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राजद्रोह कानून: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अंग्रेज गांधीजी के खिलाफ इसका इस्तेमाल करते थे, क्या आजादी के 75 साल बाद भी हमें ऐसे कानून की जरूरत है?

Thu, 15 Jul 2021 12:33 PM IST
प्रशांत कुमार राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रशांत कुमार Updated Thu, 15 Jul 2021 12:33 PM IST
सार

  • कोर्ट ने केंद्र से कहा, ब्रिटिश सरकार गांधी व तिलक जैसे नेताओं पर अत्याचार करने के लिए इस कानून का इस्तेमाल करती थी
  • कहा, राजद्रोह कानून का अंधाधुंध इस्तेमाल उस बढ़ई के हाथ में आरी की तरह है, जो पेड़ की जगह पूरे जंगल को काट देता है

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sedition law is colonial law do we still need in india after 75 years of independence asks sc
राजद्रोह कानून: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को राजद्रोह (आईपीसी की धारा-124ए) के प्रावधान के दुरुपयोग पर बहुत अफसोस जताया। शीर्ष अदालत ने केंद्र से पूछा कि इस औपनिवेशिक कानून को क्यों नहीं हटाया जाना चाहिए जिसका इस्तेमाल कभी ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वतंत्रता आंदोलनों को दबाने और महात्मा गांधी व बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं पर अत्याचार करने के लिए किया जाता था। अदालत ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा-124ए (राजद्रोह) का अंधाधुंध इस्तेमाल उस बढ़ई के हाथ में आरी की तरह है, जो पेड़ की जगह पूरे जंगल को काट देता है।

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चीफ जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि इस कानून को 75 साल बाद भी जारी रखा गया है। सरकार कई अप्रचलित कानूनों को खत्म कर रही है। हम नहीं जानते कि वह इस कानून को क्यों नहीं देख रही है?
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इस कानून का जारी रहना संस्थानों के कामकाज और व्यक्तियों की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है। शीर्ष अदालत अब दो हफ्ते बाद इन मामले पर सुनवाई करेगी।

यह मसला कार्यपालिका व जांच एजेंसियों द्वारा कानून के दुरुपयोग से जुड़ा
शीर्ष अदालत मैसूर के मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एसजी वोम्बटकेरे की एक नई जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आईपीसी की धारा 124ए (देशद्रोह) की सांविधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था।
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कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जोर देकर कहा कि यह मसला कार्यपालिका और जांच एजेंसियां द्वारा कानून के दुरुपयोग और जवाबदेही की कमी से जुड़ा है।

पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि यह एक औपनिवेशिक कानून है और अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था और महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था। क्या आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत है? क्या आपको इसे कानून की किताबों में रहने देना है?

केंद्र ने कहा, इस धारा को पूरी तरह से खत्म करने की आवश्यकता नहीं
जवाब में अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने कहा कि इस धारा को पूरी तरह से खत्म करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत सख्त दिशानिर्देश निर्धारित कर सकती है ताकि प्रावधान अपने कानूनी उद्देश्य को पूरा कर सके।

उन्होंने कहा कि जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली एक अलग पीठ ने पहले ही इसी तरह की याचिका पर नोटिस जारी किया था और मामले की सुनवाई के लिए 27 जुलाई की तिथि तय की गई है।

इस मामले को भी उसके साथ जोड़ा जा सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की औपचारिक प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड में रखने के लिए समय मांगा। उन्होंने कहा कि केंद्र द्वारा इस मामले में अपना हलफनामा प्रस्तुत करने के बाद अदालत का काम कम हो सकता है।

कोर्ट ने आईटी कानून की धारा-66ए का भी दिया हवाला
चीफ जस्टिस ने केंद्र से कहा कि यदि आप इस धारा के तहत आरोपित करने का इतिहास देखते हैं तो इस कानून के दुरुपयोग की खतरनाक संख्या की तुलना एक बढ़ई से की जा सकती है जो अपनी आरी से पेड़ की जगह पूरे जंगल को काट देता है।

कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में धारा-66ए का हवाला भी दिया, जिसका उपयोग अभी भी सोशल मीडिया पोस्ट के लिए लोगों को आरोपित करने और गिरफ्तारी के लिए किया जा रहा है जबकि शीर्ष अदालत ने 2015 में इस प्रावधान को निरस्त कर दिया है।


असहमति की आवाज को दबाने के लिए इस कानून का हो सकता है इस्तेमाल
कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस किसी से बदला लेना चाहती है तो वह 124 भी लगा सकती है। हर कोई थोड़ा डरा हुआ है। ये सभी मुद्दे हैं जिन पर गौर करने की जरूरत है। अगर कोई राजनीतिक दल असहमति की आवाजों को दबाना चाहता है तो वह इस कानून का इस्तेमाल कर सकता है। 

  • तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान
  • राजद्रोह के अपराध में तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

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