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पिछड़ों की अलग से जनगणना, भाजपा का बड़ा राजनीतिक दांव

Sun, 02 Sep 2018 04:33 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 02 Sep 2018 04:33 AM IST
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Separate census of backward is bjp big political stakes

आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आने को तैयार है। राजद, सपा और बसपा के दलितों-पिछड़ों के गठजोड़ को नाकाम करने के लिए भाजपा ने पिछड़ी जातियों की जनगणना कराने के केंद्र सरकार का फैसला किया है। पिछड़ी जातियों के राष्ट्रीय आयोग के गठन और प्रमोशन में आरक्षण के बाद यह पिछड़ों के लिए केंद्र सरकार का एक और बड़ा फैसला है, जिसके जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछड़ों के मसीहा बनना चाहते हैं।

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बिहार में पिछड़ी जातियों में से अति पिछड़ी जातियों को अलग आरक्षण का लाभ देने के जो सकारात्मक नतीजे दिखाई दे रहे हैं, उन्हीं के चलते केंद्र सरकार ने 2021 के चुनाव में देश भर में पिछड़ी जातियों की अलग गणना करने का फैसला लिया है।
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वहां शिक्षण संस्थाओं में एडमिशन से लेकर नौकरियों तक में अति पिछड़ी जातियों को प्रतिनिधित्व मिलने लगा है। इसी वजह से अति पिछड़े और महादलित बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जमकर समर्थन कर रहे हैं। प्रभावशाली पिछड़ी और दलित जातियों के नेता इस फैसले का जमकर विरोध कर रहे हैं तो अति पिछड़ी जातियों के नेता इसके स्वागत में जुटे हैं।
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हालांकि यही काम केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह तब करना चाहते थे जब वे 2003-04 में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे। तब उन्होंने हुकुम सिंह आयोग की सिफारिशें मानते हुए राज्य में अति पिछड़ी जातियों को अलग आरक्षण देने का फैसला किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी थी।

अब केंद्र सरकार पूरे देश में दलितों और वंचितों को उनके अधिकार सुनिश्चित करना चाहती है। इसीलिए, हर जाति की अलग गणना होगी, उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति का आंकलन किया जाएगा और उसी के अनुसार उसे आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ मिलेगा।

उदाहरण के तौर पर नीतीश कुमार ने चार प्रभावशाली पिछड़ी जातियों - यादव, कुर्मी, कोइरी और बनिया - छोड़ कर अन्य सभी पिछड़ी जातियों को अति पिछड़ी जातियों में शुमार कर अलग से सुविधाएं दे दी हैं। इसी तरह दुसाध (पासवान) और चमार के अलावा अन्य सभी अनुसूचित जातियों को अति दलित में शुमार कर दिया गया है।

बिहार में पिछड़ों की जनसंख्या 56 फीसदी है, जिनमें से अति पिछडों की संख्या 26 फीसदी है। उसी के मुताबिक उन्हें आरक्षण का लाभ मिल रहा है और राशन और मकान आवंटन आदि में अलग से कोटा दिया जा रहा है।

पिछले 70 सालों से जो प्रभावशाली जातियां दलितों और पिछड़ों के कोटे के आरक्षण का फायदा उठा रही थीं, अब उन्हें उसकी एक बड़ा हिस्सा अति पिछड़ों और अति दलित जातियों के साथ बांटना पड़ रहा है। जाहिर है कि वे इस कदम से ख़ुश नहीं हैं।

पिछड़ी जातियों की जनगणना का फायदा भाजपा को ही मिलेगा: योगेन्द्र यादव

समाजशास्त्री और स्वराज पार्टी के नेता योगेंद्र यादव कहते हैं कि पिछड़ी जातियों की जनगणना की मांग काफी समय से थी। पिछली जनगणना के बाद केंद्र सरकार ने 4500 करोड़ रुपये खर्च कर जाति आधारित गणना अलग से कराई थी, लेकिन उसके कोई स्पष्ट परिणाम नहीं निकल सके। अब यह मालूम हो सकेगा कि किस जाति में कितनी साक्षरता है, कितनी नौकरियां और कितनी गरीबी। जाहिर है इसका राजनीतिक फायदा भाजपा को ही मिलेगा।

मोदी सरकार का विभाजनकारी कदम है ओबीसी जनगणना: शरद यादव

जदयू से अलग हुए सांसद शरद यादव बाकायदा इसे मोदी सरकार का विभाजनकारी कदम करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि पिछड़ों की संख्या पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ गई है और उनके लिए महज 27 फीसदी आरक्षण नाकाफी है। उन्होंने मांग की है कि पिछड़ी जातियों की ही नहीं बल्कि सभा जातियों की गणना हो और उनकी जनसंख्या के अनुसार ही उन्हें आरक्षण दिया जाए, इस तरह एससी, एसटी और ओबीसी को मिलाकर 73 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। 

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