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तालिबान-पाकिस्तान के 'बरादरों' की चुनौती: एम16 से लैस 'लड़ाकों' को जवाब देने के लिए 'सेना-सीएपीएफ' में होंगे बदलाव!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 27 Aug 2021 05:57 PM IST
सार

सुरक्षा मामलों के जानकार कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, कश्मीर या दूसरे हिस्सों में सीएपीएफ को ही आंतरिक सुरक्षा में लगाया जाए। सुरक्षा के इस दायित्व को 'सीआरपीएफ' अच्छे से निभा रही है। आतंकी चुनौती से निपटने के लिए इन बलों की ट्रेनिंग और लीडरशिप में बदलाव करने होंगे। आईपीएस अधिकारियों के स्थान पर कोई दूसरा विकल्प देखा जाना चाहिए...

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Security expert says, India will have to make changes in its security system after Taliban captured in Afghanistan
आतंकी हमला - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

विस्तार

तालिबान का कब्जा होने के बाद अफगानिस्तान में आतंकी संगठनों का जमावड़ा होने लगा है। 'आईएस-खोरासन' ने काबुल एयरपोर्ट पर ब्लास्ट कर 'अफगानिस्तान' में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा दी है। अभी तक भारत में आतंकियों को पाकिस्तान की तरफ से प्रोत्साहन एवं आर्थिक मदद मिल रही है, अब तालिबान के बैनर तले कई दूसरे आतंकी संगठनों के लड़ाके भी इस 'जेहादी टेरेरिज्म' का हिस्सा बन सकते हैं। भारतीय सुरक्षा बलों के सामने संयुक्त तौर पर तालिबान और पाकिस्तान के 'बरादरों' से निपटने की चुनौती बनी रहेगी। ऐसे में आर्मी-सीएपीएफ के सिक्योरिटी सिस्टम में कई तरह के बदलाव करने पड़ सकते हैं। अमेरिकी हथियारों से लैस 'लड़ाकों' को जवाब देने के लिए आर्मी को आंतरिक कश्मीर या दूसरे ऐसे हिस्सों से निकालकर एलओसी पर तैनात करना होगा। खासतौर से जम्मू कश्मीर में सीएपीएफ, जिसमें सीआरपीएफ का एक अहम रोल है, वहां भी ट्रेनिंग, नेतृत्व, उपकरण व रणनीति को लेकर कई बड़े बदलावों की जरुरत महसूस की जा रही है।  

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सुरक्षा मामलों के जानकार कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, तालिबान के मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को काफी सतर्क रहना होगा। दरअसल हमारी फौज के लिए कोई ड्यूटी या टॉस्क मुश्किल नहीं है, वह हर तरह की परिस्थितियों से निपटने में समक्ष है। अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा होने के बाद भारत को अपनी सुरक्षा व्यवस्था में परिवर्तन करने होंगे। जैसे सेना, को आंतरिक ड्यूटी में न लगाया जाए। बतौर गौर, सेना भी ऐसा चाहती है। उसका फोकस बॉर्डर पर रहे।
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कश्मीर या दूसरे हिस्सों में सीएपीएफ को ही आंतरिक सुरक्षा में लगाया जाए। सुरक्षा के इस दायित्व को 'सीआरपीएफ' अच्छे से निभा रही है। आतंकी चुनौती से निपटने के लिए इन बलों की ट्रेनिंग और लीडरशिप में बदलाव करने होंगे। आईपीएस अधिकारियों के स्थान पर कोई दूसरा विकल्प देखा जाना चाहिए। सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकी मामलों से निपटने के लिए लंबे अनुभव की जरूरत होती है। वह जिम्मेदारी वहीं अधिकारी ठीक तरह से निभा सकता है, जो वहां काफी समय से तैनात है।
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भारतीय फौज है, वहां पर बाहर के अधिकारी नहीं आते हैं। हर व्यक्ति, हर काम का एक्सपर्ट नहीं होता। हमारे देश में आईएएस और आईपीएस को सुरक्षा, पावर, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और पुलिस सहित तमाम महकमे थमा देते हैं। आईपीएस को पुलिसिंग तक सीमित रखा जाए। नई आतंकी चुनौती से निपटने के लिए सीएपीएफ को फौज की तरह ट्रेनिंग देनी होगी।

