचल ने गर्मी से संबंधित मौतों को दर्ज करने के तरीके में तत्काल सुधार की मांग की है। उन्होंने कहा कि विभागों के बीच विसंगतियां और व्यापक रूप से कम रिपोर्टिंग का मतलब है कि अत्यधिक गर्मी से होने वाली वास्तविक क्षति अक्सर छिपी रहती है। जब तक भारत अपनी डाटा प्रणाली को ठीक नहीं कर लेता, तब तक मृतकों की संख्या सिर्फ एक ही रहेगी। 

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