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गुजरात दंगा: जकिया जाफरी का आरोप- एसआईटी ने नहीं की जांच, बाद में सदस्यों को मिला उचित 'इनाम'
Thu, 11 Nov 2021 09:40 PM IST
सुरेंद्र जोशी
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Thu, 11 Nov 2021 09:40 PM IST
सार
कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में 28 फरवरी 2002 को हुई हिंसा में मारे गए थे।
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जकिया जाफरी
- फोटो : ANI
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विस्तार
वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के दौरान मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहशान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा। जकिया ने आरोप लगाया कि दंगों की जांच के लिए बनाए गए विशेष जांच दल (SIT) ने दंगों की बड़ी साजिश की जांच नहीं की। बजरंग दल के लोगों, पुलिस, नौकरशाह व अन्य को मुकदमेबाजी से बचाना सुनिश्चित किया गया। जाफरी की ओर से वकील सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि एसआईटी के सदस्यों को बाद में उचित 'इनाम' दिए गए।
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एहसान जाफरी अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में 28 फरवरी 2002 को हुई हिंसा में मारे गए थे। जाफरी की पत्नी ने मामले में एसआईटी द्वारा गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी समेत 64 लोगों को क्लीनचिट दिए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
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जकिया जाफरी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जस्टिस एएम खानविलकर की पीठ से कहा कि एसआईटी ने अपना काम नहीं किया। इसके साथ ही राज्य के संबंधित अधिकारियों ने हिंसा के दौरान निष्क्रिय रहकर भीड़ को हिंसा करने की छूट दी।
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मामले की सुनवाई कर रही पीठ में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल थे। सिब्बल ने आगे कहा कि हिंसा की बिलकुल जांच नहीं हुई। सिर्फ लोगों को बचाने का प्रयास हुआ और यह सुनिश्चित किया गया कि किसी पर मुकदमा नहीं चले। विहिप के लोगों, बजरंग दल के लोगों, अफसरों व पुलिसकर्मियों को बचाया गया। एसआईटी ने यह सब काम किया। सिब्बल ने कहा कि एसआईटी तथ्यों के विपरीत निष्कर्ष पर पहुंची थी। वास्तव में एसआईटी की जांच होनी चाहिए। मुझे व्यक्तियों से कोई सरोकार नहीं है। मैं प्रक्रिया से चिंतित हूं। मैं केवल यह कह रहा हूं कि एसआईटी ने ऐसा नहीं किया।
इन सबूतों को किया नजरअंदाज
सिब्बल ने कहा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के कॉल डेटा रिकॉर्ड सहित अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और मुसलमानों के घरों की पहचान करने वाली भीड़ आदि सबूत थे, जो सभी साजिश की ओर इशारा करते हैं। लेकिन एसआईटी ने इन सब को नजरअंदाज कर दिया। मजिस्ट्रेट और हाईकोर्ट ने भी इसे नजरअंदाज कर दिया।
इस तरह दिया गया इनाम
सिब्बल ने पीठ को बताया कि कैसे एसआईटी के अधिकारियों के साथ-साथ पुलिस को भी अच्छा इनाम दिया गया। उन्होंने कहा, 'जिन लोगों ने सहयोग किया उन्हें काफी फायदा पहुंचाया गया। एसआईटी का नेतृत्व करने वाले आरके राघवन को साइप्रस का उच्चायुक्त बनाया गया। अहमदाबाद के तत्कालीन पुलिस आयुक्त पीसी पांडे के कॉल डाटा रिकॉर्ड (सीडीआर) से पता चलता है कि वह आरोपी के साथ बातचीत कर रहे थे। उन्हें बाद में पुलिस महानिदेशक बनाया गया।
सिब्बल ने यह भी कहा कि एनएचआरसी ने शिकायत की थी कि स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। तब सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी का जो निष्कर्ष है वह तथ्यों से परे है।
दिनभर चली बहस के दौरान सिब्बल ने कहा कि जकिया जाफरी ने वर्ष 2006 में दंगों की बड़ी साजिश का आरोप लगाया था, लेकिन एसआईटी ने उसकी जांच नहीं की। मामले में आगे सुनवाई 16 नवंबर को होगी।