कैप्टन गौर कहते हैं, यहां मेरा मतलब किसी फौजी अधिकारी को सीएपीएफ में लगाना नहीं है। वह केवल ट्रेनिंग पैटर्न तैयार करे, साथ ही ट्रेनिंग भी दे। सीएपीएफ को सेना की तर्ज पर तैयार किया जाए। इसके अलावा बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग, ड्रोन और सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन (रियल टाइम) जैसे उपकरण लगाने होंगे। सीमा पर बहुत से इलाके ऐसे हैं जहां ड्रोन नहीं उड़ पाता। ऐसे में वहां से सूचना बराबर मिलती रहे, इसके लिए सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन बहुत जरूरी है। सुरक्षा बलों में बाकी दूसरी तकनीकें भी अपग्रेड करनी होंगी।   

तालिबानी लड़ाके अमेरिकी एम16 जैसे हथियारों से लैस हैं। भारत ने पिछले कुछ समय में ऐसे हथियारों की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। ऐसे में ट्रेनिंग और उपकरणों पर खास ध्यान देना होगा। जम्मू-कश्मीर के इलाकों में सीआरपीएफ के पास दो ही कैंप 'आरटीसी' व 'लेथपोरा' ऐसे हैं, जहां कोई जवान या अधिकारी सौ मीटर चल सकता है। बाकी सेंटरों की स्थिति दयनीय है। कहीं गैस्ट हाउस में तो कहीं होटल में जवानों को रहना पड़ रहा है। टनल से लेकर श्रीनगर तक को आरओपी देने वाले बल के पास सुविधाओं का अभाव है।

सीआरपीएफ के सूत्रों का कहना है, अगर सड़क के साथ लगते इलाकों में बेहतर व स्थायी कैंप स्थापित कर दिए जाएं तो सीआरपीएफ ज्यादा अच्छे से अपनी ड्यूटी को अंजाम दे सकती है। सार्वजनिक संपत्ति की हिफाजत आसान हो जाएगी। सेना की आरआर इकाई के कैंप को बॉर्डर पर शिफ्ट कर दिया जाए। आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा सीआरपीएफ को सौंपा जाए। भारतीय सुरक्षा बलों के चलते ही यह संभव हो सका है कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद घाटी में दोबारा से माहौल को अशांत नहीं होने दिया गया। अब दोबारा से स्थिति को बिगाड़ने के प्रयास हो रहे हैं। कभी महबूबा मुफ्ती का विरोधी बयान आता है तो दूसरी ओर युवाओं को रास्ते से भटकाने की कोशिश होती है।

सीआरपीएफ अधिकारी के मुताबिक तालिबान और पाकिस्तान के आतंकियों से निपटने के लिए जम्मू-कश्मीर में कम से कम बीस हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती करनी होगी। यानी बीस बटालियन खड़ी की जाएं। ट्रेनिंग में व्यापक सुधार लाना होगा। जहां जरूरी है, वहां कैंप नहीं हैं। सीआरपीएफ के पास कुल तीन सेक्टर हैं। दो कश्मीर में और एक जम्मू में है। अर्बन टेरेरिज्म को खत्म करने के लिए नए सेक्टर खोले जाने चाहिए। पुंछ-राजौरी की जनसंख्या इतनी मिली जुली है कि वहां पर सीआरपीएफ का एक ट्रेनिंग सेंटर होना आवश्यक है। चार पांच आईजी होंगे तो बेहतर रणनीति पर काम हो सकेगा। सीएपीएफ को नए हथियार, वाहन और संचार उपकरण मुहैया कराने होंगे। अगर ये सब बदलाव बहुत जल्द हो पाते हैं तो सीआरपीएफ के जवान तालिबानी लड़ाकों और पाकिस्तानी आतंकियों को मुंह तोड़ जवाब दे सकते हैं।

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