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Supreme Court: कांस्टेबल की आजीवन कारावास की सजा बरकरार, शीर्ष अदालत ने कहा- यह हत्या के अलावा और कुछ नहीं
Wed, 03 Jul 2024 10:11 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: पवन पांडेय
Updated Wed, 03 Jul 2024 10:11 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस स्टेशन में पत्नी के 'साथी' की हत्या के लिए कांस्टेबल की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखा है। वहीं कोर्ट ने कहा कि इस वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार की प्रकृति, मृतक पर चलाई गई गोलियों की संख्या से ये साफ हत्या का मामला है।
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Supreme Court
- फोटो : PTI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक कांस्टेबल की दोष सिद्धि और आजीवन कारावास को बरकरार रखा, जिसने दो दशक पहले एक पुलिस स्टेशन के अंदर अपने साले की गोली मारकर हत्या कर दी थी, क्योंकि वो अपनी पत्नी के साथ उसके कथित अवैध संबंधों से नाराज था। मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और राजेश बिंदल की पीठ ने दोषी सुरेंद्र सिंह की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें उसने दावा किया था कि पीड़ित उसे मारने आया था और उसने ये अपराध आत्मरक्षा में किया गया था और इसलिए, इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत हत्या नहीं कहा जा सकता।
'यह मामला हत्या के अलावा और कुछ नहीं'
न्यायमूर्ति धूलिया ने 23 पन्ने के अपने फैसले में कहा, हर संभव आधार पर यह मामला हत्या के अलावा और कुछ नहीं है। इस्तेमाल किए गए हथियार की प्रकृति, मृतक पर चलाई गई गोलियों की संख्या, शरीर का वह हिस्सा जहां गोलियां चलाई गईं - ये सभी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अपीलकर्ता मृतक को मारने के लिए दृढ़ था। आखिरकार, उसने अपना काम पूरा कर लिया और सुनिश्चित किया कि मृतक मर चुका है। किसी भी तरह से यह कमतर मामला नहीं है और निश्चित रूप से हत्या के बराबर नहीं होने वाली गैर इरादतन हत्या नहीं है।
'दोषी को जमानत देने वाले अंतरिम आदेश को किया रद्द'
वहीं शीर्ष अदालत ने निचली अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और दोषी को जमानत देने वाले अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, कि मामले के तथ्यों से पता चलता है कि वर्तमान मामला दिल्ली के एक पुलिस थाने के अंदर की गई एक जघन्य हत्या का है। इसके अनुसार, यह अपील खारिज की जाती है। अपीलकर्ता को जमानत देने वाला 2 अप्रैल, 2012 का अंतरिम आदेश निरस्त माना जाता है और अपीलकर्ता को आज से चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है।
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2 साल पहले मयूर विहार पुलिस स्टेशन की वारदात
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया- कि इस निर्णय की एक प्रति ट्रायल कोर्ट को भेजी जाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अपीलकर्ता आत्मसमर्पण करे और अपनी बाकी सजा भुगते। इस मामले में दोषी ने तर्क दिया कि उसने आत्मरक्षा में अपराध किया और, वैकल्पिक रूप से, यदि आत्मरक्षा को न्यायालय की तरफ स्वीकार नहीं किया जाता है, तो यह अधिक से अधिक गंभीर और अचानक उकसावे का मामला था, जिसके कारण अपीलकर्ता के हाथों पीड़ित की मृत्यु हो गई। बता दें कि ये वारदात 30 जून, 2002 को मयूर विहार पुलिस स्टेशन में हुई थी। जबकि गवाहों - अन्य पुलिस कर्मियों - ने दोषी को अपनी आधिकारिक 9-एमएम कार्बाइन से पीड़ित की हत्या करते हुए देखा था।
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'यह मामला हत्या के अलावा और कुछ नहीं'
न्यायमूर्ति धूलिया ने 23 पन्ने के अपने फैसले में कहा, हर संभव आधार पर यह मामला हत्या के अलावा और कुछ नहीं है। इस्तेमाल किए गए हथियार की प्रकृति, मृतक पर चलाई गई गोलियों की संख्या, शरीर का वह हिस्सा जहां गोलियां चलाई गईं - ये सभी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अपीलकर्ता मृतक को मारने के लिए दृढ़ था। आखिरकार, उसने अपना काम पूरा कर लिया और सुनिश्चित किया कि मृतक मर चुका है। किसी भी तरह से यह कमतर मामला नहीं है और निश्चित रूप से हत्या के बराबर नहीं होने वाली गैर इरादतन हत्या नहीं है।
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'दोषी को जमानत देने वाले अंतरिम आदेश को किया रद्द'
वहीं शीर्ष अदालत ने निचली अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और दोषी को जमानत देने वाले अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, कि मामले के तथ्यों से पता चलता है कि वर्तमान मामला दिल्ली के एक पुलिस थाने के अंदर की गई एक जघन्य हत्या का है। इसके अनुसार, यह अपील खारिज की जाती है। अपीलकर्ता को जमानत देने वाला 2 अप्रैल, 2012 का अंतरिम आदेश निरस्त माना जाता है और अपीलकर्ता को आज से चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है।
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2 साल पहले मयूर विहार पुलिस स्टेशन की वारदात
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया- कि इस निर्णय की एक प्रति ट्रायल कोर्ट को भेजी जाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अपीलकर्ता आत्मसमर्पण करे और अपनी बाकी सजा भुगते। इस मामले में दोषी ने तर्क दिया कि उसने आत्मरक्षा में अपराध किया और, वैकल्पिक रूप से, यदि आत्मरक्षा को न्यायालय की तरफ स्वीकार नहीं किया जाता है, तो यह अधिक से अधिक गंभीर और अचानक उकसावे का मामला था, जिसके कारण अपीलकर्ता के हाथों पीड़ित की मृत्यु हो गई। बता दें कि ये वारदात 30 जून, 2002 को मयूर विहार पुलिस स्टेशन में हुई थी। जबकि गवाहों - अन्य पुलिस कर्मियों - ने दोषी को अपनी आधिकारिक 9-एमएम कार्बाइन से पीड़ित की हत्या करते हुए देखा था।